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यूवा भारत,महाराष्ट्र चे ४ थे राज्य अधिवेशन संपन्न ..

संदिप कांबळे (अ.भा.समिती सदस्य,यूवा भारत) यांचा रिपोर्ट

युवा भारत संघटनेचे चौथे महाराष्ट्र राज्य अधिवेशन बोपोडी, पुणे येथे दि. २८ व २९ नोव्हेंबर २०१५ रोजी एकविसाव्या शतकातील तरूणाईची गोची या विषयावर पार पडले. अधिवेशनाचा उदघाटन कार्यक्रम मा. घनश्यामजी ( NHCPM राजस्थान ), मा. ज्योतीताई टिळेकर ( पिं. चिं. शहराध्यक्ष, सम्यक युवा मंच महिला आघाडी ) मा. विलास सोनवणे ( जेष्ठ राजकीय कार्यकर्ते व विचारवंत, संस्थापक सदस्य युवा भारत ) सुनील चौधरी ( जेष्ठ कार्यकर्ते युवा भारत, नागपूर ) यांच्या उपस्थितीत व दयानंद कनकदंडे ( अखिल भारत समन्वयक ) यांच्या अध्यक्षतेखाली संपन्न झाला . अधिवेशनाच्या सुरूवातीला प्रास्तविकपर भाषण वनराज शिंदे ( राज्य संयोजक महाराष्ट्र ) यांनी केले.
दोन दिवशीय अधिवेशनामध्ये एकूण चार सत्रात प्रमुख वक्त्यांनी विषयावर मांडणी करुन खुली चर्चा करण्यात आली.
१. शिक्षण व रोजगार – या विषयावर अॅड. भूषण पवार व डॉ. सुरेश सोमकुंवर
२. आमचे नातेसंबंध व रिलेशनशिप मधील गोची – किशोर मोरे व शशी सोनवणे
३. भाषेचा झालेला लोच्या व दुनिया भरचे न्यूनगंड – देवकुमार अहिरे व डॉ. दिपक पवार
४. चित्रपट, समाज व संस्कृती – मुक्ता सोनवणे, प्रशांत कांबळे, डॉ. बशारत अहमद
या सर्व वक्त्यांनी विषयावर मांडणी करून चर्चेत सहभाग घेतला.

अधिवेशनामध्ये खालील ठराव पारित करण्यात आले.

१) महाराष्ट्रातील दूष्काळी परिस्थितीवर पर्यायी उपाययोजना करण्याची मागणी करत आहे.
२) मराठी भाषेच्या विकासामध्ये महानूभाव आणि वारकरी संप्रदायाचे अमूल्य असे योगदान राहीले आहे. महानूभाव पंथ प्रवर्तक श्रीचक्रधर स्वामींनी १२ मार्च १२३४ रोजी आपले मराठी भाषेतील पहीले धर्म वचन ‘ येथ आलीया काही मरण असे’ उद्गारले तो दिवस मराठी भाषा गौरव दिवस म्हणून साजरा करण्याची घोषणा करीत आहे .
३) मराठी भाषा गौरव दिनी १२ मार्च २०१६ रोजी श्रीक्षेत्र रिद्धपूर अमरावती येथे दूसरे सकल साहीत्य सम्मेलन सर्वधर्मिय सर्वपंथीय सामाजिक परिषद व अ.भा.महानूभाव चिंतन परिषद व यूवा भारत संघटना यांचे वतीने घेण्याची घोषणा करीत आहे.
४) शासन प्रशासनाच्या क्षेत्रात मराठी वापराचे धोरण राबविण्याची, किमान प्राथमिक शिक्षण मातृभाषेेतून शिक्षण देण्याची व रिद्धपूर अमरावती येथे मराठी भाषा विद्यापीठ स्थापन करण्याची मागणी करीत आहे
५) हरियाना राज्यातील दलित हत्याकांडाचा व देशभर वाढत चाललेल्या अल्पसंख्यांक व दलितांवरील हल्ल्यांचा निषेध करत आहे.
६) पॅरिस येथील दहशतवादी हल्यात मारल्या गेलेल्या सर्वांशी हे अधिवेशन आपल्या संवेदना व्यक्त करते. दहशतवादविरोधी यूद्धाच्या नावाखाली जगभर साम्राज्यवादी शक्तीनी जे यूद्ध चालविले आहे त्याविरोधात आणि जल,जंगल जमीन व भाषा यावरील अधिकारासाठीच्या कूर्दिश जनतेच्या लढ्यास आपला पाठींबा व्यक्त करते.
७) खाण्याच्या अधिकारावर नियंत्रण आणणाऱ्या धोरणाचा निषेध करत आहे.
इत्यादी ठराव यूवा भारतच्या २८,२९ नोव्हेबर २०१५ रोजी पुण्यात संपन्न झालेल्या युवा भारतच्या चौथ्या राज्यस्तरीय अधिवेशनात पारीत करण्यात आले.

