नोटबंदी किसके पक्ष में …??

 

८  नवम्बर कि रात भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ५०० और १००० के नोटों कि वैधता ख़त्म होने का ऐलान किया.

“ मै धारक को५०० रु.अदा करने का वचन देता हु.. यह नोट पर लिखा हुआ था. यह वचन हमें  रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर के हस्ताक्षर से मिलता है.. और इस वचन को ८ नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने तोड़ दिया. क्या यह सही था..? यह पहला सवाल है..”

मोदीने जो वादे हमसे.. भारतीय जनता से… चुनाव के प्रचार के दौरान और प्रधानमंत्री होने के बाद भी किए थे  उनकी वैधता क्या है..? .साथ ही साथ  रिजर्व बैंक के अधिकारों में हस्तक्षेप करके कि गयी नोटबंदी के वक्त भी..जो घोषनाए प्रधानमंत्री ने की उसके बाद ५०-६० बार नोटबदली के सबंध में में जो परिवर्तन किए उससे यह शक और भी गहरा गया है. जनता ने तकलीफ सहते हुए जितने पैसे बैंक में जमा करवाए है उतना तो लौटाना था.. उतने पैसे बैंको द्वारा  हमें नई करेंसी में लौटाने चाहिए थे लेकिन पैसे निकालने पर मोदी के आदेशो से पाबंदी लगाई जा चुकी है… ८ नवम्बर को मोदीद्वारा   कैशलेस कि बात नहीं कही गयी  थी.अपने संबोधन में काला धन लाने कि बात कि थी.. जाली नोट पर प्रतिबन्ध और आतंकवाद से लढाई कि बात कि थी. माल्या जैसे लोग लोन को डुबाकर कैसे भाग गए है या भगाए गए है. वैसे तो इसपर ज्यादा बताने कि जरूरत नहीं है .. बैंक पैसो कि कमी से जूझ रहे है. रोजाना १ लाख ४० हजार करोड़ की कमी है. पिछले सालो में बैंकों का मुनाफा घटते ही जा रहा है. मुनाफा तो औद्योगिक घरानों को हो रहा है.यह इसलिए हो रहा है की हरसाल एनपीए में बढोतरी हो रही है.इन बट्टा खातो में डाले गए कर्जे को वसूलने की कोई कारगर नीती सरकार के पास नहीं है. १९९१ के बाद से ही पिछले २५ सालो में बैंक सुधार के नाम पर बैंकों के राष्ट्रिय स्वामित्व को बदलकर उसे नीजी बनाने की कोशिश जारी है.मौजूदा सरकार ने बड़े औद्योगिक घरानों के एनपीए माफ़ कर दिए है उसी तरह पूर्व की यूपीए सरकार ने भी किए थे.बैंकों की अधिकतम पूंजी नीजी हाथो में चली गयी है जिससे बैंक दिवालियापन की कगार पर खड़े है. नोटबंदी के बाद आम जनता द्वारा बैंकों में जमा हो रही राशि से बैंक आज तो दिवालिया होने से बाख गए है लेकिन मौजूदा नीतिया ही चलती रही तो संकट के अधिक गहरे होते जाने की आशंका है.अमरिका में जो सब प्राइम संकट आया था वह भी रियल इस्टेट के क्षेत्र की मंदी को दूर करने के लिए मकानों पर कर्जे के लिए उन्डेले गए बैंक के पैसे के कारन पैदा हुआ था. पैसे निकालने पर लादी गयी सीमा बैंको की तरलता को बनाये रखने का ही इंतजाम है. बैंकों को बचाने के लिए भारत की अपारम्परिक अर्थव्यवस्था में लगे  ४० प्रतिशत से ज्यादा धन को खींच लिया गया है इसका व्यापक असर रोजगार पर पड़ेगा.नोटबंदी के असंगठित क्षेत्र के रोजगार ख़त्म होने की खबरे भी आ रही है.मुंबई,कोलकत्ता,दिल्ली,कानपूर आदि महानगरो से लोग अपने गाँवो की तरफ लौट रहे है.महाराष्ट्र का भिवंडी,गुजरात का सूरत कपड़ा,हिरा,सराफा उद्योग संकट में आ चूका है.अनाज मंडियों में भी ख़राब हो रहा है एवं खेतो में भी. किसान अपनी फसलो को नकदी की कमी के कारन नहीं काट पा रहे है. महिलाओ की जमापूंजी जिसे उन्होंने अपने बुरे वक़्त के लिए बचा रखा था  छीन लिया है.जिस देश में जीवन रक्षा की योजनाए न हो और जो थी उसे भी आर्थिक सुधारो के नाम पर कम कर दिया है ऐसे समय में महिलाओ की जमापूंजी को छिना जाना एक पुरुषसत्ताक समाज में अतिभयावह है.नोटबंदी के निर्णय ने एक झटके में लोगो के पैसे को वितीय पूंजी का हिस्सा बना दिया है. वित्त पूंजी एवं वितीय पूंजी के साम्राज्यवाद को समझने के लिए लेनिन को पढ़ा जा सकता है.

