नोट बंदी : गरीब को और गरीब करने की योजना है

( ८ नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लादी गयी नोटबंदी के अन्वयार्थ कि चर्चा करता आलेख)

नोट बंदी या विमुद्रीकरण  पर समूचा देश बुरी तरह से विभाजित  हो गया है. सभी पूंजीवादी पार्टियां भी इस विषय पर विभाजित हैं.  वे अपने वर्ग के लाभ  के लिए ही इस विषय  पर   अलग अलग  सोच रखती हैं. हमें  भी शोषित वर्गों के प्रतिनिधि के  लिहाज़ से इस नीति को देखना है .

 

पूंजीपती वर्गों के लोगों और पार्टियों  ने इसे इस लिहाज़ से देखा है कि  कितनी जल्दी अर्थव्यवस्था दुबारा पटरी पर आ पायेगी  और  किस मात्रा  में लोग नकदी के प्रयोग घटा देंगे या बंद कर देंगे . लेकिन किसी ने भी   इसका गरीबों पर सीधे  और स्थायी हो रहे असर पर गौर करना ज़रूर नहीं समझा  है.

 

आइये देखे क्या असर है :  नोट बंदी से अर्थव्यवस्था के अंदर ही सम्पति और धन  का पुन: वितरण हो रहा  है और आगे भी होगा. इससे कमज़ोर लोगों की सम्पदा , शक्तिशाली  लोगों हाथों  में स्थानांतरित हो रही है  और  सरकार यह दावा कर रही है  कि वह निर्धनों के लाभ के लिए  इस नीति को लाइ है  जब कि हो इसके ठीक उल्टा रहां  है .

 

यह इस प्रकार है कि देश के अधिकाँश  मेहनतकश, करीब ८०-९०%  असंगठित  क्षेत्र में कार्यरत हैं जहां वेतन नगदी में दिया जाता है और वे खर्चा भी नगदी में करते हैं . इस नगदी के अभाव का असर सभी पर पड़ेगा और  निर्धनों पर विपरीत और अन्य पर सकारत्मक .   मेहनतकशों की अधिकाँश महिलाएं  अपनी रोज की आमदनी से कुछ पैसा बचाकर अलग से रख लेती हैं  . उनमें से कई अपने आदमियों से बचाकर और कुछ अन्य किसी आड़े वक्त में काम आने के लिए.यह उनकी सुरक्षा का  बड़ा कवच है .आज के नकदी संकट  में यह सभी पैसा निकल जायगा  और उनके  जीवन को अत्यंत असुरक्षित  कर देगा .  उनका शोषण और अधिक हो जायगा.

 

वे किसान जो रबी की फसल समय से या उसके अलावा  बो नहीं सकेगा और खरीफ को बेच नहीं सकैगा  , उसे इन फसलों  को बोने के लिए महाजनों के पास जाना पड़ेगा,विशेष रूप से  इसलिए भी की सहकारी बैंकों को अभी तक नोट बदलने की सुविधा नहीं दी गयी है और ये  सभी बैंक बंदी की कगार पर हैं.

 

यही हाल मजदूरों का भी है जिन्हें बड़ी तादाद में काम से हाथ धोना पड़ा है . इनमें से बहुतेरे तो लंगरों की तलाश में रहते  हैं जहां उन्हें  खाना मिल सके; कुछ  ने कानपूर में  नसबंदी भी कराई है ताकि चार पांच दिन तक वे परिवार को खिला सके, और बाकी  सभी महाजनों के चंगुल मैं हैं . कानपूर के मजदूर बाजारों में मजदूरों की संख्या घटती जा रही है क्योंकि कोई काम नहीं है. जो गांव जा सकते हैं वे गांव जा चुके हैं .   इन वर्गों के सभी  लोगों को किसी ना किसी रूप में अपने सम्पति बेचनी  होगी और उनकी माली  हालत पहले से भी बहुत खराब होनी  अवश्यम्भावी हैं .

 

इसके अलावा उन सभी को जिनको किन्ही आपदा के कारण अपने  ५०० अथवा १००० के नोटों को तुरंत ही  बदलवाना पड़ा , इस सब को इन्हें  कम दामों पर देना पड़ा है . बाजार की दर थी ५०० रुपये का ४०० रुपये में बेचना तो आम बात थी.आकस्मिक लेकिन आवश्यक कार्यों के लिए हर व्यक्ति को इन पैसो  के लिए  दलालों के पास जाना पड़ा. यह काम कई करोड लोगों को करना पड़ा . इन दलालों की पौ बारह  हो गई है .