FTI व occupy UGC या विद्यार्थ्यांच्या आंदोलनाला पाठींबा व्यक्त करण्यात आला. देशभरात वाढत चाललेल्या एकूणच राजकीय आणि सामाजिक असहीष्णूतेच्या बाबत गंभीर चिंता व्यक्त करण्यात आली. समाजाच्या पातळीवर जी अभिव्यक्तीची कोंडी निर्मान झाली आहे. त्याविरोधात लढण्याचा निर्धार या अधिवेशनात व्यक्त करण्यात आला. मराठी भाषा गौरव दिनी १२ मार्च २०१६ रोजी श्रीक्षेत्र रिद्धपूर अमरावती येथे दूसरे सकल साहित्य सम्मेलन सर्वधर्मिय सर्वपंथीय सामाजिक परिषद व अ.भा.महानूभाव चिंतन परिषद व युवा भारत संघटना यांचे वतीने घेण्याची घोषणा ही यावेळी करण्यात आली.
सन २०१५ -२०१७ दोन वर्षाच्या कालावधीकरिता राज्य समिती गठीत करण्यात आली. राज्य समिती सदस्य म्हणून देवकुमार अहिरे, अॅड. भूषण पवार, प्रमोद घनवट, अमोल कांबळे, दिपक वाघाडे, अमोल गवळी यांची सर्वानुमते निवड करण्यात आली तर विनोद भूजबळ आणि डॉ. सूरेश सोमकूंवर यांची राज्य संयोजक म्हणून निवड करण्यात आली. नवनियुक्त राज्य संयोजकांचे स्वागत व अभिनंदन वनराज शिंदे व दिपक वाघाडे यांनी केले.
अधिवेशनाचा समारोप कार्यक्रम मा. शोभा करांडे ( सगुणा महिला संघटना ) जयश्री घाडी ( संस्थापक सदस्य युवा भारत ) विलास सोनवणे ( संस्थापक सदस्य युवा भारत ) इक्बाल गाझी ( अखिल भारतीय समिती सदस्य, कोलकाता ) दयानंद कनकदंडे ( अखिल भारतीय समन्वयक ) यांच्या उपस्थितीत व नवनियुक्त राज्य संयोजक विनोद भुजबळ यांच्या अध्यक्षतेखाली संपन्न झाला.

दादरी कांड: जरूरत सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के विमर्श से आगे जाने की …..

दिल्ली,जो की भारत की राजधानी है,वहॉंसे कूछ दूर बिसहाडा गॉंव(दादरी इलाका,उ.प्र) में गोमांस घर में रखे होने की बात से खफा गॉंव के लोगों ने महम्मद ईखलाक की हत्या कर दि । जहॉं यह घटना हूयी है उसे हम सब नोएडा के नाम सें जानते है , यह दिल्ली का चमक दमक वाला ईलाका है । यह चमक दमक जिन लोगों को उजाडकर हूयी है उन उजाडे गए लोगोंके बीच के असंतोष को दरकिनार कर लोग ईस घटना का विश्लेषण करने में जूटे है,उससे हम सब लोगों को बचने की जरूरत है । सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के आईने में ईस घटना को देखने से ईसकी समझ हमें प्राप्त नही हो सकती । हमने हमारे पहले वाक्य में गोमांस रखे होने की अफवाह जानबूझकर नही कहॉं क्योंकी देश के धर्मनिरपेक्ष कहलाये जानेवाले लोग भी यह मानकर चलते की,मूसलमानही गोमांस भक्षक होता है या ज्यादातर गोमांस भक्षक मूसलमान ही होते है ।  महाराष्ट्र में जब पाबंदी लगायी गयी है उसको उठाने की मॉंग करनेवाले बीफ ईटर लोग नॉन मूस्लिम है ।ईस देश में प्राणीहत्या खासकर गाय और बैलो की हत्या के ऊपर पाबंदी की मांग जैन,बूद्ध से लेकर आधूनिक काल में महात्मा फूले तक ने की है । बूद्ध का काल इलापूर्व ५०० है, जबकी इस्लाम ७ वी सदी में आया है ।खेती की संपूर्ण व्यवस्था जो बडी जनसंख्या का भरणपोषण करती है  उससे जूडे ईन मवेशीओं को अपने भोग के लिए स्वाहा करने के खिलाफ ऊनकी लडाई रही । म.फूले ने भी गोहत्याबंदी कानून की मॉंग ईसी परीप्रेक्ष्य में रखी थी । गांधीजी द्वारा स्थापित एक संघ का नाम है कृषि-गोसेवा संघ । आज कृषि भारी संकट से जूझ रही है । खेती के कॉर्पोरेटायझेशन ने गाय बैलो को बडी संख्या में बाहर कर दिया है । कृषि का संकट ईतना गहरा है की पिछले बीस वर्षो    में  ३ लाख किसानों ने खूदकूशी कर ली है । स्थिती यह है की, खेती से किसान भी बाहर और गायबैल भी ।  सरकारे कृषि को संकट में डालकर गाय बचाने के नाम पर किसानों को धर्म के नाम पर आपस में भीडा रही है ।मूजफ्फरनगर में हिंदू जाट मूसलमान जाट सें भीडा था । जाट उत्तर भारत की किसान जाति है । आज जाट,पटेल,मराठा आरक्षण माॉंग रहे है ,क्यों ..??  वह आरक्षण नीती को खत्म करने की मंशा रखते ईसलिए नही तो कृषि संकट जिसे हमारी पूंजीवादी व्यवस्था नें निर्मान किया है उसके वजह बेदखल लोगों की इससे उभरने की छटपटाहट भर है । आज गाय बचाने की लडाई हो या आरक्षण बचाने की लडाईया समस्या सूलझानें की भासमान लडाईया है क्योंकी खेती और सामाजिक न्याय की गारंटी की व्यवस्था दोनों खतरे मे है ।  कृषि व्यवस्था को मानव और समाज हितैषी आधार पर खडा करने की लडाई लढे बगैर न सामाजिक न्याय की स्थापना हो सकती है न सांप्रदायिकता के खिलाफ लढाई ।
–  दयानंद कनकदंडे