काला धन अब तक नहीं आया है.. बैंक में  जो पैसा जमा किया गया है, जनधन योजना के बाद भी और नोटबंदी  के बाद भी  वह आम जनता का है. किसान का,मजदुर का,छोटे दुकानदारो का,फेरीवालो का है.. विजय माल्या,अम्बानी,अदानी या टाटा या बिड़ला का नहीं है. जनधन योजना के बाद हो या नोटबंदी के बाद भी जिनका कर्जा राइट ऑफ किया गया है अथवा माफ़ कर  दिया गया है उनमें जरूर माल्या,अम्बानी,अदानी वगैरह के नाम है..साथ ही इन्ही बड़े औद्योगिक घरानों को बड़े बड़े कर्जे भी दिए गए है.                                                    यह दावा कि यह काले  पैसे को रोकेगा और यह नीति  काले पैसे को निकलवाने के लिए बनाई गयी है , बेबुनियाद है . वह इसलिए कि : सरकारी अनुमानों  के  ही अनुसार कुल काले पैसे  का  मात्र  ६%, मुद्रा नोट,  के रूप में रखा जाता है .बाकी  सभी पैसा  आभूषण, भवन निर्माण और अन्य व्यवसायी कार्यों में लगा रहता है .  काला पैसा कोइ  स्थिर चीज़ नही  है. जो बण्डल के रूप में पड़ा रहता  है  और जिसे हम एक छापा मारकर प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वह लगातर  प्रवाह में है ,व्यवसाय में प्रयोग हो रहा है . इसलिए  यदि नोट बंदी भी की जाती है  तो भी काला पैसा बाहर नहीं आएगा क्योंकि यह पैसा नोट  के रूप में नहीं है  और कर अधिकारियों का इंतज़ार नहीं कर रह है .इसलिए नोट बंदी या बैंक लौकेरों  पर छापे  से काला पैसा खतम नहीं होगा.  हाँ वह कुछ मात्रा  में मिल सकता है.

अर्थशास्त्री कौशिक बसु का कहना है, ”भारत में गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) अर्थव्यवस्था के लिए ठीक था, लेकिन विमुद्रीकरण (नोटों का रद्द किया जाना) ठीक नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था काफ़ी जटिल है और इससे फायदे के मुक़ाबले व्यापक नुक़सान उठाना पड़ेगा।” प्रोफ़ेसर बसु पूर्व यूपीए सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। अभी न्यूयॉर्क कोर्नेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। उनका कहना है कि एक बार में सब कुछ करने के बावजूद ब्लैक मनी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अब इसकी मौज़ूदगी संभव नहीं है। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस कदम का सीमित असर होगा। लोग नई करेंसी के आते ही तत्काल ब्लैक मनी ज़मा करना शुरू कर देंगे। इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ सैकड़ों हज़ारों आम लोगों को पास नकदी है लेकिन यहां से ब्लैक मनी बाहर नहीं आएगी। इन्हें प्रताड़ित होने का डर है। इन्हें लगता है कि वे सामने आएंगे तो इन्हें फंसा दिया जाएगा।

 

अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का कहना है कि सरकार के इस कदम से साफ है कि उन्हें पूंजीवाद की समझ नहीं है। उनका कहना है, ”आम तौर पर इस स्थिति में पूंजावादी व्यवस्था में नए बिज़नेस की ओपनिंग होती है ताकि पुरानी करेंसी को नई करेंसी में तब्दील किया जा सके। इस हालत में लोग सामने आकर प्रस्ताव देंगे कि आप मुझे 1000 का नोट दीजिए और आपको इसके बदले 800 या 700 रुपये दिए जाएंगे। इसके परिणामस्वरूप ब्लैक मनी पर काबू पाने के बजाय काले धंधों का प्रसार बढ़ता है।’

