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नोट बंदी : गरीब को और गरीब करने की योजना है

( ८ नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लादी गयी नोटबंदी के अन्वयार्थ कि चर्चा करता आलेख)

नोट बंदी या विमुद्रीकरण  पर समूचा देश बुरी तरह से विभाजित  हो गया है. सभी पूंजीवादी पार्टियां भी इस विषय पर विभाजित हैं.  वे अपने वर्ग के लाभ  के लिए ही इस विषय  पर   अलग अलग  सोच रखती हैं. हमें  भी शोषित वर्गों के प्रतिनिधि के  लिहाज़ से इस नीति को देखना है .

 

पूंजीपती वर्गों के लोगों और पार्टियों  ने इसे इस लिहाज़ से देखा है कि  कितनी जल्दी अर्थव्यवस्था दुबारा पटरी पर आ पायेगी  और  किस मात्रा  में लोग नकदी के प्रयोग घटा देंगे या बंद कर देंगे . लेकिन किसी ने भी   इसका गरीबों पर सीधे  और स्थायी हो रहे असर पर गौर करना ज़रूर नहीं समझा  है.

 

आइये देखे क्या असर है :  नोट बंदी से अर्थव्यवस्था के अंदर ही सम्पति और धन  का पुन: वितरण हो रहा  है और आगे भी होगा. इससे कमज़ोर लोगों की सम्पदा , शक्तिशाली  लोगों हाथों  में स्थानांतरित हो रही है  और  सरकार यह दावा कर रही है  कि वह निर्धनों के लाभ के लिए  इस नीति को लाइ है  जब कि हो इसके ठीक उल्टा रहां  है .

 

यह इस प्रकार है कि देश के अधिकाँश  मेहनतकश, करीब ८०-९०%  असंगठित  क्षेत्र में कार्यरत हैं जहां वेतन नगदी में दिया जाता है और वे खर्चा भी नगदी में करते हैं . इस नगदी के अभाव का असर सभी पर पड़ेगा और  निर्धनों पर विपरीत और अन्य पर सकारत्मक .   मेहनतकशों की अधिकाँश महिलाएं  अपनी रोज की आमदनी से कुछ पैसा बचाकर अलग से रख लेती हैं  . उनमें से कई अपने आदमियों से बचाकर और कुछ अन्य किसी आड़े वक्त में काम आने के लिए.यह उनकी सुरक्षा का  बड़ा कवच है .आज के नकदी संकट  में यह सभी पैसा निकल जायगा  और उनके  जीवन को अत्यंत असुरक्षित  कर देगा .  उनका शोषण और अधिक हो जायगा.

 

वे किसान जो रबी की फसल समय से या उसके अलावा  बो नहीं सकेगा और खरीफ को बेच नहीं सकैगा  , उसे इन फसलों  को बोने के लिए महाजनों के पास जाना पड़ेगा,विशेष रूप से  इसलिए भी की सहकारी बैंकों को अभी तक नोट बदलने की सुविधा नहीं दी गयी है और ये  सभी बैंक बंदी की कगार पर हैं.

 

यही हाल मजदूरों का भी है जिन्हें बड़ी तादाद में काम से हाथ धोना पड़ा है . इनमें से बहुतेरे तो लंगरों की तलाश में रहते  हैं जहां उन्हें  खाना मिल सके; कुछ  ने कानपूर में  नसबंदी भी कराई है ताकि चार पांच दिन तक वे परिवार को खिला सके, और बाकी  सभी महाजनों के चंगुल मैं हैं . कानपूर के मजदूर बाजारों में मजदूरों की संख्या घटती जा रही है क्योंकि कोई काम नहीं है. जो गांव जा सकते हैं वे गांव जा चुके हैं .   इन वर्गों के सभी  लोगों को किसी ना किसी रूप में अपने सम्पति बेचनी  होगी और उनकी माली  हालत पहले से भी बहुत खराब होनी  अवश्यम्भावी हैं .

 

इसके अलावा उन सभी को जिनको किन्ही आपदा के कारण अपने  ५०० अथवा १००० के नोटों को तुरंत ही  बदलवाना पड़ा , इस सब को इन्हें  कम दामों पर देना पड़ा है . बाजार की दर थी ५०० रुपये का ४०० रुपये में बेचना तो आम बात थी.आकस्मिक लेकिन आवश्यक कार्यों के लिए हर व्यक्ति को इन पैसो  के लिए  दलालों के पास जाना पड़ा. यह काम कई करोड लोगों को करना पड़ा . इन दलालों की पौ बारह  हो गई है .

 

छोटे दुकानदारों, खोमचे और रेडी पर सामान  रख कर बेचने  वालों को हानि होनी शुरू हो गयी है  क्योकी बना सामन बिक नहीं रह है. गरीब आदमियों के बाजार बिलकुल खाली पड़े हैं . कानपूर का शीशामऊ बाजार जो आम दिनों में पैदल पार करना भी मुश्किल था  आजकल मोटर साइकिल चलाकर तेज़ी से निकल सकते हैं  और कही आपको रफ़्तार कम  करने की ज़रूरत नहीं होगी. कही कोई खरीदार नहीं मिलेगा .यह सारा व्यव्साय उनको जा रहा है जो लोग कार्ड से खरीदारी करते हैं . सरकार प्रचार कर रही है  कि मशीनॉ  से भुगतान करे. पे टीएम् के विज्ञापन रोज हमको यही बताते  हैं. ; लेकिन इसके लिए यह आवशयक है कि आपके पास एक स्मार्टफोन  हो यदि आप   १०,००० से अधिक कमाना चाहते हैं तो तो आपके पास एक  कर सूचना संख्या भी होनी चाहिए. छोटे दूकानदार इस हानि को बर्दाश्त नहीं  हीं कर पा  रहे हैं  और कई खोमचे वालों  ने अपनी  रेड़िया भी बेच दी हैं .यह प्रक्रिया केवल और अधिक तेज ही हो सकती है .

 

कारखाना बंदी बहुत तेज  रफ़्तार से  हो रही है . सूरत का हीरा  उद्योग, तिरुप्पूर , तमिल नाड, का कपड़ा उद्योग . यह दोनों निर्यात के केंद्र इस समय बुरी दशा से गुजर रहे हैं . तमाम कारखाने  बंद हो रहे हैं नीर्यात के आर्डर रद्द किये जा रहे हैं . बाकी  सभी औद्योगिक क्षेत्रों में भी कमोबेश यही दशा है . अधिकाँश उद्योगों में बंदी हैं और मजदूर सड़क पर आ गए है . उत्पादन चक्र टूट चूका है . पैसा नहीं होने से खरीदारी बंद है . खरीदारी बंद होने से वे उद्योग भी  बंद हो गए हैं. बंद होने के कारण मजदूर सडकों पर आते जा रहे हैं , जिससे वेतन ना मिलने के कारण  वे खरीदारी नहीं  कर पा रहे हैं  , जिससे उद्योग  और अधिक्  बंदी की ओर जा रहे हैं  . तमाम कारखाने  बैंकों से कर्जा लेकर काम करते हैं उन पर बैंकों का ब्याज ही  भारी  पड़ रहा  है. इनमें से तमाम कारखाने दुबारा चालू भी नहीं हो सकंगे , जब भी नगदी का संकट  समाप्त या कम होगा. इस प्रकार यह संकट मंदी में बदल सकता है , अर्थात बना माल बिके  नहीं, इसलिए नया माल बनना बंद हो जाय.इससे बेरोजगारी और अधिक हो जायगी , और लोगों की क्रय शक्ति और कम.  ऐसी अवस्था को ही मंदी कहते हैं जब बना हुआ माल बिकता नहीं इसलिए और  अधिक कारखाने बंद हो जाते है और जो माल बिक रहां  था वह भी बंद हो जाता है. एक ऐसा चक्र बन जाता है जिससे त्क़भी निकला जा सकता है जब पुराना माल बिक जाए और नया माल बनना शुरू हो.