श्रम की लूट एवं भूमि की लूट के खिलाफ एकताबद्ध हो.। जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करो । 2 सितम्बर की देशव्यापी हड़ताल को युवा भारत का समर्थन ।

 श्रम की लूट एवं भूमि की लूट के खिलाफ एकताबद्ध हो.।

                            जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करो ।

                2 सितम्बर की देशव्यापी हड़ताल को युवा भारत का समर्थन ।

देशभर के सभी केंद्रीय संगठनों ने और कर्मचारियो की फेडरेशनों ने एकसाथ मिलकर 2 सितम्बर 2015 के दिन देशव्यापी आम हड़ताल का आवाहन किया है । ठेका मजदूरी प्रथा को बंद करने,दिहाड़ीकरण और आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने,रक्षा,रेलवे,खुदरा व्यापार, वित्तीय क्षेत्रो में एफडीआई निवेश पर रोक लगाने,श्रम कानूनों में सुधारो को रद्द करने और भूमि अधिग्रहण कानून वापस लेने आदी 12 मांगो को लेकर यह देशव्यापी आम हड़ताल हो रही है । युवा भारत संग़ठन, जो की साम्राज्यवाद विरोधी युवाओ का अखिल भारतीय संगठन है, इस हड़ताल को सफल बनाने का आव्हान करता है..।

देश की वर्तमान राजग सरकार द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ विकास मॉडल,जो इस देश के पूर्ववर्ती कथित विकास मॉडलों का अगला चरण है । इस मॉडल की प्रतिपूर्ति हेतु बहुराराष्ट्रीय पूंजी की सेवा के लिए भूमी और श्रम को सस्ते दामो पर उपलब्ध करा देने के अजेंडे को पूरा करने में पहले दिन से लगी हुयी है ।

सरकार के द्वारा प्रस्तावित ‘स्मॉल फॅक्टरीज अधिनियम 2014 के अनुसार 40 से कम मजदूरो वाली सभी छोटी फॅक्टरिओ को 14 श्रम कानूनों से मुक्त कर दिया जायेगा । इस कानून के लागू हो जाने से करीबन 80 प्रतिशत कारखाने और उसके मजदूर श्रम कानूनों से मिलने वाले अधिकारो से बाहर हो जाएंगे । इन फॅक्टरिओ में में देश के सबसे आधुनिक और रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत माने जानेवाले आई टी सेक्टर का समावेश है। आई टी सेक्टर में 40  से  कम मजदूरो वाली  बहुतेरी कंपनीया है । साथ ही बाल श्रम(निषेध और नियमन ) कानून में संशोधन करके पारंपरिक उद्यम और कौशल विकास के लुभावने नाम पर वैध तथा अवैतनिक बनाने और महिला श्रमिको को उनकी समुचित सुरक्षा के बगैर रात्र पालियो में काम की अनुमति प्रदान करने जैसे प्रावधान श्रमिक हित विरोधी है । युवा भारत ऐसे कानूनों के क्रियान्वयन का पुरजोर विरोध करता है ।

देश के 60 प्रतिशत लोग आज भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार और भरण-पोषण के लिए खेती पर निर्भर है ।  किसान,खेतिहर मजदूर,पशुपालक से लेकर जंगल के मूलनिवासी आदीवासी परिवारो को मिलाकर एक बड़ी आबादी बनती है ।कृषि पर उनका अधिकार उसके जीविका का अधिकार है ।पिछले 20 वर्षो में खेती के लिए उपयोग में लाये जानेवाली भूमि का क्षेत्र घटा है । यह कृषियोग्य भूमि घटने का एकमात्र कारन है .. विकास के नाम पर अंदाधुंद भूमि अधिग्रहण …। इसी विकास प्रकिया के नाम पर इस देश में सेज नीती का क्रियान्वयन शुरू किया गया था । इसके विरोध में उभरे जनसंघर्षों में युवा भारत  संग़ठन ने सकारात्मक हस्तक्षेप किया  |जनविरोधी सेझ कानून २००५ के खिलाफ युवा भारत ने महामुंबई शेतकरी (किसान) समिती बनाकर रायगढ (महाराष्ट्र) में निर्णायक लढाई खडी की.पोस्को(उडीसा) सिंगूर,नंदीग्राम की लढाई में सक्रीय सहभागिता ,उलुबेरिया (प.बंगाल) में जमीन हथियाने कि साम्राज्यवादी नितीयो के खिलाफ संघर्ष खडा किया | सेझ के माध्यम से जल,जंगल,जमीन हथियाने कि इस प्रक्रिया में इन संघर्शो के परिणामस्वरूप २०१३ में ब्रिटीश हुकमत के जमीन अधिग्रहण कानून १८९४ में व्यापक संशोधन कर जमीन अधिग्रहण के लिए आवश्यक सार्वजनिक हित के प्रावधान को हटा दिया गया | हर प्रकार के निजी एवं सार्वजनिक परीयोजनाओ के लिए जमीन हथियाने को मान्यता देकर केवल मुआवजे व पुनर्वास के दायरे में चर्चा को सिमटा कर रख दिया | २०१३ में बनाये गए इसी “उचित मुआवजा का अधिकार,पुनर्स्थापना,पुनर्वास एवं पारदर्शिता भूमी अधिग्रहण विधेयक  २०१३ “ में  हाल कि  सरकार ने और भी संशोधन एक अध्यादेश द्वारा किये है |