 

छोटे दुकानदारों, खोमचे और रेडी पर सामान  रख कर बेचने  वालों को हानि होनी शुरू हो गयी है  क्योकी बना सामन बिक नहीं रह है. गरीब आदमियों के बाजार बिलकुल खाली पड़े हैं . कानपूर का शीशामऊ बाजार जो आम दिनों में पैदल पार करना भी मुश्किल था  आजकल मोटर साइकिल चलाकर तेज़ी से निकल सकते हैं  और कही आपको रफ़्तार कम  करने की ज़रूरत नहीं होगी. कही कोई खरीदार नहीं मिलेगा .यह सारा व्यव्साय उनको जा रहा है जो लोग कार्ड से खरीदारी करते हैं . सरकार प्रचार कर रही है  कि मशीनॉ  से भुगतान करे. पे टीएम् के विज्ञापन रोज हमको यही बताते  हैं. ; लेकिन इसके लिए यह आवशयक है कि आपके पास एक स्मार्टफोन  हो यदि आप   १०,००० से अधिक कमाना चाहते हैं तो तो आपके पास एक  कर सूचना संख्या भी होनी चाहिए. छोटे दूकानदार इस हानि को बर्दाश्त नहीं  हीं कर पा  रहे हैं  और कई खोमचे वालों  ने अपनी  रेड़िया भी बेच दी हैं .यह प्रक्रिया केवल और अधिक तेज ही हो सकती है .

 

कारखाना बंदी बहुत तेज  रफ़्तार से  हो रही है . सूरत का हीरा  उद्योग, तिरुप्पूर , तमिल नाड, का कपड़ा उद्योग . यह दोनों निर्यात के केंद्र इस समय बुरी दशा से गुजर रहे हैं . तमाम कारखाने  बंद हो रहे हैं नीर्यात के आर्डर रद्द किये जा रहे हैं . बाकी  सभी औद्योगिक क्षेत्रों में भी कमोबेश यही दशा है . अधिकाँश उद्योगों में बंदी हैं और मजदूर सड़क पर आ गए है . उत्पादन चक्र टूट चूका है . पैसा नहीं होने से खरीदारी बंद है . खरीदारी बंद होने से वे उद्योग भी  बंद हो गए हैं. बंद होने के कारण मजदूर सडकों पर आते जा रहे हैं , जिससे वेतन ना मिलने के कारण  वे खरीदारी नहीं  कर पा रहे हैं  , जिससे उद्योग  और अधिक्  बंदी की ओर जा रहे हैं  . तमाम कारखाने  बैंकों से कर्जा लेकर काम करते हैं उन पर बैंकों का ब्याज ही  भारी  पड़ रहा  है. इनमें से तमाम कारखाने दुबारा चालू भी नहीं हो सकंगे , जब भी नगदी का संकट  समाप्त या कम होगा. इस प्रकार यह संकट मंदी में बदल सकता है , अर्थात बना माल बिके  नहीं, इसलिए नया माल बनना बंद हो जाय.इससे बेरोजगारी और अधिक हो जायगी , और लोगों की क्रय शक्ति और कम.  ऐसी अवस्था को ही मंदी कहते हैं जब बना हुआ माल बिकता नहीं इसलिए और  अधिक कारखाने बंद हो जाते है और जो माल बिक रहां  था वह भी बंद हो जाता है. एक ऐसा चक्र बन जाता है जिससे त्क़भी निकला जा सकता है जब पुराना माल बिक जाए और नया माल बनना शुरू हो.

 

दूसरी ओर बैंकों के पास बेंतेहा  राशि जमा हो गई है और इसलिए उनकी  ब्याज दरे  नीचे आ रही हैं. देश के कुल १० सर्वाधिक धनी  घरानों पर  ७.३ लाख करोड के कर्जा है जो बैंकों से लिया गया है  और यदि  बैंक अपने ब्याज की दर १% नीचे लाते हैं  तो इन सब को ७,३०० करोड रुँपुए का ब्याज देनदारी में लाभ हो होगा . इस प्रकार इस कार्य से गरीबो  की भलाई  के विपरीत , पैशेवर काला पैसा कमाने वाले उद्योपतियों को लाभ देने की तैय्यारी चल रही है.  यह  लगता है कि  फौरी तौर पर यह रोड़ा आ गया है  कि रिजर्व बैंक ने इस नई जमा राशि को नगद-आराक्षित अनुपात  के मद में अपने पास जमा कर लिया है , इसलिए यह सब फिलहाल टल गया है. लेकिन यह कुछ ही समय के लिये है उसके बाद यह लाभ होना स्स्वाभाविक है . यह लाभ इन कम्पनियों और बैंकों  को इसलिए हो रहा  है कि हम अपना पैसा  नहीं  निकाल सकते हैं .