 

दूसरी ओर बैंकों के पास बेंतेहा  राशि जमा हो गई है और इसलिए उनकी  ब्याज दरे  नीचे आ रही हैं. देश के कुल १० सर्वाधिक धनी  घरानों पर  ७.३ लाख करोड के कर्जा है जो बैंकों से लिया गया है  और यदि  बैंक अपने ब्याज की दर १% नीचे लाते हैं  तो इन सब को ७,३०० करोड रुँपुए का ब्याज देनदारी में लाभ हो होगा . इस प्रकार इस कार्य से गरीबो  की भलाई  के विपरीत , पैशेवर काला पैसा कमाने वाले उद्योपतियों को लाभ देने की तैय्यारी चल रही है.  यह  लगता है कि  फौरी तौर पर यह रोड़ा आ गया है  कि रिजर्व बैंक ने इस नई जमा राशि को नगद-आराक्षित अनुपात  के मद में अपने पास जमा कर लिया है , इसलिए यह सब फिलहाल टल गया है. लेकिन यह कुछ ही समय के लिये है उसके बाद यह लाभ होना स्स्वाभाविक है . यह लाभ इन कम्पनियों और बैंकों  को इसलिए हो रहा  है कि हम अपना पैसा  नहीं  निकाल सकते हैं .

 

बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जो अपने ५०० रुपये को बदलवा नहीं पायंगे , वे या तो बीमार होंगे अथवा बैंकों से बहुत दूरं होंगे  इत्यादि. बहुतेरे ऐसे भी हैं जो कतार में नही खड़े हो पायंगे.

 

अब आधार पर आ जाएँ देश में ५.८ करोड लोग ऐसे हैं जिनके पास आधार कार्ड नहीं है .ऐसे लोगों के पास और कोई परिचय पत्र कम ही होने की संभावना  है  और ऐसों के पास कोई बैंक में खाता  होगा इसकी संभावना भी कम है .भारत में लगभग सभी घरों में कुछ नगदी रखी जाती है ताकि किसी आपात काल   स्तिथी  से निपटा जा सके.  एक अध्धयन के अनुसार  ५९% प्रतिशत लोग अपनी समस्त बचत  नगदी में रखते हैं.

 

ये हानियाँ और लाभ स्थायी प्रक्रति  के हैं  . इनमें  कोई परिवर्तन नहीं  आयगा.  और यह धन दौलत का स्थानांतरण  किसी उत्पादक कार्यों से  नहीं हुआ है यह इसलिए हुआ है क्योंकि वे अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली हैं . इसे ही प्रतिगामी आर्थिक  नीति कहते हैं .

 

यह दावा कि यह काला पैसा को रोकेगा और यह नीति  काले पैसे को निकलवाने के लिए बनाई गयी है , बेबुनियाद है . वह इसलिए कि : सरकारी अनुमानों  के  ही अनुसार कुल काले पैसे  का  मात्र  ६%, मुद्रा नोट,  के रूप में रखा जाता है .बाकी  सभी पैसा  आभूषण, भवन निर्माण और अन्य व्यवसायी कार्यों में लगा रहता है .  काला पैसा कोइ  स्थिर चीज़ नही  है जो बण्डल के रूप में पड़ा रहता  है  और जिसे हम एक छापा मारकर प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वह लगातर  प्रवाह में है ,व्व्यव्साय    में प्रयोग हो रहा है . इसलिए  यदि नोट बंदी भी की जाती है  तो भी काला पैसा बाहर नहीं आयगा क्योंकि यह पैसा नोट  के रूप में नहीं है  और कर अधिकारियों का इंतज़ार नहीं कर रह है .इसलिए नोट बंदी या बैंक लौकेरों  पर छापे  से काला पैसा खतम नहीं होगा  हाँ वह कुछ मात्रा  में मिल सकता है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है उसके अनुसार सरकार को  यह आशा है कि वह ४००० करोड रुपये का काला पैसा निकलवा सकेगी.

 

यदि काले धन को निकलवाना एक लक्ष्य है तो यह राशि बहुत कम है और इसे  निकलवाने के लिए उठायी  हानि बहुत अधिक. वैसे भी  सरकार ने ऐसे कोई  कदम नहीं उठाये हैं जिससे  यह लगे कि वह काला धन निकलवाने के बारे में गंभीर  है. भारत के बजटों में,कंग्रेस  और अब भाजपा दोनों ने ही भागीदारी नोट्स ( PARTICIPATORY NOTES   PN या  पी एन  ) नामक योजना के तहत काले धन को बाहर से देश में लाने  के लिए  इस  योजना को लाया गया था इसके तहत, भारत में पैसा लगाने  वाले विदेशी  निवेश   संस्थाएं उन विदेशियों जो बिना अपना नाम और परिचय जाहिर कर , भारत में निवेश करना चाहती  हैं,  इन संस्थानों को यह अधिकार दिया ज्ञाय है कि वे ऐसे निवेशकों को पी एन  जारी कर सकते हैं  और इनको  भारत के  पूंजी बाजार में निवेषित किया जा सकता है. एक समय में तो भारत में शेयर बाजारों में लगे पैसे का आधा पी एन के द्वारा ही लगा हुआ था अब यह घटकर  १०% हों गया है. ये निवेशक गुमनाम हैं इनके  बारे  में जानकारी न करने की कानूनी बाध्यता है. ये देश में काले  पैसे का  बड़ा स्त्रोत है. ये पैसा भारत से बाहर गया हुआ है जिसके  मालिक भारत के अधिकारी  वर्ग, राजनेत और व्यवसायी हैं. इसी प्रकिया  से भारत में निवैश्  करने के बहुत सुगम रास्ता मॉरिशस  के साथ दोहरा कराधन  सन्धि है  इसके  तहत मॉरीशस में कंपनी खोलकर आप  भारत में निवेश कर सकते हैं और इस कंपनी को भारत  में कर नहीं देना होगा,. गत बजट में सरकार ने इनके लाभ पर पूंजी सवर्धन कर लगाया है  ; इसके बावजूद  संधि ऐसी है जिससे कर से बचा जा सकता है  और इसमें भे इतनी परतें हैं किन असली मालकों कमालुम भी नहीं पडता है. यह भी काले पैसे को देश में पैसे लाने  का एक अच्छा साधन है.