अध्यादेश में कहा गया है कि पांच उद्देशो-सुरक्षा,रक्षा,ग्रामीण आधारभूत सरंचना,औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी सामाजिक के निर्माण के लिए अनिवार्य सहमती कि उपधारा आवश्यक नहीं है । साथ ही सामाजिक प्रभाव का आंकलन,5 साल तक अधिग्रहित भूमि का इस्तेमाल न करने पर उसको वापस करना जैसे प्रावधानो को हटा दिया है।

सरकार का यह फैसला पुंजीपतीयो के पक्ष में और किसान एवं गरीबो के खिलाफ तथा अलोकतांत्रिक है |

जिस प्रकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया और जिस प्रकार से सारी प्रक्रियाओ को तक पर रखकर श्रम कानूनों में सुधारो को अंजाम दिया जा रहा है ,यह दोनों प्रकार जनवादी परंपरा के संकेत और नीतियो का विडंबन और उल्लंघन है | सरकार यह संदेश देना चाहती है की वह बाजारकेंद्रित आर्थिक सुधारो के लिए बहुत बैचैन है |यह हकीकत है की बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था आज पुरे विश्वभर में चरमरा रही है;अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मंदी,युरोजोन का संकट तथा चीन कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती  इसका प्रमाण है | हाल ही में आये ग्रीस संकट ने इसकी पुष्टि कर दी है ।भारत की सरकार फीर भी आर्थिक सुधारो के उन्ही मार्गो का अनुसरण कर रही है | इसलिए विकास के  इस पुरे मॉडेल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है |

कुछ महत्वपूर्ण बातो को भी इस सन्दर्भ में देखे जाने की जरुरत है । जिन ट्रेड यूनियनों की तरफ से इस आम हड़ताल का आवाहन किया है, उनमे से बहुतायत राजनीतिक पार्टीयो से सबंधित ट्रेड यूनियनें ही है । CITU सीपीएम से सम्बद्ध है,INTUC कांग्रेस पार्टी से,BMS भाजपा से सम्बद्ध है ।जब यह राजनीतिक दल सत्ता में रहते वक़्त जनविरोधी नीतियों को लागु करते है तब यह ट्रेड यूनियनें आश्चर्यजनक रूप से इसपर चुप्पी साध लेती है । श्रम कानूनों में सुधारों  का प्रस्ताव जब कांग्रेस नीत यूपीए द्वारा लाया गया था तब INTUC खामोश रही । जब प.बंगाल की वाम मोर्चा सरकार मजदुर विरोधी सेझ कानून बंगाल में लेकर आयी तब CITU द्वारा इसका थोडा भी विरोध नहीं हुआ । हमको इस हड़ताल का समर्थन करते वक़्त कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए की यह ट्रेड यूनियनें अप्रत्यक्ष रूप से मेहनतकश वर्ग हितो के विरुद्ध भूमिका लेती रही है । ट्रेड यूनियनों का कर्तव्य मजदूरो के हितो का रक्षण करना होना चाहिए, न की वे जिन राजनितीक दलो से सम्बद्ध है उनके हितो का पोषण करना । एक राजनितीक दल के बदले दूसरे राजनितीक दल को सत्ता में बिठाने भर से मेहनतकश वर्ग के हितो को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। मेहनतकश जनता के ऊपर हो रही ज्यादतीयो को रोकने के लिए एक देशव्यापी जनांदोलन छेड़े जाने की जरुरत है । इससे कम और कुछ भी नहीं चल सकता । जनांदोलन का कुछ भी शॉर्टकट नहीं है ।