भारत के बजटों में कांग्रेस और अब भाजपा दोनों ने ही भागीदारी नोट्स ( PARTICIPATORY NOTES   PN या  पी एन  ) नामक योजना के तहत काले धन को बाहर से देश में लाने  के लिए  इस  योजना को लाया गया था इसके तहत, भारत में पैसा लगाने  वाले विदेशी  निवेश   संस्थाएं उन विदेशियों जो बिना अपना नाम और परिचय जाहिर कर , भारत में निवेश करना चाहती  हैं,  इन संस्थानों को यह अधिकार दिया गया है  की, वे ऐसे निवेशकों को पी एन  जारी कर सकते हैं  और इनको  भारत के  पूंजी बाजार में निवेषित किया जा सकता है. एक समय में तो भारत में शेयर बाजारों में लगे पैसे का आधा पी एन के द्वारा ही लगा हुआ था अब यह घटकर  १०% हों गया है. ये निवेशक गुमनाम हैं इनके  बारे  में जानकारी न करने की कानूनी बाध्यता है. ये देश में काले  पैसे का  बड़ा स्त्रोत है. ये पैसा भारत से बाहर गया हुआ है जिसके  मालिक भारत के अधिकारी  वर्ग, राजनेत और व्यवसायी हैं. इसी प्रकिया  से भारत में निवैश्  करने के बहुत सुगम रास्ता मॉरिशस  के साथ दोहरा कराधन  सन्धि है  इसके  तहत मॉरीशस में कंपनी खोलकर आप  भारत में निवेश कर सकते हैं और इस कंपनी को भारत  में कर नहीं देना होगा,. गत बजट में सरकार ने इनके लाभ पर पूंजी सवर्धन कर लगाया है  ; इसके बावजूद  संधि ऐसी है जिससे कर से बचा जा सकता है  और इसमें भे इतनी परतें हैं कौन  असली मालिक है मालुम भी नहीं पडता है. यह भी काले पैसे को देश में पैसे लाने  का एक अच्छा साधन है.

अपने दिमाग को गिरवी रख इक मसीहा को समाज के भले का ठेका देनेवाले लोगो कि हमारे यंहा कमी नहीं है .. वह मोदी के उदय के बाद ज्यादा बढ़ गयी है..वह भी इसलिए हुआ है कि पिछले ७० सालो से . आजादी के बाद भी.. (वह आजादी थी या नहीं थी इन बहसों से के बावजूद भी.) मेहनतकश आबादी समय समय पर जो अपनी समस्याओ से परेशान थी .उन परेशानीयों के  बरक्स उसने मोदी जैसे मसीहा को सत्तासीन किया है .बीच बीच में वह ऐसेही मसीहाओ के शोध में रही है. जिस प्रकिया से  लालू,मायावती,केजरीवाल भी उभरे है… सांप्रदायिक हो या सेकुलर अथवा सामाजिक न्यायवादी सभी नयी आर्थिक नीतियों के ही समर्थक रहे है.यह इसलिए हुआ है कि हम अपनी उन्नती का ठेका किसी दुसरे को दे रहे होते है. काँग्रेस कि भ्रष्ट नीतियों से भुक्तभोगी  जनता ने भ्रष्ट नीतियों से मुक्त बीजेपी को जिसके राष्ट्रिय अध्यक्ष को हम लोगोने रिश्वत लेते कैमरे पर देखा है उसको सत्तासीन किया है. यूपीए से पहले सत्तासीन सरकार ने सत्ता में रहते वक्त १००० का नोट जारी किया था.जिसे मोदी ने वापस लिया है.कांग्रेस का विरोध करते वक़्त वह यह भूल जाते है  की १००० का नोट वाजपेयी सरकार ने जारी किया था.