 

भारत से पैसा बाहर नहीं जा सके और काला बाज़ारिये  पकडे जाय, इसके लिए २०१२ में जब प्रणब मुख़र्जी वित्त मंत्री थे, उस समय सामान्य कर बचाव नियमावली बनायी गयी थी  और इसे लोक सभा द्वारा पास कर दियागयाथा और इसे  लागू करने  की तारीख तय होनी बाकी थी. लेकिन यह लागू ना हो इसलिए प्रणब मुख़र्जी को राष्ट्रपति बना दिया गया और इस क़ानून को पास करना नए वित्त मंत्री चिदामब्रम द्वारा स्थगित कर दिया गया था  और उसके बाद की नरेन्द्र मोदी  सरकार भी इस लागू करने  की तारिख हर वर्ष आगे बढ़ा देती है  और यह तारीख २०१८ है. और साथ ही यह भी  घोषणा कर दी गई है कि यह  नियम  अप्रैल  २०१७ से पहले के सौदों पर लागू नहीं होंगे . अर्थात  नोट बंदी से छोटे सूटकेस   वालों को एक मौसम में हानि उठानी पड़ेगी, उसके  बाद से फिर वही सब दुबारा चालू हो जायगा.  इस प्रकार न तो नरेन्द्र मोदी सरकार और ना ही मन मोहन सिंह की सरकार ही काले धन को निकलवाने के बारे में गंभीर है .ये दोनों ही सरकारें     और उनकी पार्टियां पूंजीपति वर्गों को कोई तकलीफ देना तो दूर वह  इन्ही की प्रतिनिधि पार्टियां हैं और इन्ही के लाभ के लिए काम करती हैं .

 

१.   ऐसी दशा में हामारी  मांग यह है कि  १. सरकार जिन मजदूरों और उद्योगों की क्षति हुई है उनको तुरंत ही मुआवजा दे.उनकी समूची इस दौर का समूचा  वेतन  तथा उत्पादन को हुए नुक्सान की भार्पाये करे.

 

२. जिन किसानों को नकदी संकट  के कारण खरीफ बेचने में और रबी की फसल देरसे लगाने के कारण  जो नुक्सान हुआ है उसका मुआवजा  दे.

 

३. सभी स्थानों पर लंगर  खोल कर ऐसे  सभी लोगों को भोजन उपलब्ध कराये जो किसी प्रकार के सुरक्षा कवच अर्थात  सामजिक सुरक्षा की योजना के दायरे में नहीं आते हैं .४. इस बात का आंकलन करने के लिए इस नोट बंदी से कितनी हानि हुई है , एक विशाशाग्यों की कमेटी बनाई  जानी चाहिए जो इस रिपोर्ट को त्वरित आधार पर तैयार करके इस प्रस्तुत करे.

 

निवेदक : राम शंकर ,नवल कुमार मिश्रा ,कैलाश राजभर, सुश्री कुसुम ,श्रीमती आशा देवी,  सुश्री गीता , मनोज तिवारी , डॉ आर डी सिंह,  सतीश समुद्रे, सुजीत समुद्रे , विजय चावला ,

 

युवा  भारत  और इंडियन काउन्सिल  ऑफ ट्रेड यूनियंस

कानपूर जिला इकाई

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एका अराजकतेतुन अधिक अराजकतेत….

हिटलरच्या प्रेमात मोठ्या प्रमाणात आपल्याकडे लोकं आहेत. डोकी गहाण ठेऊन एखाद्या मसिहाला समाजाच्या उद्धाराचे काँट्रँक्ट देण्याच्या प्रवृत्तीने हिटलर मोदींसारखे घटक उदयास येत असतात.   मसीहा हा माण…

Source: एका अराजकतेतुन अधिक अराजकतेत….

 पुरुषांनी आपली जात दाखवत स्री जातीवरती केलेल्या पाशवी अत्याचाराचा जाहीर निषेध.

 