उद्योग के विकास के नाम पर बडे एवं भारी उद्योगो की चर्चा क्यो होती है?उद्योगो के विकास का अर्थ ग्रामीण   उद्योग  का विकास क्यो नही लिया जाता ?जिस विकास मॉडेल में कंपनीयो,निगमो की मुनाफाखोरी के लिए मानव श्रम  का शोषण हो ,जमीन एवं प्राकृतिक संसाधनो का दोहन हो तथा इससे जुडे परंपरागत किसान,आदिवासी समुदाय को उजाडे,उस विकास के मॉडेल को कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?विकास का सही मॉडेल वही है जो मनुष्य समाज एवं  प्रकृती के साथ संगती बैठाते हुए सबका विकास सुनिश्चित करे |इसलिए भारत जैसे श्रमबाहुल्य देश में मास प्रोडक्शन की  बजाय प्रोडक्शन बाई मासेज फॉर द मासेज की नीती ही कारगर हो सकती है |जल,जंगल,जमीन,पहाड आदी प्राकृतिक   धरोहर है,लोगो के जीविका के साधन है,इन्हे बाजार की वस्तू बनाना गलत है |

युवा भारत संग़ठन इन अध्यादेशो,सुधारो का विरोध करता है । जनविरोधी नीतियों के विरोध में चल रहे संघर्ष को जनहितैषी समाज के निर्माण की और अग्रसर करने तथा समतामूलक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाने का कृतसंकल्प करता है ।

(दयानंद कनकदंडे,कौशिक भारत,कृष्णा महतो,कैलाश राजभर )

युवा भारत की अखिल भारतीय संयोजन समीती द्वारा जारी

30 अगस्त 2015

नयी दिल्ली

Please sign the petition to Demand Scrap the anti people land acquisition ordinance

Please sign the petition to Demand Scrap the anti people land acquisition ordinance

this is online petition addressed to Prime minister to India

to Demand Scrap the anti people land acquisition ordinance

 

http://www.change.org/p/prime-minister-of-india-an-appeal-to-scrap-anti-people-land-acquisiton-ordinance?recruiter=90787932&utm_source=share_petition&utm_medium=copylink

युवा भारत के ७ वे अखिल भारतीय संमेलन,प.बंगाल द्वारा पारित प्रस्ताव

 1) भूमी अधिग्रहण अध्यादेश पर प्रस्ताव

युवा भारत संघठन २००५ से जमीन हथियाने कि नीतियो के विरोध में लगातार संघर्ष करते आया है  |जनविरोधी सेझ कानून २००५ के खिलाफ युवा भारत ने महामुंबई शेतकरी (किसान) समिती बनाकर रायगढ (महाराष्ट्र) में निर्णायक लढाई खडी की.पोस्को(उडीसा)सिंगूर,नंदीग्राम,उलुबेरिया (प.बंगाल) में जमीन हथियाने कि साम्राज्यवादी नितीयो के खिलाफ संघर्ष खडा किया | सेझ के माध्यम से जल,जंगल,जमीन हथियाने कि इस प्रक्रिया में इन संघर्शो के परिणामस्वरूप २०१३ में ब्रिटीश हुकमत के जमीन अधिग्रहण कानून १८९४ में व्यापक संशोधन कर जमीन अधिग्रहण के लिए आवश्यक सार्वजनिक हित के प्रावधान को हटा दिया गया | हर प्रकार के निजी एवं सार्वजनिक परीयोजनाओ के लिए जमीन हथियाने को मान्यता देकर केवल मुआवजे व पुनर्वास के दायरे में चर्चा को सिमटा कर रख दिया | २०१३ में बनाये गए इसी उचित मुआवजा का अधिकार,पुनर्स्थापना,पुनर्वास एवं पारदर्शिता भूमी अधिग्रहण विधेयक  २०१३ में  हाल कि  सरकार ने और भी संशोधन एक अध्यादेश द्वारा किये है |

    अध्यादेश में कहा गया है कि पांच उद्देशो-सुरक्षा,रक्षा,ग्रामीण आधारभूत सरंचना,औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी सामाजिक के निर्माण के लिए अनिवार्य सहमती कि उपधारा और सामाजिक प्रभाव आकलन कि शर्त भूमी अधिग्रहण के लिए आवश्यक नही होगी | अध्यादेश के मुताबिक बहुफसली सिंचीत भूमी भी इन उद्देशो के अधिग्रहित कि जा सकती है |भूमी अधिग्रहण कानून २०१३ देश के अनेक जनसंघठनो द्वारा लढे गये संघर्ष और सर्वोच न्यायालय के कई फैसलो के दबाव कि तार्किक परिणीती था | इस तार्किक परिणीती को महज एक अध्यादेश द्वारा पलट दिया गया है | इस अध्यादेश के तीन आयाम है-एक तो यह की इसमे जमीन मालीको कि सहमती कि शर्त को काफी हद तक काम कर दिया है |दुसरा,ऐसी परियोजनाओ का दायरा काफी हद तक बाधा दिया है,जिसके लिए अधिग्रहण करणे के लिए सहमती कि आवश्यकता हि नही होगी | तीसरा अब बहुफसली जमीन का भी अधिग्रहण किया जा सकेगा| इस अध्यादेश से अत्याधिक अधिग्रहण और जबरन अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया है |