 

हम सबमें एक बड़ा वर्ग है जो मान चुका है कि मोदीजी अच्छा कर रहे हैं,कालेधन पर छापा मार रहे हैं,कालाधन सरकार के पास आएगा तो सरकार सड़क बनाएगी ,स्कूल खोलेगी,कारखाने खोलेगी,बैंकों से घरों के लिए सस्ता कर्ज मिलेगा,महंगाई कम हो जाएगी,हर चीज सस्ती होगी,सब ईमानदार हो जाएंगे,चारों ओर ईमानदारी का ही माहौल होगा,इत्यादि बातों को आम जनता के बहुत बड़े हिस्से के दिलो-दिमाग में बैठा दिया गया है,अब जनता इंतजार कर रही है कि कालेधन की मुहिम पचास दिन पूरे कर ले,फिर हम सब ईमानदारी के समुद्र में तैरेंगे ! ये सारी बातें फार्मूला फिल्म की तरह आम जनता के बीच में संप्रेषित करके उनको मोदी-अफीम के नशे में डुबो दिया गया है। जैसे चुनाव के वक़्त का माहौल था. नरेन्द्र मोदी के गुजरात विकास कि कहानिया कैसे जनता के बीच फैलाई गयी.उन्हें कैसे औद्योगिक घरानोने प्रायोजित किया  इसकी पड़ताल हम सबको करनी चाहिए.. २०१४ के चुनाव के वक़्त  जब मोदी गुजरात के विकास मॉडल कि बात कर रहे थे तब हमें उस विकास के दावो के बारे में सवाल उठाना चाहीए था… उस विकास में किसान,मजदूर कि समस्याए एवं रोजगार कितना बढ़ा है यह पुछना था लेकिन हम में से ज्यादातर लोग २००२ के गुजरात दंगे पर अड़ गए थे..दंगो के लिए तो मोदी को माफ़ किया ही नहीं जा सकता था लेकिन विमर्श को सिर्फ सेकुलर – नॉन-सेकुलर के खांचे तक ही सीमित रखना एक भारी भूल थी.साम्प्रदायिकता के अजेंडे को बीजेपी तक सीमित रखना सत्ताधारी वर्ग के चरित्र को कम करके आंकने जैसा है.२००२ का वह दंगा तो उसने उस विकास की खोखली हकीक़त को छुपाने के लिए ही किया था.साथ ही दंगा कराना उसका मुख्य अजेंडा भी है. पूंजीवाद की सेवा करना एवं पूंजीवादी विकास से उभरनेवाले अंतरविरोधो को दबाने के लिए मुस्लिम विरोध की राजनीती करना उसका मुख्य धंदा है. हिंदुत्व एवं पूंजीवाद दोनों के आईकॉन मोदी इसलिए तो बने है. गुजरात के कथित विकास के खोखलेपण को पाटीदार ओर उंना आन्दोलन ने सामने ला दिया है.गुजरात विकास का बबल टूट गया है..