कोपर्डी येथे एका अल्पवयीन मुलीवर (छकुली) सामुहिक बलात्कार करून तिची निर्घुण हत्या करण्यात आली. पुरुषसत्ताक व्यवस्थेचे वर्चस्व भारतीय समाजात वाढल्यापासून स्री जातीवरील अन्याय, अत्याचारात दिवसेंदिवस वाढ होत असतानाच त्यांचे स्वरूपही अत्यंत विकृत व अमानुष होताना दिसत आहे. स्री ही एक उपभोग्य वस्तू बनलेल्या समाजात ती उच्च शिक्षीत असो वा निरक्षर, व्यावसायिक असो वा कष्टकरी-कामगार-मजूर, बालिका असो वा वयोवृद्ध, अपंग, मतिमंद तरुणी असो वा आश्रम शाळेतील विद्यार्थिनी, तोकड्या कपड्यातील स्वतःला आधुनिक म्हणवणारी तरुणी असो वा पूर्ण अंग झाकून घेतलेली शालीन, कुलीन ठरवलेली पारंपरिक स्त्री यातील कुणीच पुरुषी शोषणापासून, हिंसाचारापासून मुक्त होऊ शकत नाहीत. घरात आणि घराच्या बाहेर लैंगिक अत्याचार, बलात्कार, हिंसाचार, अन्याय, भेदभाव व स्री म्हणून मिळणारी दुय्यमत्वाची वागणूक पदोपदी वाटयाला येत असल्याने स्त्रीचे जीवन असुरक्षित झाले आहे. त्याचीच परिणीती म्हणून आज आपण कोपर्डी येथील घटनेकडे पहिले पाहिजे.
भारतात इंग्रजांच्या काळात स्री प्रश्न हा येथील पुरुषांच्या आधुनिक व सुसंस्कृत असण्याचं परिमाण होता. स्वातंत्र्य आंदोलनानेही येथील ‘स्रीशूद्रातिशूद्र’ यांच्या मुक्तीच्या लढयाची परंपरा दुय्यम ठरविली. सर्व प्रकारच्या विषमतांना (स्री-पुरुष, गरीब-श्रीमंत, सवर्ण-अवर्ण, श्रेष्ठ-कनिष्ठ) नाकारणाऱ्या समतामुलक, मानवतावादी श्रमण- जैन, बौद्ध, महानुभाव, लिंगायत, सुफी, वारकरी परंपरांना छेद देणारी विषमतावादी ब्राह्मणी, भांडवली मूल्यव्यवस्था व जीवनशैली समाजावर लादली गेली. ही विषमतावादी मूल्ये प्रबळ होत असतानाच स्वातंत्र्योत्तर काळात झालेल्या विषम आर्थिक विकासाची किंमतही वरील शोषित-पिडीत घटकांनाच मोजावी लागली. त्याच काळात हरित क्रांती आणि सहकारातून गब्बर झालेले जमीनदार, कारखानदार आणि व्यावसायिक यांच्यामध्ये एक प्रकारचा अहंगंड निर्माण झालेला दिसतो. तसेच आपल्या समाजातील विषम सामाजिक-आर्थिक-राजकीय व्यवस्थेमुळे पराभूत मानसिकतेपोटी न्युनगंडात जगणारा एक वर्ग तयार झालेला आहे. अहंगंडातून येणारा माज व न्यूनगंडातून निर्माण होणारी असूया शेवटी कुठल्यातरी स्रीच्याच शरीराचा चावा घेऊन शमविली जाते. त्यात भर पडली आहे ती जागतिकीकरणातून आलेल्या किळसवाण्या उपभोगवादी, चंगळवादी मूल्यांची. प्रत्येक क्षणाचा पाशवी आनंद घेण्याच्या वृत्तीतूनही स्रीयांचे शोषण व अत्याचाराच्या घटना वाढत आहेत.
यवतमाळच्या प्रतिष्ठित शाळेतील शिक्षकांकडून बालिकांचे झालेले लैंगिक शोषण असो, चंद्रपुरात बालिकेवर झालेला बलात्कार, शासकीय वैद्यकीय अधिकारी डॉ. मनीषा महाजन यांचा आरोग्य मंत्र्याच्या स्वीय सहायकाने केलेला विनयभंग व त्यानंतरची दमदाटी या सर्व प्रकाराला वैतागून डॉ. महाजन यांनी केलेला आत्महत्येचा प्रयत्न असो, मंत्र्याकडून महिला अधिकाऱ्याचा छळ झाल्याचा नुकताच विधान परिषदेत झालेला आरोप. या सर्व घटना समाजातील स्त्रीचे जीवन असह्य होत असल्याचे निदर्शक आहे. स्रियांच्या स्वातंत्र्याच्या बाबतीत आपला समाज नेहमीच संकुचित व बीभत्स स्वरूप धारण करतो. आशा शिंदेचे किंवा कोल्हापूरच्या मेघाचे जोडीदार निवडणे असो वा खर्डा येथील प्रेमाचा बळी, निर्भयाच्या लैंगिक स्वातंत्र्यावर जबरदस्तीने घातलेला घाला असो वा कोपर्डी येथील छकुलीचे अस्तित्व नाकारणे असो यातून आपला पुरुषी समाज किती कामांध, हिंस्र व अमानुष आहे हेच दिसून आले आहे. वेगवेगळ्या जातीय वा धार्मिक दंगली असो तेथेही स्री चे शरीर हेच लढाईचे रणांगण ठरत असते.
कोपर्डी येथे घडलेली घटना ही संपूर्ण समाजमनाला हादरून टाकणारी आहे. येथे एका मुलीचा जीव गेला आहे आणि तिचा जीव घेणाऱ्या गुन्हेगारांना शिक्षा होऊन तिला न्याय मिळाला पाहिजे ही एक प्रामाणिक भावना आहे. आणि ही भावना समाजातील सगळ्या जात-वर्गातून तीव्रपणे व्यक्त होत आहे. परंतु तरीही या घटनेला संकुचित राजकीय उद्देशाने जातीय रंग दिला जात आहे. समाजामध्ये तेढ निर्माण करून मराठा विरुद्ध दलित अशी दुही निर्माण करण्याचा समाजविघातक प्रयत्न अशा लोकांकडून केला जात आहे. यामुळे हा वाद फक्त दोन्ही गटातील पुरुषांच्या पुरुषी सत्तासंबंधांच्या किंवा हितसंबंधांच्या छायेखाली झाकोळून जाऊन मुळचा स्री-प्रश्न मात्र बाजूला पडण्याचीच जास्त शक्यता आहे. स्वतंत्रपणे स्री-प्रश्नांना भिडण्याची ताकद भारतीय पुरुषांच्या अंगी असलेली दिसत नाही. सतत ते स्रियांच्या शरीराची ढाल करून आपले पुरुषी हितसंबंध जोपासत असतात. स्री दास्याच्या, स्री-शोषणाच्या कारण असलेल्या मूळ सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक व राजकीय संरचानाना कधीही प्रश्न विचारले जात नाहीत. त्यामुळे कडक कायदे झाले तरी स्रीयांवर अत्याचार होत आलेले आहेत आणि यापुढील काळातही होतील अशीच परिस्थिती आहे. कारण चालू असलेल्या या वादातून किंवा पुरुषी हितसंबंधांच्या चढाओढीतून निर्माण होणारी सुडाची भावना परत एकदा कुठल्यातरी स्रियांचे लचके तोडण्यातच समाधान मानणारी असते. म्हणून या सूड चक्राची पुढची बळी ‘मी तर नसेल ना’ किंवा ‘माझ्या कुटुंबातील स्त्री तर नसेल ना’ ही भीती आपल्या समाजमनावर सतत घोंगावत राहणार आहे.
अशा परिस्थितीत कोपर्डी येथील पीडित मुलीला खरा न्याय कोणता असेल तर तो यापुढील काळात कुठल्याही मुलीवर, आईवर, बहिणीवर अत्याचार होणार नाहीत असा समाज निर्माण करणे होय. त्यासाठी आपल्या समाजातील पुरुषसत्तेचा, पुरुषी मानसिकतेचा बिमोड करणे, कुठल्याही जात-वर्गातील घटकांमध्ये अहंगंड निर्माण होणार नाही किंवा ते न्यूनगंडाचे शिकार होणार नाहीत असा संतुलित आर्थिक-सामाजिक विकास घडवून आणणे, बाजारू व उपभोगवादी मूल्यांना विरोध करणे किंवा त्यांचा उच्छेद करणे गरजेचे आहे. स्री च्या व्यक्ती म्हणूनच्या स्वतंत्र अस्तित्वाचा मान राखला पाहिजे.

 मुळापासून स्री-प्रश्न सोडविला जावा अशी प्रबळ इच्छाशक्ती आजपर्यंत कुठल्याही राज्यकर्त्यांची नव्हती व आजही असलेली दिसत नाही. सरकारने एखादा कायदा केला तरी त्याच्या अंमलबजावणीचा प्रश्न आ वासून उभा असतोच. त्यामुळे आपल्या दृष्टीने महात्मा फुले, ताराबाई शिंदे, छत्रपती शाहूमहाराज व डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी स्रियांच्या मुक्तीसाठी प्रस्थापित सामाजिक-आर्थिक संरचनांविषयी जे प्रश्न उपस्थित केले तेच आज नव्याने उपस्थित करण्याची गरज आहे. स्री-पुरुष समतेसाठी व त्यांच्या सन्मानासाठी व्यक्तिगत व सामुहिक पातळीवरती प्रत्येक व्यक्तीने प्रयत्न करावेत असे आवाहन आपणा सर्वांना युवा भारत संघटनेकडून करण्यात येत आहे.

                (युवा भारत राज्य समिती  कडून जारी..)

विनोद भुजबळ ९५०३४८६०३३ सुरेश सोमकुवर ९७६६१२४५६१

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रोहीत वेमुलाच्या आत्महत्येचा अन्वयार्थ’ सदरील पुस्तक युवा भारत राज्य समिती महाराष्ट्र ने प्रकाशीत केले आहे.