 

बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जो अपने ५०० रुपये को बदलवा नहीं पायंगे , वे या तो बीमार होंगे अथवा बैंकों से बहुत दूरं होंगे  इत्यादि. बहुतेरे ऐसे भी हैं जो कतार में नही खड़े हो पायंगे.

 

अब आधार पर आ जाएँ देश में ५.८ करोड लोग ऐसे हैं जिनके पास आधार कार्ड नहीं है .ऐसे लोगों के पास और कोई परिचय पत्र कम ही होने की संभावना  है  और ऐसों के पास कोई बैंक में खाता  होगा इसकी संभावना भी कम है .भारत में लगभग सभी घरों में कुछ नगदी रखी जाती है ताकि किसी आपात काल   स्तिथी  से निपटा जा सके.  एक अध्धयन के अनुसार  ५९% प्रतिशत लोग अपनी समस्त बचत  नगदी में रखते हैं.

 

ये हानियाँ और लाभ स्थायी प्रक्रति  के हैं  . इनमें  कोई परिवर्तन नहीं  आयगा.  और यह धन दौलत का स्थानांतरण  किसी उत्पादक कार्यों से  नहीं हुआ है यह इसलिए हुआ है क्योंकि वे अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली हैं . इसे ही प्रतिगामी आर्थिक  नीति कहते हैं .

 

यह दावा कि यह काला पैसा को रोकेगा और यह नीति  काले पैसे को निकलवाने के लिए बनाई गयी है , बेबुनियाद है . वह इसलिए कि : सरकारी अनुमानों  के  ही अनुसार कुल काले पैसे  का  मात्र  ६%, मुद्रा नोट,  के रूप में रखा जाता है .बाकी  सभी पैसा  आभूषण, भवन निर्माण और अन्य व्यवसायी कार्यों में लगा रहता है .  काला पैसा कोइ  स्थिर चीज़ नही  है जो बण्डल के रूप में पड़ा रहता  है  और जिसे हम एक छापा मारकर प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वह लगातर  प्रवाह में है ,व्व्यव्साय    में प्रयोग हो रहा है . इसलिए  यदि नोट बंदी भी की जाती है  तो भी काला पैसा बाहर नहीं आयगा क्योंकि यह पैसा नोट  के रूप में नहीं है  और कर अधिकारियों का इंतज़ार नहीं कर रह है .इसलिए नोट बंदी या बैंक लौकेरों  पर छापे  से काला पैसा खतम नहीं होगा  हाँ वह कुछ मात्रा  में मिल सकता है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है उसके अनुसार सरकार को  यह आशा है कि वह ४००० करोड रुपये का काला पैसा निकलवा सकेगी.

 

यदि काले धन को निकलवाना एक लक्ष्य है तो यह राशि बहुत कम है और इसे  निकलवाने के लिए उठायी  हानि बहुत अधिक. वैसे भी  सरकार ने ऐसे कोई  कदम नहीं उठाये हैं जिससे  यह लगे कि वह काला धन निकलवाने के बारे में गंभीर  है. भारत के बजटों में,कंग्रेस  और अब भाजपा दोनों ने ही भागीदारी नोट्स ( PARTICIPATORY NOTES   PN या  पी एन  ) नामक योजना के तहत काले धन को बाहर से देश में लाने  के लिए  इस  योजना को लाया गया था इसके तहत, भारत में पैसा लगाने  वाले विदेशी  निवेश   संस्थाएं उन विदेशियों जो बिना अपना नाम और परिचय जाहिर कर , भारत में निवेश करना चाहती  हैं,  इन संस्थानों को यह अधिकार दिया ज्ञाय है कि वे ऐसे निवेशकों को पी एन  जारी कर सकते हैं  और इनको  भारत के  पूंजी बाजार में निवेषित किया जा सकता है. एक समय में तो भारत में शेयर बाजारों में लगे पैसे का आधा पी एन के द्वारा ही लगा हुआ था अब यह घटकर  १०% हों गया है. ये निवेशक गुमनाम हैं इनके  बारे  में जानकारी न करने की कानूनी बाध्यता है. ये देश में काले  पैसे का  बड़ा स्त्रोत है. ये पैसा भारत से बाहर गया हुआ है जिसके  मालिक भारत के अधिकारी  वर्ग, राजनेत और व्यवसायी हैं. इसी प्रकिया  से भारत में निवैश्  करने के बहुत सुगम रास्ता मॉरिशस  के साथ दोहरा कराधन  सन्धि है  इसके  तहत मॉरीशस में कंपनी खोलकर आप  भारत में निवेश कर सकते हैं और इस कंपनी को भारत  में कर नहीं देना होगा,. गत बजट में सरकार ने इनके लाभ पर पूंजी सवर्धन कर लगाया है  ; इसके बावजूद  संधि ऐसी है जिससे कर से बचा जा सकता है  और इसमें भे इतनी परतें हैं किन असली मालकों कमालुम भी नहीं पडता है. यह भी काले पैसे को देश में पैसे लाने  का एक अच्छा साधन है.