सरकार का यह फैसला पुंजीपतीयो के पक्ष में और किसान एवं गरीबो के खिलाफ तथा अलोकतांत्रिक है | सवाल यह उठता है की,जब संसद का शीतकालीन अधिवेशन कुछ ही दिनो में आरंभ होनेवाला था तब इतनी जल्दी में अध्यादेश लाने का औचित्य क्या है? संविधान में अध्यादेश का प्रावधान आपात उपाय के रूप में किया गया है |इसलिए इसका सहारा अपवादात्मक ही लेना चाहीए लेकीन सरकार ने एक के बाद एक अध्यादेशो कि झडी लगा दी गयी है | यह प्रकार जनवादी परंपरा के संकेत और नीतियो का विडंबन और उल्लंघन है | हडबडी में अध्द्यादेश लाकर सरकार यह संदेश देना चाहती है की वह बाजारकेंद्रित आर्थिक सुधारो के लिए बहुत बैचैन है |यह हकीकत है की बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था आज पुरे विश्वभर में चरमरा रही है;अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मंदी,युरोजोन का संकट तथा चीन कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती  इसका प्रमाण है | भारत की सरकार फीर भी आर्थिक सुधारो के उन्ही मार्गो का अनुसरण कर रही है | इसलिए विकास के  इस पुरे मॉडेल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है |

 उद्योग के विकास के नाम पर बडे एवं भारी उद्योगो की चर्चा क्यो होती है?उद्योगो के विकास का अर्थ ग्रामीण   उद्योग  का विकास क्यो नही लिया जाता ?जिस विकास मॉडेल में कंपनीयो,निगमो की मुनाफाखोरी के लिए मानव श्रम  का शोषण हो ,जमीन एवं प्राकृतिक संसाधनो का दोहन हो तथा इससे जुडे परंपरागत किसान,आदिवासी समुदाय को उजाडे,उस विकास के मॉडेल को कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?विकास का सही मॉडेल वही है जो मनुष्य समाज एवं  प्रकृती के साथ संगती बैठाते हुए सबका विकास सुनिश्चित करे |इसलिए भारत जैसे श्रमबाहुल्य देश में मास प्रोडक्शन की  बजाय प्रोडक्शन बाई मासेज फॉर द मासेज की नीती ही कारगर हो सकती है |जल,जंगल,जमीन,पहाड आदी प्राकृतिक   धरोहर है,लोगो के जीविका के साधन है,इन्हे बाजार की वस्तू बनाना गलत है |

 युवा भारत इस अध्यादेश का विरोध करता है | जमीन हथियाकर  मेहनतकश जनता को उसके रोजी रोटी के साधनो से,प्राकृतिक जड़ो से बेदखल करने की नीती का विरोध करता है और देशभर में चल रहे संघर्षो का समर्थन करते हुए उन्हे तेज़ करने का संकल्प घोषित करता है |

 2) भारत मे २०११ की जनगणना के अनुसार इस देश मे १६३५ भाषाए होने  की बात कही गयी है | युवा भारत का यह सम्मेलन सभी को ऊनकी मातृभाषा मे न्यूनतम प्रार्थमिक शिक्षा दिए जाने की मांग करता है|

3)भारतीय संविधान की ८ वी अनुसूची मे समावेशीत २२ भाषाओ मे प्रशासनिक एव न्यायालयीन कार्यवाही चलाने की मांग युवा भारत का सम्मेलन करता है |

4) भारत एक बहुभाषायी देश है | भारतीय संविधान  की ८वी अनुसूची मे  २२ भाषाओ को सामील किया गया है| युवा भारत के ६ वे अखिल भारतीय सम्मेलन वर्धा(महाराष्ट्र) ने महाराष्ट्र मे अमरावती जिला के रिधपुर मे मराठी भाषा का केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने की मांग की है ,यह सम्मेलन संविधान की ८ वी अनुसूची मे समावेशीत २२ भाषाओ के केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग करता है |इन सभी विश्वविद्यालयो मे साहित्य,कला,विज्ञान,सामाजिक विज्ञान का संशोधन एवं अध्ययन-अध्यापन हो तथा होणेवाले संशोधन एक दुसरी भाषा मे अनुदीत कर उपलब्ध कराने के लिए एक आंतरभारती अनुवाद केंद्र की स्थापना की जाए | 5) झारखंड पर प्रस्ताव

अ) झारखंड प्रदेश की भौगोलिक परिस्थिती को ४ राज्यो मे विभाजित किया गया है | वहा की वांशिक राष्ट्रीयता के विकास हेतु सही मायने मे झारखंडी लोगो के अस्तित्व एवं अस्मिता को दर्शानेवाले वृहद झारखंड के पुंनर्गाठण की मांग करता है |

ब) झारखंड की तरह भारत के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रो मे कई सारी आदिवासी जनजातीयो को आज   भी शेडुल मे नही रखा गया है | जिसके कारण आदिवासी होते हुए भी उनके मौलिक अधिकारो का हणण होता है |युवा भारत मांग करता है की ऐसी आदिवासी जनजातीयो को शेडुल मे समाविष्ठ किया जाए और उनके  जल,जंगल,जमीन के मौलिक अधिकारो की रक्षा की जाए |     6)फिलिस्तीन की राष्ट्रीयता का समर्थन

     साम्राज्यवादी नीतीयो के तहत फिलिस्तीनी जनता का फिलीस्तींनी राष्ट्र का हक १९४८ से नाकारा गया है | युवा भारत फिलिस्तीन की राष्ट्रीयता के चल रहे संघर्ष का समर्थन करता है |साथ ही साथ विश्व भर मे चल रहे विभिन्न राष्ट्रीयताओ के राष्ट्रमुक्ती संघर्षो का समर्थन करता है|