जेएनयू पर हमले के निहितार्थ

रोहित की आत्महत्या के बाद पूरा देश इस आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या करार देते हत्यारों को दण्डित किये जाने की मांग को लेकर आंदोलित है. इसी बीच जेएनयू मे एक कार्यक्रम मे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाने की खबर आने के बाद जिस तरह केंद्र सरकार और सत्ताधारी पार्टी विवि कैंपस मे हस्तक्षेप कर रही है एवं बिना गहरी छानबीन के छात्रसंघ अध्यक्ष को राष्ट्रद्रोही करार दे चुकी है,इसे देखते हुए आंदोलित समुदाय के गुस्से में बेतहाशा वृद्धि हुयी है.
यूजीसी द्वारा फंड कट एवं नॉन-नेट स्कॉलरशिप का निर्णय आने के बाद उसके मुखर विरोध की शुरुआत भी इसी विवि से हुयी थी. आकुपाय यूजीसी के नाम से शुरू हुए इस आन्दोलन ने फेलोशिप से लेकर शिक्षा के निजीकरण एवं भगवाकरण के विरोध मे अपनी उपस्तिथी दर्ज करायी. नॉन नेट फेलोशिप एवं फंड कट के विरोध में देशभर के जो कँम्पस आंदोलित दिखे वह सभी कँम्पस रोहीत की आत्महत्या के मामले को लेकर मौजूदा सरकार के विरोध में संगठित होकर आंदोलनरत है ।सरकार को पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे दिए जाने की चिंता से ज्यादा छात्र समुदाय के फेलोशिप से लेकर दलित उत्पीडन के सवालो पर संगठित होने की चिंता है. हमारे प्रधानसेवक पूंजी के दबाव मे शरीफ साहब के साथ बिना तय कार्यक्रम के लंच पर चले जाते है एवं अफजल गुरु का समर्थन करनेवाली पार्टी के साथ कश्मीर मे उनकी पार्टी सत्तासुख मे लीन है. मेक इन इंडीया मे भारी निवेश की आशंका टूट चुक है.,पाटीदार आन्दोलन के बाद गुजरात विकास का गुब्बारा फूट गया है,पाटीदार से लेकर जाट अहमदाबाद से दिल्ली तक के इलाके के किसान समुदाय औद्योगिक विकास का गुब्बारा फूट जाने एवं कृषी के संकट में आने की वजह से आरक्षण की मांग को लेकर मौजूदा सरकार के नाक में दम कर रहा है. विश्व अर्थव्यवस्था २००८ के संकट से जल्द ही उभर पाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे है. आनन फानन में घोषित भूमि अधिग्रहण एवं श्रम सुधारो का निर्णय सरकार द्वारा घोषित किए जाने के बाद किसान एवं मजदूरों के बीच से एक असंतोष भी उभरा है. इन सब स्तिथियों के मद्देनजर मौजूदा सरकार का भयाक्रांत होना स्वाभाविक है. चारो तरफ उभर रहा असंतोष एवं विष अर्थव्यवस्था की मंदी के बीच फेलोशिप की मांग से शुरू हुआ आकुपाय यूजीसी आन्दोलन कही आकुपाय आल स्ट्रीट मे न परिणत हो जाए इसकी चिंता ज्यादा दिखती है. पूंजीवाद जब अपने संकट के दौर मे होता है एवं अलग अलग वर्गों द्वारा सत्ता के ऊपर जब सवालात खड़े किए जाने लगते है तब सत्ता फासीवादी ही हो सकती है. यह शासकवर्ग का चरित्र है,कांग्रेस या बीजेपी का नहीं.इंदिराजी का घोषित आपातकाल एवं मोदीजी के अघोषित आपातकाल मे आपको सांप्रदायिकता के उफान,अभिव्यक्ती का दमन जैसी बहुत कुछ समानताये इसलिए भी दिख सकती है.
दलित उत्पीडन के सवाल से दो हाथ कर रहे दलित पृष्टभूमि से आए छात्र रोहित द्वारा सत्ता को उसकी राष्ट्र की परिभाषा मे दलितों,अल्पसंख्यको,किसानो,मजदूरों का क्या स्थान होगा यह सवाल पूछना नागवार गुजरा एवं अभाविप नेता से लेकर केन्द्रीय मंत्री द्वारा बुने गए जाल ने रोहित की जान ली. इसी तरह का जाल अब जेएनयू के छात्रो के लिए बुना जा रहा है.
जेएनयू में अफजल गूरू की फासी की तीसरी बरसी पर गूरू की फासी को न्यायिक हत्या बताते हूए किए गए कार्यक्रम में पाकीस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये जाने की खबर है. यह नारे किन लोगो की तरफ से लगाए गए इसको लेकर अबतक कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आयी है.यह नारे अभाविप द्वारा लगाये जाने की खबरे भी है. अगर ऐसे नारे लगाये गए है तो उसका समर्थन कतई नही किया जाना चाहीए | पाकीस्तान का धर्माधारीत राष्ट्रवाद की वजह से जो हश्र हूआ है उसे देखते हूए मै इसका कतई समर्थन नही करता हु. विभिन्न भाषा,संस्कृती,राष्ट्रीयताओ वाले भारत देश मे धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने का सपना पाले हुए जो लोग हिन्दूस्थान जिंदाबाद करते रहते है उनको भी हिन्दुस्थान जिंदाबाद कहने से पहले पाकिस्तान का हश्र देख लेना चाहिए.भारत एक देश है,जिसमे विभिन्न राष्ट्रीयताए है,उनकी अपनी भाषा,संस्कृती और इतिहास है. इसके बावजूद भारत के सत्ताधारी वर्ग द्वारा एक भाषा एवं एक संस्कृती के नाम पर इन सबको एक राष्ट्रीयता मे ढालने का प्रयास रहा है. इस प्रयास के विरोध मे आसाम,कश्मीर,मणिपुर,नागालैंड आदी जगह संघर्ष जारी है. भारत को एक राष्ट्र मे ढालने की कोशिश के विरोध मे अपने स्वनिर्णय,स्वशासन के अधिकार को लेकर कोई भी भाषाई या सामाजिक समूह खड़ा होता है तो सत्ताधारी जमात उसका दमन करने मे कोई कसर नहीं छोड़ती.इस मामले मे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों के रवैये मे कोई खास फर्क नहीं है. एक सेकुलर राष्ट्रवादी है तो दूसरा धार्मिक राष्ट्रवादी. कांग्रेस के पुरे शासनकाल का अगर बारीकीसे अध्ययन किया जाए तो उनके लिए छद्म सेकुलर शब्द ज्यादा उपयोगी सिद्ध हो सकता है.
जेएनयू मे जो कार्यक्रम किया गया उसके केंद्र मे कश्मीर का मुद्दा था. भारत की एवं पाकिस्तान की स्वाधीनता के साथ ही कश्मीर की स्वाधीनता लूट ली गयी है. कश्मीरी अफजल गुरू को न्यायिक प्रक्रिया मे गड़बड़ी करते हुए यूपीए सरकार ने खुद को अपने प्रतिद्वंदी से ज्यादा राष्ट्रवादी सिद्ध करने के चक्कर मे एवं जनता मे राष्ट्रवादी भावनाओ को उबाल कर पुनः सत्ता मे लौटने के लिए फासी पर लटकाया था. कश्मीर के स्वनिर्णय का मुद्दा,वंहा की जनता की इच्छा,उनके अपने राष्ट्रवाद के मायने को दरकिनार कर पाकिस्तान जिंदाबाद या हिन्दुस्थान जिंदाबाद बुलंद करने से हम और आप राष्ट्रवादी जरूर हो सकते है लेकिन यह सब करने के लिए हमको या आपको दूसरो की राष्ट्रीयता की भावना का खून करने की इजाजत कैसे हो सकती है..?
राष्ट्रवादी भावनाओं को उछालकर दोनों देशो का सत्ताधारी वर्ग जनता के दमन की राजनीती करता रहा है. दोनों भी देश अपने यंहा की राष्ट्रीयताओ को दमन करने के मामले में कई भी कम नहीं है.खुद को राष्ट्रवादी कहलानेवाले राष्ट्रवादीयों को उनकी परिभाषा में मेहनतकश दलितो,बहूजनो,आदिवासी एवं महीलाओं का स्थान क्या है..? अलग-अलग भाषिक एवं वांशिक समूहों क्या अधिकार होंगे .? यह सवाल पूछा जाना चाहीए | साथ ही हम सबको मेहनतकश दलितो,बहूजनो,आदिवासी एवं महीलाओं की मूक्ती का रास्ता किस वैकल्पिक राष्ट्रवाद से होकर गूजरेगा इसकी चर्चा भी करनी चाहीए | राष्ट्रवाद सबंधी लढाई को सर्वहारा के इन्कलाब तक ले जाने की चूनौती को हमे स्वीकारना होगा तभी हम इस अघोषित आपातकाल का सामना कर पाएंगे |