मोदी का अबतक बीता कार्यकाल वितीय पूंजी की सेवा का कार्यकाल है.जनधन योजना से आए पैसे को अदानी को कर्जे के रूप में दिया गया .नोटबंदी के बाद ७३ कंपनीयो का कर्जा माफ़ कर दिया गया है.मेहनतकश जनता की पूंजी को छिनकर उसे औद्योगिक घरानों की सेवा में लगाने के लिए ही नोटबंदी का निर्णय लिया गया है . यह निर्णय करते वक़्त आरबीआई,संसद,मंत्रींमंडल,संविधान को ताक पर रखकर यह निर्णय किया है.यह कदम तानाशाही भी है एवं फासिस्ट भी इसे जनता के बीच प्रचारित करने की जरूरत है.जिस देश में इन्टरनेट अब भी अधिकतम आबादी की पहुँच से बाहर है.बिजली भी ठीक से गाँवो तक नहीं पहुँची है ऐसे हालात देश को जबरदस्ती कैशलेस अर्थव्यवस्था में  क्यों धकेला जा रहा है यह सवाल भी इस बीच महत्वपूर्ण है..बैंकों  से पैसे निकालने पर राशनिंग  और जबरदस्ती डिजिटल भुगतान करने के लिए  डाला जा रहा दबाव भारतीय जनता के हित में है की वितीय पूंजी के विस्तार के हित में…? इस सवाल पर चर्चा होनी चाहिए.नोटबंदी हो या कैशलेस का नारा सब देशप्रेम की चाशनी में दिए जा रहे है एवं सवाल उठाने वालो को देशद्रोही करार दिया जा रहा है, इस फासिस्ट स्तिथि को समझकर हम सबको हमलावर होने की जरूरत है. अंबानी ने जिओ सिम को जारी किया है.कुछ दिनों बाद वह जिओ मनी भी जारी करनेवाले है.मोदीजी जिओ को डिजिटल इंडिया की यात्रा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में चिन्हित कर चुके है. जिओ सिम ,जिओ मणी,डिजिटल भुगतान जिओ के साथ साथ मोदी पेटीएम के विज्ञापन में भी दिखे है.  पेटीएम ई वालेट कम्पनी है.इस कम्पनी में ४० प्रतिशत पैसा चायना की अलीबाबा का है,जो लोग चीनी मालो का पटाखे,झालर बेचने वालो का विरोध कर रहे थे वही पेटीएम करने को कह रहे है. मोदीभक्तो को भी इस पर विचार करना चाहिए.  जीडीपी में जो गिरावट आयी है उसकी चर्चा मनमोहन सिंग को करने दीजिए.वह जीडीपी बढ़ाने के उपाय मोदी को बताएँगे.मोदी उन्हीके उत्तराधिकारी है.मतभेद काम करने के तरीके को लेकर है बाकि नीतियों पर तो सहमती है ही..!! जीडीपी और रोजगार के सृजन का तर्क नवउदारवाद के युग बेमानी हो गया है. पिछले २५ सालो में जीडीपी बढ़ाने के नाम पर जो नीतिया इस देश में लाई गयी उसने कितने पारंपरिक रोजगारो को ख़त्म किया है? कितने जंगलो का दोहन किया है? नदियो पर बांध बनाने,अलग अलग इंडस्ट्रीयल झोन बनाने के नाम पर कितने आदीवासीयो को उजाड़ा है? किस तरह खेती को चौपट किया है ?  इसपर बात होनी चाहिए.ग्रॉस डिस्ट्रक्शन की बात होनी चाहिए.मोदी की घोषणा मेक इन इण्डिया की है जिसमे मुम्बई-दील्ली,अमृतसर से कोलकाता जैसे ६ इंडस्ट्रीयल कोर्रीडोर बनाने है.इन कॉरिडोरो का बनाने के लिए लाखो एकड़ जमीन कब्जाई जायेगी.नदी जोड़ परियोजना से नदी जोड़कर पानी पर कब्ज़ा किया जाएगा एवं जीडीपी बढ़ाने के नारे के साथ हमारे पैसो को निवेशित किया जाएगा.यह भी देशभक्ती के नाम पर होगा .नोटबंदी की मार झेलने के बाद अगली बारी इस विकास के कथित जनांदोलन को झेलने की होगी. नोटबंदी हो या मेक इन इंडिया दोनों भी मेहनतकश जनता पर लादे गए युद्ध है.

मोदीने  हमें काला धन  आने के बाद हिस्सा देने कि बात कि है.. जो राष्ट्र कि संपती है उसमे नहीं..  राहुल गांधी ने तो एक सभा में १ प्रतिशत लोगो के पास संपती होने कि बात कही है.और वह संपती पिछले ढाई साल में जमा हो जाने कि बात कही है. .राहुल गांधी की आधी बात सच है पुरी नहीं. यह संपती १ प्रतिशत लोगो के पास किनकी नीतियों की वजह से चली गयी इसपर तो वह कुछ नहीं बोलते.क्या संपती का मतलब काला धन है.. ?? थोड़े ही है.. संपती ओर काला धन एक नहीं है.. मेरी समज में तो नहीं है   .उन्होंने गलती से काले धन कि जगह संपती कह कह दिया होगा. अगर संपती के बटवारे कि बात करते है तो स्वागत है.लेकिन यह बटवारा करना उनके बस की बात नहीं है.कॉर्पोरेट से चंदा लेकर राजनीती करनेवाले लोग एक सीमा तक मालिको का विरोध कर सकते है.वह करना उनकी मजबूरी भी है.हर ५ साल बाद जनता में जाना जो होता है !  काला धन,भ्रष्टाचार तो पूंजीवाद कि अपनी समस्या है.वह उसका अंगभूत गुण भी है.लेकिन वही जब उसके विकास में बाधा बनता है तो वह उसके खिलाफ मोर्चा खोल देता है.. उस मोर्चे के अगुवा केजरीवाल हो या मोदी बन जाते है.. लेकिन हमें तो वह संपती जो मेहनतकश जनता के श्रम एवं ,नैसर्गिक संसाधनों का दोहन कर प्राप्त कि गयी है उसका हिसाब मांगना चाहिए..  प्रधान है शोषण से निर्मित संपती .. दुसरा सवाल है उस संपती के बटवारे में हुआ भ्रष्टाचार… अमरीका में आकुपाय वालस्ट्रीट वी आर ९९ कि घोषणा के साथ आन्दोलन. हुआ है.. हमको तो आकुपाय आल स्ट्रीट करना है.