  7)देशभर मे भगाना(हरियाणा)खरडा(महाराष्ट्र) आदि इलाको मे तथा अन्य इलाको मे दलित,आदिवासी,घुमंतू जनजातीयो के स्त्री-पुरुष और तृतीयपंथीयो तथा अलग-अलग धार्मिक पहचान और मान्यता अपनाने वालो के पर अत्याचारो की घटनाये बढ रही है |

 युवा भारत ऐसी अमानवीय घटनाओ की निंदा करता है और ऐसी घटनाओ को रोकने के लिए समाज जोडो अभियान तेज करणे का संकल्प करता है |

 

भूमी अधिग्रहण अध्यादेश पर प्रस्ताव

युवा भारत संघठन २००५ से जमीन हथियाने कि नीतियो के विरोध में लगातार संघर्ष करते आया है  |जनविरोधी सेझ कानून २००५ के खिलाफ युवा भारत ने महामुंबई शेतकरी (किसान) समिती बनाकर रायगढ (महाराष्ट्र) में निर्णायक लढाई खडी की|पोस्को(उडीसा)सिंगूर,नंदीग्राम,उलुबेरिया (प.बंगाल) में जमीन हथियाने कि साम्राज्यवादी नितीयो के खिलाफ संघर्ष खडा किया | सेझ के माध्यम से जल,जंगल,जमीन हथियाने कि इस प्रक्रिया में इन संघर्शो के परिणामस्वरूप २०१३ में ब्रिटीश हुकमत के जमीन अधिग्रहण कानून १८९४ में व्यापक संशोधन कर जमीन अधिग्रहण के लिए आवश्यक सार्वजनिक हित के प्रावधान को हटा दिया गया | हर प्रकार के निजी एवं सार्वजनिक परीयोजनाओ के लिए जमीन हथियाने को मान्यता देकर केवल मुआवजे व पुनर्वास के दायरे में चर्चा को सिमटा कर रख दिया | २०१३ में बनाये गए इसी उचित मुआवजा का अधिकार,पुनर्स्थापना,पुनर्वास एवं पारदर्शिता भूमी अधिग्रहण विधेयक  २०१३ में  हाल कि  सरकार ने और भी संशोधन एक अध्यादेश द्वारा किये है |

                 अध्यादेश में कहा गया है कि पांच उद्देशो-सुरक्षा,रक्षा,ग्रामीण आधारभूत सरंचना,औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी सामाजिक के निर्माण के लिए अनिवार्य सहमती कि उपधारा और सामाजिक प्रभाव आकलन कि शर्त भूमी अधिग्रहण के लिए आवश्यक नही होगी | अध्यादेश के मुताबिक बहुफसली सिंचीत भूमी भी इन उद्देशो के अधिग्रहित कि जा सकती है |भूमी अधिग्रहण कानून २०१३ देश के अनेक जनसंघठनो द्वारा लढे गये संघर्ष और सर्वोच न्यायालय के कई फैसलो के दबाव कि तार्किक परिणीती था | इस तार्किक परिणीती को महज एक अध्यादेश द्वारा पलट दिया गया है | इस अध्यादेश के तीन आयाम है-एक तो यह की इसमे जमीन मालीको कि सहमती कि शर्त को काफी हद तक काम कर दिया है |दुसरा,ऐसी परियोजनाओ का दायरा काफी हद तक बाधा दिया है,जिसके लिए अधिग्रहण करणे के लिए सहमती कि आवश्यकता हि नही होगी | तीसरा अब बहुफसली जमीन का भी अधिग्रहण किया जा सकेगा| इस अध्यादेश से अत्याधिक अधिग्रहण और जबरन अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया है |

                    सरकार का यह फैसला पुंजीपतीयो के पक्ष में और किसान एवं गरीबो के खिलाफ तथा अलोकतांत्रिक है | सवाल यह उठता है की,जब संसद का शीतकालीन अधिवेशन कुछ ही दिनो में आरंभ होनेवाला था तब इतनी जल्दी में अध्यादेश लाने का औचित्य क्या है? संविधान में अध्यादेश का प्रावधान आपात उपाय के रूप में किया गया है |इसलिए इसका सहारा अपवादात्मक ही लेना चाहीए लेकीन सरकार ने एक के बाद एक अध्यादेशो कि झडी लगा दी गयी है | यह प्रकार जनवादी परंपरा के संकेत और नीतियो का विडंबन और उल्लंघन है | हडबडी में अध्द्यादेश लाकर सरकार यह संदेश देना चाहती है की वह बाजारकेंद्रित आर्थिक सुधारो के लिए बहुत बैचैन है |यह हकीकत है की बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था आज पुरे विश्वभर में चरमरा रही है;अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मंदी,युरोजोन का संकट तथा चीन कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती इसका प्रमाण है | भारत की सरकार फीर भी आर्थिक सुधारो के उन्ही मार्गो का अनुसरण कर रही है | इसलिए विकास के इस पुरे मॉडेल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है |