मौजूदा सरकार द्वारा जेएनयू के छात्रो की अभिव्यक्ती को कूचलने के लिए उनपर राष्ट्रद्रोह का चार्ज लगाना निंदनिय है | रोहीत को भी सत्ताधारी वर्ग के द्वारा राष्ट्रविरोधी गतिविधीयों में सामील होने का ठप्पा लगाकर प्रताडीत कीया गया था | आत्महत्या के बाद राष्ट्रवाद की परिभाषा को चूनौती देने सें बचने वाली ताकतो के लिए जेएनयू की यह घटना एक बडी ताकीद है | लढाई सिर्फ सहीष्णूता या असहीष्णूता,दलित-गैरदलित के बीच की नही बल्की सत्ताधारी राष्ट्रवाद एवं जनता के राष्ट्रवाद के बीच की लढाई है |
– दयानंद कनकदंडे

       रोहीत वेमूल्लाकी आत्महत्या के मायने क्या है ..?

रोहीत वेमूल्लाकी आत्महत्या के मायने क्या है ..?
– दयानंद कनकदंडे

हैद्राबाद केंद्रिय विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहीत वेमूल्ला की
आत्महत्या के बाद देश के कोने-कोने से,चंद्रपूर से मूंबई, पूणे से चेन्नई, हैद्राबाद
से दिल्ली तक एक जनाक्रोश सडको पर उतरा है । नॉन नेट फेलोशिप एवं फंड
कट के विरोध में देशभर के जो कँम्पस आंदोलित दिखे वह सभी कँम्पस रोहीत की
आत्महत्या के मामले को लेकर मौजूदा सरकार के विरोध संगठित होकर
आंदोलनरत है । रोहीत के दलित होने की वजह से एवं मौजूदा सरकार जिस
पार्टी की है,उसका दलितविरोधी चरीत्र देखते हूए यह मूद्दा मोटे तौर दलित
उत्पीडन के तौर पर समाज में अपनी जगह ले रहा है ।
देशभर के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानो में नजदिकी समय में छात्रो
द्वारा आत्महत्यांओ की घटनाए सामने आ रही है । संस्थानो के भीतर के जातिवादी
माहौल,फीस में बढौत्तरी,शिक्षा के कर्ज को न चूका पाने से लेकर रोजगार के
क्षेत्र में निर्मित असूरक्षितताओं की वजह से आत्महत्या का रास्ता चूना है । रोहीत
की घटना के कूछ दिनों बाद ही तमिलनाडू के सलेम मेडीकल कॉलेज की छात्रा-
ओं की आत्महत्या का मामला भी सामने आ चूका है। साथ ही जातिवादी माहौल
से त्रस्त छात्रो की आत्महत्याओं के मामलो पर भी रोशनी पडने लगी है ।
रोहीत की आत्महत्या का कारण तणाव (Depression) होने की बात
भी इसी बीच कही जा रही है । जो लोग यह बात कह रहे है वह लोग तनाव को
निर्मित करनेवाले आर्थिक, सामाजिक, राजनीतीक कारणों के उपर से ध्यान हटाना
चाहते है । कोई भी व्यक्ती अपने जीवन में आत्यंतिक बेगानेपण (Alienation)
को महसूस करता है एवं असूरक्षितता को छेदने का रास्ता नही पाता है तो आत्म-
हत्या को आखरी रास्ते के रूप में पाता है । किसी उत्पीडीत आम द्वारा ऐसे
कीए जाने की घटना,बीते दशकभर लाखो किसांनो द्वारा कृषि संकट से नि-
र्मित जीवन के खालीपण को मरने की अर्थपूर्णता से भरने का प्रयास कोई विरोध
का हथियार नही है,बल्की हताशा का सामूहीकता में बदल जाना है । आजकल
बडी संख्या में हो रही छात्र आत्महत्याएं भी इसीकी कडी तो नही । हताशा का
आत्महत्याओं जैसी सामूहीक परिघटना में बदल जाना बेगानेपण,मानवी जीवन में
निर्मित खालीपन को जिम्मेवार व्यवस्था के विरोध में समग्रता लढाई खडी करने
की मॉंग करता है ।
शैक्षणिक संस्थानो में जातिवाद और द्वेष भावनाओं का पूरा वातावरण है,
जिसकी वजह से दलित, आदिवासी, ओबीसी आदी बहूजन तबकों के विद्यार्थीयों
का जीवन मूश्किलो से भर जाता है । इन मूश्किलो के विरोध में लडने के साथ- साथ
अपनी सांस्कृतिक विरासत को आजके भौतिक सवालों के साथ जोडकर उठाने
का चलन आजकल शिक्षा संस्थानो में बढ रहा है । आयआयटी चेन्नई से लेकर
हैद्राबाद की आंबेडकर स्टूडंटस असोसिएशन गतिविधीया इसके प्रमाण कहे
जा सकते है ।
रोहीत एवं उसका संगठन कँम्पस में हो रहे दलित छात्रो के उत्पीडन को
लेकर लगातार आवाजे उठाता रहा है । याकूब मेमन की  फासी को आजीवन कारावास
में बदलने की इस संगठन की मॉंग रही है । देशभर में उठ रहे गोमांस खाने या
न खाने की बहस के बीच यह समूह खाना चूनने की आजादी के पक्ष में रहा है ।
मूजफ्फरनगर दंगा पीडीतो के प्रति अपनी जाहीर संवेदना व्यक्त कर चूका है ।
१६ जनवरी २०१६ को रोहीत द्वारा आत्महत्या करने के १२-१३ दिन पूर्व
रोहीत सहीत ५ दलित छात्रो को यूनिव्हर्सिटी हॉस्टल से राष्ट्रविरोधी गतिविधीयों में