जैसे ही नोट्बंदी का ऐलान हुआ है लोग लाइन में है.. वह लाईन अब भी ख़त्म नहीं हुयी है.३१ दिसंबर के बाद भी ख़त्म होने की संभावना नहीं है. ५० दिन के बाद के हालात हर मोर्चे ज्यादा गंभीर होंगे.लोग जो आक्रोशित नहीं दिख रहे है क्योंकि वे अपनी कमाई जमा करने के लिए कतारों में खड़े है. हमको ५० दिन बाद जो आक्रोश उपजेगा उसको संगठित करने की तैयारी में लगना होगा.आज 25 दिसंबर है. .. ख्रिसमस का महिना है..येशु दुखितो के लिए क्रूस पर चढ़ गए थे. ..इस स्वयंघोषित मसीहा ने तो १०० से ज्यादा लोगो को मृत्यूद्वार पहुंचा दिया है.. संसद में इनको दो मिनट का मौन भी नसीब नहीं हुआ.यह मसीहा न संसद के लिए जवाबदेह है  न किसी संवैधानिक संस्था के लिए जवाबदेही समझता है.. नोटबंदी के दौरान कम पैसे में शादिया करने की नसीयते दी जा रही है एवं बैंकों से पैसा निकालने के लिए तरह तरह की पाबंदिया लगाई जा रही है.. लेकिन इसी बीच रेड्डी के घर ५०० करोड़ की नीतीन गडकरी के घर ५० करोड़ की शादी संपन्न की गयी है. नैतिकता उठते-बैठते जाप करनेवालों का असली चेहरा है यह..!!

अमरीका २००८ के आर्थिक संकट से उभरी नहीं है. अमरीका हथियारों का बड़ा कारोबारी भी है.अमरीका में रोजगार का संकट अधिक गहराता जा रहा है.अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की जरूरत के बीच अमरीका में डोनाल्ड ट्रम्प नामक मोदी के अवतार सत्तासीन हो गए है. वे चायना को ललकार रहे है जैसे इधर मोदी पाकिस्तान को..! ट्रम्प ने भारतीय मजदूरो को भगाने की नीती पर भी काम करना शुरू कर दिया है.इस मायने में वह राज ठाकरे के बाप नजर आते है.अमरीका चीन को ललकार रहा है,युद्ध की स्तिथी में अमरीका के साथ भारत,चायना के साथ पाकिस्तान.हालात बहुत ख़राब होंगे.नोटबंदी के बाद या जैसा की मैंने कहा विकास का कथित जनांदोलन चलाने के बाद जो संभावित जनाक्रोश उभर सकता है उसको दबाने के लिए मोदी पाकिस्तान के साथ युद्ध की घोषणा कर भी सकते है. उधर नवाज शरीफ भी तैयार होंगे.नवाज शरीफ का नाम पनामा पेपर्स में आ चूका है. वंहा वे इस मुद्दे पर घेरे भी जा चुके है..कैशलेस से भ्रष्टाचार कम होगा कहनेवालो को पनामा पेपर्स प्रकरण को पढ़ना चाहिए.उन्हें युद्ध संजीवनी दे सकता है.ऐसे में अगर हम युद्ध होने की स्तिथी में संभावित जनाक्रोश को जनक्रांति में बदलने की जरूरत होगी. स्थितिया अराजकता की तरफ न जाए इसलिए हमे मैदान में उतर जाना चाहिए नहीं तो इतिहास हमे माफ़ नहीं करेगा..

 

इन्कलाब जिंदाबाद !!

– दयानंद कनकदंडे 

[ एनडीपीआई,सीपीआई(माले),युवा भारत,जाति विरोधी आन्दोलन द्वारा गांधी शांति प्रतिष्ठान,नयी दिल्ली में आयोजित नोटबंदी:किसके पक्ष में सेमिनार में दिया गया वक्तव्य..२५ दिसंबर २०१६ ]  

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