 

भारत से पैसा बाहर नहीं जा सके और काला बाज़ारिये  पकडे जाय, इसके लिए २०१२ में जब प्रणब मुख़र्जी वित्त मंत्री थे, उस समय सामान्य कर बचाव नियमावली बनायी गयी थी  और इसे लोक सभा द्वारा पास कर दियागयाथा और इसे  लागू करने  की तारीख तय होनी बाकी थी. लेकिन यह लागू ना हो इसलिए प्रणब मुख़र्जी को राष्ट्रपति बना दिया गया और इस क़ानून को पास करना नए वित्त मंत्री चिदामब्रम द्वारा स्थगित कर दिया गया था  और उसके बाद की नरेन्द्र मोदी  सरकार भी इस लागू करने  की तारिख हर वर्ष आगे बढ़ा देती है  और यह तारीख २०१८ है. और साथ ही यह भी  घोषणा कर दी गई है कि यह  नियम  अप्रैल  २०१७ से पहले के सौदों पर लागू नहीं होंगे . अर्थात  नोट बंदी से छोटे सूटकेस   वालों को एक मौसम में हानि उठानी पड़ेगी, उसके  बाद से फिर वही सब दुबारा चालू हो जायगा.  इस प्रकार न तो नरेन्द्र मोदी सरकार और ना ही मन मोहन सिंह की सरकार ही काले धन को निकलवाने के बारे में गंभीर है .ये दोनों ही सरकारें     और उनकी पार्टियां पूंजीपति वर्गों को कोई तकलीफ देना तो दूर वह  इन्ही की प्रतिनिधि पार्टियां हैं और इन्ही के लाभ के लिए काम करती हैं .

 

१.   ऐसी दशा में हामारी  मांग यह है कि  १. सरकार जिन मजदूरों और उद्योगों की क्षति हुई है उनको तुरंत ही मुआवजा दे.उनकी समूची इस दौर का समूचा  वेतन  तथा उत्पादन को हुए नुक्सान की भार्पाये करे.

 

२. जिन किसानों को नकदी संकट  के कारण खरीफ बेचने में और रबी की फसल देरसे लगाने के कारण  जो नुक्सान हुआ है उसका मुआवजा  दे.

 

३. सभी स्थानों पर लंगर  खोल कर ऐसे  सभी लोगों को भोजन उपलब्ध कराये जो किसी प्रकार के सुरक्षा कवच अर्थात  सामजिक सुरक्षा की योजना के दायरे में नहीं आते हैं .४. इस बात का आंकलन करने के लिए इस नोट बंदी से कितनी हानि हुई है , एक विशाशाग्यों की कमेटी बनाई  जानी चाहिए जो इस रिपोर्ट को त्वरित आधार पर तैयार करके इस प्रस्तुत करे.

 

निवेदक : राम शंकर ,नवल कुमार मिश्रा ,कैलाश राजभर, सुश्री कुसुम ,श्रीमती आशा देवी,  सुश्री गीता , मनोज तिवारी , डॉ आर डी सिंह,  सतीश समुद्रे, सुजीत समुद्रे , विजय चावला ,

 

युवा  भारत  और इंडियन काउन्सिल  ऑफ ट्रेड यूनियंस

कानपूर जिला इकाई

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