संलिप्त होने का कारण देकर निष्कासित कीया गया था । यह सभी छात्र उस दिन
सें आसमान के नीचे बसेरा करने को मजबूर थे । पिछले कूछ महीनो से रोहीत
आर्थिक तंगी का सामना कर रहे थे । उनको मिलनेवाली फेलोशिप को रोका गया था,जो
१.७५ लाख रूपये थी । इस बीच उन्हे अपनी जीवीका चलाने के लिए ४०,०००
रूपये का कर्जा भी दोस्त की तरफ से लेना पडा था । अपने एवं साथीयों
के उत्पीडन के विरोध में लडनेवाले एवं राष्ट्रविरोधी ठहराए जाने का दंश
झेल रहे रोहीत ने चारो तरफ से असूरक्षितता से घेरे जाने के बीच आत्महत्या
कर ली । अपने द्वारा लिखे गए सूसायडल नोट में जीवन मेें निर्मित रिक्तताओं से
उब जाने की ओर इशारा किया है ।  रोहीत द्वारा मौजूदा सरकार की नीतीयों
के खिलाफ बोलना भाजपा के लिए नागवार गूजरा एवं उसके छात्र संगठन के
नेता से लेकर मानव संसाधन विकास मंत्री द्वारा बिछाए गए जाल ने उसकी जान ली.।
रोहीतकी आत्महत्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष  दलित उत्पीडन  है और
यह व्यवस्था जो की दलितविरोधी है उसका मूखर विरोध किया जाना चाहीए |
रोहीत याकूब से लेकर मूजफ्फरनगर तक के विषयोपर अपनी राय रखने के
कारण जिस तरह से राष्ट्रविरोधी करार दिया गया है,उस व्यवस्था को उसकी
राष्ट्र की अवधारणा में विभिन्न धर्मीय दलितो,बहूजनो,आदिवासीयों का,किसान मजदूरो
की क्या हैसियत होगी..? यह सवाल भी पूछा जाना चाहीए | अखलाक की हत्या,किसानों
की आत्महत्याओं के लिए जिम्मेवार मौजूदा व्यवस्था दलितविरोधी, किसानविरोधी एवं
मजदूर विरोधी भी है,इसलिए मौजूदा सरकार को सिर्फ दलितविरोधी कहना
सरकार के अपराधोंको कम करने ऑंकने जैसा है |
आज की जो दलित राजनीती है वह मूख्यत: पहचान की राजनीती
तक सीमीत हो गयी है उसे सत्ताधारी जाती-वर्ग द्वारा समरसता की धारा में घोल
लिया गया है | भारत का जो वामपंथ है वह भी अपनी जातीसबंधी भूमिका
को लेकर अपनी अधिकारीक  लाइन में किसी भी तरह का परीवर्तन किए बिना
दलित पहचान की राजनीती करनें मे जूटा हूआ दिखता है,यह एक प्रकार की
वाम समरसता है |   रोहीत दलितों के बीच के नये वर्ग का प्रतिनिधी है | रोहीत की यात्रा अभाविप से एएसए व्हाया एसएफआय रही है| रोहीत की एएसएमार्का दलित राजनीती दक्षिणपंथी समरसता एवं वामपंथी समरसता इस सीमांओ को तोडने का प्रयास था | इसलिए वह याकूब से लेकर मूजफ्फरनगर पर कूछ कहने की कोशिश कर रहा था |
पूर्ववर्ती कॉंग्रेसी सरकार की जनविरोधी की नीतीयों के जवाब में जनता ने मौजूदा सरकार का चूनाव किया है | बीच के समय में सभी जातीयों  से उपजी नयी पीढी जिसे कूछ लोग नये वर्ग के उदय के रूप में चिन्हीत करते हूए नवसर्वहारा कहना
पसंद करते है; ने इसे सत्तासीन करने मे मूख्य भूमिका
निभायी थी | फेलोशिप बंद करने,अपात्र व्यक्तीयों की संस्थानो में नियूक्ती
करने,अभिव्यक्ती की आजादी कूचलने के निर्णय आने के बाद आयआयटी चेन्नई से लेकर हैद्राबाद तक फूटा इस वर्ग का असंतोष अगर मजदूरो, किसानो,महीलाओं,
दलितो की असूरक्षितताओं के साथ मिलकर संगठीत रूप में मौजूदा व्यवस्था
के विरोध में खडा नही होता है तो, यह असंतोष शासकवर्ग की इस या उस
पार्टी की सत्तास्थापना में सहाय्यकारी हो जाएगा |
देशभर में खडे हो रहे छात्र आंदोलन  के दरमियान रोहीत वेमूल्ला
की आत्महत्या ने हमको इन सब चीजों पर सोचने को मजबूर किया है | महाराष्ट्र में शाहीर विलास घोगरे ने १९९७ मे रमाबाई नगर गोलीबारी के बाद आहत होकर आत्महत्या की थी | रोहीत की आत्महत्या का नाता मै उससे जोडना चाहूंगा और यह आशा करना चाहूंगा की,
रोहीत के आत्महत्या के बाद अपने अंदर झॉंके | रोहीत की आत्महत्या से दू:खी होने के बावजूद हमें एकजूट होकर लढना चाहीए एवं आत्महत्या के प्रतिरोध के हथियार
के रूप में बदलने के खिलाफ हमें जूट जाना चाहीए | रोहीत एक कार्यकर्ता
था और मै मानता हूँ की, मैने जिन सवालो की चर्चा करने की कोशिश की है उससे
उसका सरोकार था |

(लेखक छात्र-यूवा संगठन यूवा भारत के अ.भा.समन्वयक है)

Occupy UGC ! Occupy Wallstreet ! Occupy All street !

ऑक्यूपाय युजीसी ! ऑक्यूपाय वालस्ट्रीट ! ऑक्यूपाय आल स्ट्रीट !