                       उद्योग के विकास के नाम पर बडे एवं भारी उद्योगो की चर्चा क्यो होती है?उद्योगो के विकास का अर्थ ग्रामीण उद्योग का विकास क्यो नही लिया जाता ?जिस विकास मॉडेल में कंपनीयो,निगमो की मुनाफाखोरी के लिए मानव श्रम का शोषण हो ,जमीन एवं प्राकृतिक संसाधनो का दोहन हो तथा इससे जुडे परंपरागत किसान,आदिवासी समुदाय को उजाडे,उस विकास के मॉडेल को कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?विकास का सही मॉडेल वही है जो मनुष्य समाज एवं प्रकृती के साथ संगती बैठाते हुए सबका विकास सुनिश्चित करे |इसलिए भारत जैसे श्रमबाहुल्य देश में मास प्रोडक्शन की बजाय प्रोडक्शन बाई मासेज फॉर द मासेज की नीती ही कारगर हो सकती है |जल,जंगल,जमीन,पहाड आदी प्राकृतिक धरोहर है,लोगो के जीविका के साधन है,इन्हे बाजार की वस्तू बनाना गलत है | युवा भारत इस अध्यादेश का विरोध करता है | जमीन हथियाकर  मेहनतकश जनता को उसके रोजी रोटी के साधनो से,प्राकृतिक जड़ो से बेदखल करने की नीती का विरोध करता है और देशभर में चल रहे संघर्षो का समर्थन करते हुए उन्हे तेज़ करने का संकल्प घोषित करता है |

                        ( युवा भारत  संघठन के  ७ वे  अखिल भारतीय सम्मेलन  प.बंगाल द्वारा  भूमी                               अधिग्रहण अध्यादेश पर पारित प्रस्ताव)

                                                                                                                  दि.१० मार्च २०१५

                                                                                                                      फुलेश्वर,हावडा

 

युवा भारत के ७ वे अखिल भारतीय संमेलन द्वारा पारित कार्यक्रम प्रस्ताव 

                                             

               १.आज देशभर में धर्म के नाम पर,संप्रदाय के नाम पर जनता के अंदर विरोध पैदा करने की और उनके अंदर एक दुसरे के खिलाफ नफरत फैलाने कि राजनीती तेजी से बढ रही है / इस विभाजन कि राजनीती के विरोध में युवा भारत लगातार प्रचार आंदोलन चलायेगी /

२. भारत के अंदर विभिन्न राष्ट्रीयताए और वांशिक जनजातीया अपना परिचय खो कर अस्तित्वहीन होती जा रही है / इस के खिलाफ इन राष्ट्रीयताओ और जनजातीयो कि तरफसे लढाईया भी खडी हो रही है / युवा भारत राष्ट्रीयताओ और आदिवासीओ के सवाल पर खडी लढाईओ के साथ खडा होगा /

३. युवा भारत लिंग विषमता के खिलाफ लगातार लढाई कर रहा है / जो संघटनाये इस मुद्दे को लेकर लढ रही है, खासकर मेहनतकश महिलाओ को संघटीत करने का काम कर रही है,उनके साथ युवा भारत मोर्चाबंदी खडी करेगा /

४. युवा भारत के ५ वे संमेलन(देवघर) में विकास और पर्यावरण इस विषय पर चर्चा कि गयी थी और पर्यावरण के रक्षण सबंधी आंदोलन खडी करने कि जरुरत व्यक्त कि गयी थी / इसकी धारावाहीकता बनाये रखते हूए युवा भारत पर्यावरण बचाव संघर्ष खडा करने का काम करेगा /

५. युवाओ को एकजूट करने का काम कर रहे है और युवा भारत जैसी मिलीजुली सोच रखनेवाले युवा संघटनाओ के साथ मिलकर काम करने के लिए युवा भारत प्रयासशील रहेगा /

६. शिक्षा आज भगवाकरन और व्यापारीकरण का शिकार हो गयी है /लोकतांत्रिक,वैज्ञानिक,सार्वजनिक और समाजोन्मुखी शिक्षा व्यवस्था कि मांग को लेकर युवा भारत लगातार संघर्ष करेगा

७. युवा पिढी आज  बेरोजगारी  और छदम मजदूर युनियनो  के शिकंजे में है / काम के घंटे बढते जा रहे है और मजदूरी घटती जा रही है / मजदुरो के लिए काम करने योग्य स्तीथिया और सामाजिक रूप से सुरक्षित वातावरण बुरे तरीके से खत्म किया जा रहा है / इसी तरह  नौकरी दिलाने के नाम पर भ्रष्टाचार तेजी से बढ रहा है / मजदूर आंदोलन  के क्षेत्र में चल रहे  सारे मुद्दो को लेकर  युवा भारत आंदोलन खडा करने का काम करेगी/

८.बहु विकल्पिक समाजोन्मुखी संस्कृती के प्रसार के लिये युवा भारत प्रयासशील रहेगा /

९.समाज में व्यक्तिवाद का विरोध और सामुहीकता के माध्यम से सोचने कि मानसिकता पैदा करणे के लिये युवा भारत काम करेगा/