– दयानंद कनकदंडे
– Dayanandk77@gmail.com
नॉन-नेट स्कॉलरशिप के दुरुपयोग एवं अपारदर्शिता का कारण देकर युजीसी द्वारा स्कॉलरशिप को खत्म करने कि घोषणा के बाद ही दिल्ली के केंद्रीय विश्वविद्यालयो के छात्रो का गुस्सा इस निर्णय के विरोध मे फूट पडा .. फंड कट एवं नॉन नेट फेलोशिप खत्म करणे के निर्णय के विरोध में युजीसी दफ्तर का घेराव करते हुये occupy UGC आंदोलन शुरू हुआ और इस निर्णय को वापस लेने,फेलोशिप कि रक्कम बढाने एवं इस योजना का राज्य के विश्वविद्यालयो में विस्तार करणे कि मांगो के साथ यह आंदोलन पुलीस द्वारा बारबार पीटे जाने,पुलिस हिरासत में रखे जाने के बावजुद दिल्ली से निकलकर भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयो में फैलने लगा है ..
पिछले साल भर मे कलकत्ता,चेन्नई,पुणे और अब दिल्ली जैसे महानगरो मे रह्नेवालो छात्रो के गुस्सो का इजहार ऐसे अनेको मौको पर दिखायी पडा है लेकीन कोई भी असंतोष शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलावो को लेकर समग्रता के साथ अपनी बात रखणे में नाकामयाब सा दिखायी पडा है,लेकीन इस आंदोलन और आंदोलन के दरमियान इसकी देशभर हुयी पहुंच को देखते हुये इस सवाल को बहस के केंद्र मे लाने का अवसर जरूर प्राप्त हुआ है.
१६ मई २०१५ के दिन मोदी के सत्ता पर आने की परीघटना एक राजनीतिक परीघटना है जिसने आर्थिक सुधारो का अधिकृत दक्षिणपंथी मोड लिया है.. वर्तमान सरकार शिक्षा को पुरी तरह से बाजार कि वस्तू बना देने के लिए कदम उठा रही है ,इसके विरोध मे जरूर लढना चाहिये लेकीन यह भी नही भूलना चाहिए कि,यूपीए १ के दौरान जो आर्थिक सुधार हुए जिसमे जमीन हथियाने के लिए बदनाम सेज कानून भी है, उसके लिए वाम मोर्चा अपनी जिम्मेवारी से नही बच सकता. occupy UGC आंदोलन ने घोषणा कि है… Education not for sale .. शिक्षा बाजार कि वस्तू नही है .. यह ऐलान अपने आप मे बहुत ही सकारात्मक है लेकीन शिक्षा बाजार कि वस्तू नही है तो, फिर क्या है …? इस सवाल के जवाब को खोजे बिना हम आगे की राह को नही पकड सकते है .

विश्व व्यापार संगठण के साथ भारत ने देश की कृषि से लेकर शिक्षा सबको बाजार कि वस्तू बना देने का अनुबंध किया है. भारत द्वारा GAAT समझौते पार हस्ताक्षर किए जाने के बाद से ही कृषि से लेकर शिक्षा तक सभी चीजो को बाजार के लिए खोल देने का दबाव है.विश्व स्तर पर जितने भी देशो ने इस अनुबंध पर हस्ताक्षर किए है उन सभी को शिक्षा के क्षेत्र को बाजार के लिए खोल देने का दबाव है.ज्ञान का मतलब विश्वविद्यालयो मे दि जानेवाली शिक्षा के साथ साथ उससे भी व्यापक अर्थो मे ज्ञान को बाजार कि वस्तू बना देने कि बात है.. ऐसे प्रावधान भारत मे नजदीकी समय में अंमल मे लाये जायेंगे तब छात्र ग्राहको के रूप मे तब्दील हो जायेंगे और विश्वविद्यालय मॉल मे. युजीसी द्वारा लिया गया फंड कट का निर्णय इसकी झलक भर है.
भारत के संदर्भ मे इसका दूरगामी असर दलित,बहुजन,आदिवासी एवं स्त्री शिक्षा पर होगा. आधुनिक काल मे महात्मा फुले,सावित्रीबाई फुले से लेकर डॉ.आंबेडकरजी के संघर्ष परिणामस्वरूप शिक्षा के क्षेत्र मे इन तबको का प्रवेश सुनिच्छित हो सका था. साथ ही विश्व स्तर पर रशियन क्रांती कि वजह से मिली मेहनतकश चुनौती कि वजह से पुंजीवाद को कल्याणकारी राज्य को चलाना आवश्यक हो गया था. उच्च शिक्षा,संशोधन आदी के क्षेत्र मे अभिजनो कि दादागिरी रही है. कल्याणकारी राज्य के वजूद में होने कि वजह से आरक्षण से लेकर फेलोशिप जैसे सकारात्मक प्रयासो कि वजह से दलित,बहुजन और महिलावर्ग कि दखल इस क्षेत्र में बढ रही थी, उसमे अब अवरोध खडे हो जायेंगे और उन्हे इस क्षेत्र से खदेडा जायेगा. पूंजी का स्वाभाविक चरित्र है लाभ का विस्तार. लाभ की रक्षा व बढोतरी के लिए एक संगठित शिक्षा-माफिया पनप रहा है. शिक्षा के सार्वजनिक ढांचे के अभाव में इसकी शक्ति की दाब-धौंस में नौनिहालों से लेकर विज्ञान-तकनीक, मेडिकल-इंजीनियरिंग व प्रबंधन की उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र-अभिभावक लाचार महसूस कर रहे है. स्वतंत्रता के बाद कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना के अन्तर्गत शिक्षा के सार्वजनिक ढांचे का जिस गति से विस्तार हुआ था, उसे वैश्वीकरण के दौर में राज्य ने अपनी कल्याणकारिता की केंचुली को उतार फेका है. इसलिये अब उसके सामाजिक शास्त्र के शोध में पुंजी व्यय करणा अनिवार्य सा नही रह गया है.. वैश्वीकरण के इस दौर मे जनता कि संघठीत चुनौती दृश्यमान नही होने से वह तेजगति से सबको कुचल रहा है.इसके विरोध मे अफ्रिका,अमरिका से लेकर भारत तक इसके विरोध मे संघर्ष खडे हो रहे है एवं Occupy Wallstreet से लेकर occupy UGC के नारो के तहत संघठीत हो रहे है ,इसे Occupy All Street तक ले जाने कि जरूरत है. यही संघर्ष सबको समान शिक्षा,भोजन,आजीविका दे सकनेवाले राज्य को लाने कि दिशा में जायेगा.

ऑक्यूपाय युजीसी @ सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय,पुणे.
ऑक्यूपाय युजीसी कॉ-ओर्डीनेशन कमिटी द्वारा ९ दिसंबर को २०१५ को ऑक्यूपाय युजीसी आंदोलन स्थल से संसद भवन तक अ.भा. मोर्चा निकाला गया. मोर्चे को संसद भवन से पहले ही रोकते हुये दिल्ली पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज किया गया. यह मोर्चा युजीसी द्वारा लिए गये नॉन नेट फेलोशिप रद्द करणे के निर्णय को वापस लेने, फेलोशिप कि रक्कम बढाने एवं इस योजना का राज्य के विश्वविद्यालयो में विस्तार करणे, विश्व व्यापार संगठन कि वार्ता से बाहर निकलने एवं १०प्रतिशत शिक्षा पार खर्च करणे कि मांग को लेकर निकाला गया था. इस मोर्चे में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालओ के छात्र-छात्राओ,विभिन्न छात्र संगठनो के साथ युवा भारत के कार्यकर्ताओ ने भाग लिया. मोर्चे पर हुये बर्बर लाठीचार्ज के विरोध एवं ऑक्यूपाय युजीसी के समर्थन मे सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के प्रवेशद्वार पर विभिन्न छात्र-युवा संगठनो कि तरफ से एकजुटता प्रदर्शन किया गया. इस प्रदर्शन मे नव समाजवादी पर्याय,युवा भारत, लोकायत, आईसा,एसएफआई,डाप्सा के साथी शारेक हुए. प्रदर्शन के बाद युजीसी के क्षेत्रीय कार्यालय,पुणे के माध्यम से मानव संसाधन विकास मंत्रालय को ज्ञापन प्रेषित किया गया.