जेएनयू पर हमले के निहितार्थ

रोहित की आत्महत्या के बाद पूरा देश इस आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या करार देते हत्यारों को दण्डित किये जाने की मांग को लेकर आंदोलित है. इसी बीच जेएनयू मे एक कार्यक्रम मे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाने की खबर आने के बाद जिस तरह केंद्र सरकार और सत्ताधारी पार्टी विवि कैंपस मे हस्तक्षेप कर रही है एवं बिना गहरी छानबीन के छात्रसंघ अध्यक्ष को राष्ट्रद्रोही करार दे चुकी है,इसे देखते हुए आंदोलित समुदाय के गुस्से में बेतहाशा वृद्धि हुयी है.
यूजीसी द्वारा फंड कट एवं नॉन-नेट स्कॉलरशिप का निर्णय आने के बाद उसके मुखर विरोध की शुरुआत भी इसी विवि से हुयी थी. आकुपाय यूजीसी के नाम से शुरू हुए इस आन्दोलन ने फेलोशिप से लेकर शिक्षा के निजीकरण एवं भगवाकरण के विरोध मे अपनी उपस्तिथी दर्ज करायी. नॉन नेट फेलोशिप एवं फंड कट के विरोध में देशभर के जो कँम्पस आंदोलित दिखे वह सभी कँम्पस रोहीत की आत्महत्या के मामले को लेकर मौजूदा सरकार के विरोध में संगठित होकर आंदोलनरत है ।सरकार को पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे दिए जाने की चिंता से ज्यादा छात्र समुदाय के फेलोशिप से लेकर दलित उत्पीडन के सवालो पर संगठित होने की चिंता है. हमारे प्रधानसेवक पूंजी के दबाव मे शरीफ साहब के साथ बिना तय कार्यक्रम के लंच पर चले जाते है एवं अफजल गुरु का समर्थन करनेवाली पार्टी के साथ कश्मीर मे उनकी पार्टी सत्तासुख मे लीन है. मेक इन इंडीया मे भारी निवेश की आशंका टूट चुक है.,पाटीदार आन्दोलन के बाद गुजरात विकास का गुब्बारा फूट गया है,पाटीदार से लेकर जाट अहमदाबाद से दिल्ली तक के इलाके के किसान समुदाय औद्योगिक विकास का गुब्बारा फूट जाने एवं कृषी के संकट में आने की वजह से आरक्षण की मांग को लेकर मौजूदा सरकार के नाक में दम कर रहा है. विश्व अर्थव्यवस्था २००८ के संकट से जल्द ही उभर पाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे है. आनन फानन में घोषित भूमि अधिग्रहण एवं श्रम सुधारो का निर्णय सरकार द्वारा घोषित किए जाने के बाद किसान एवं मजदूरों के बीच से एक असंतोष भी उभरा है. इन सब स्तिथियों के मद्देनजर मौजूदा सरकार का भयाक्रांत होना स्वाभाविक है. चारो तरफ उभर रहा असंतोष एवं विष अर्थव्यवस्था की मंदी के बीच फेलोशिप की मांग से शुरू हुआ आकुपाय यूजीसी आन्दोलन कही आकुपाय आल स्ट्रीट मे न परिणत हो जाए इसकी चिंता ज्यादा दिखती है. पूंजीवाद जब अपने संकट के दौर मे होता है एवं अलग अलग वर्गों द्वारा सत्ता के ऊपर जब सवालात खड़े किए जाने लगते है तब सत्ता फासीवादी ही हो सकती है. यह शासकवर्ग का चरित्र है,कांग्रेस या बीजेपी का नहीं.इंदिराजी का घोषित आपातकाल एवं मोदीजी के अघोषित आपातकाल मे आपको सांप्रदायिकता के उफान,अभिव्यक्ती का दमन जैसी बहुत कुछ समानताये इसलिए भी दिख सकती है.
दलित उत्पीडन के सवाल से दो हाथ कर रहे दलित पृष्टभूमि से आए छात्र रोहित द्वारा सत्ता को उसकी राष्ट्र की परिभाषा मे दलितों,अल्पसंख्यको,किसानो,मजदूरों का क्या स्थान होगा यह सवाल पूछना नागवार गुजरा एवं अभाविप नेता से लेकर केन्द्रीय मंत्री द्वारा बुने गए जाल ने रोहित की जान ली. इसी तरह का जाल अब जेएनयू के छात्रो के लिए बुना जा रहा है.
जेएनयू में अफजल गूरू की फासी की तीसरी बरसी पर गूरू की फासी को न्यायिक हत्या बताते हूए किए गए कार्यक्रम में पाकीस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये जाने की खबर है. यह नारे किन लोगो की तरफ से लगाए गए इसको लेकर अबतक कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आयी है.यह नारे अभाविप द्वारा लगाये जाने की खबरे भी है. अगर ऐसे नारे लगाये गए है तो उसका समर्थन कतई नही किया जाना चाहीए | पाकीस्तान का धर्माधारीत राष्ट्रवाद की वजह से जो हश्र हूआ है उसे देखते हूए मै इसका कतई समर्थन नही करता हु. विभिन्न भाषा,संस्कृती,राष्ट्रीयताओ वाले भारत देश मे धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने का सपना पाले हुए जो लोग हिन्दूस्थान जिंदाबाद करते रहते है उनको भी हिन्दुस्थान जिंदाबाद कहने से पहले पाकिस्तान का हश्र देख लेना चाहिए.भारत एक देश है,जिसमे विभिन्न राष्ट्रीयताए है,उनकी अपनी भाषा,संस्कृती और इतिहास है. इसके बावजूद भारत के सत्ताधारी वर्ग द्वारा एक भाषा एवं एक संस्कृती के नाम पर इन सबको एक राष्ट्रीयता मे ढालने का प्रयास रहा है. इस प्रयास के विरोध मे आसाम,कश्मीर,मणिपुर,नागालैंड आदी जगह संघर्ष जारी है. भारत को एक राष्ट्र मे ढालने की कोशिश के विरोध मे अपने स्वनिर्णय,स्वशासन के अधिकार को लेकर कोई भी भाषाई या सामाजिक समूह खड़ा होता है तो सत्ताधारी जमात उसका दमन करने मे कोई कसर नहीं छोड़ती.इस मामले मे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों के रवैये मे कोई खास फर्क नहीं है. एक सेकुलर राष्ट्रवादी है तो दूसरा धार्मिक राष्ट्रवादी. कांग्रेस के पुरे शासनकाल का अगर बारीकीसे अध्ययन किया जाए तो उनके लिए छद्म सेकुलर शब्द ज्यादा उपयोगी सिद्ध हो सकता है.
जेएनयू मे जो कार्यक्रम किया गया उसके केंद्र मे कश्मीर का मुद्दा था. भारत की एवं पाकिस्तान की स्वाधीनता के साथ ही कश्मीर की स्वाधीनता लूट ली गयी है. कश्मीरी अफजल गुरू को न्यायिक प्रक्रिया मे गड़बड़ी करते हुए यूपीए सरकार ने खुद को अपने प्रतिद्वंदी से ज्यादा राष्ट्रवादी सिद्ध करने के चक्कर मे एवं जनता मे राष्ट्रवादी भावनाओ को उबाल कर पुनः सत्ता मे लौटने के लिए फासी पर लटकाया था. कश्मीर के स्वनिर्णय का मुद्दा,वंहा की जनता की इच्छा,उनके अपने राष्ट्रवाद के मायने को दरकिनार कर पाकिस्तान जिंदाबाद या हिन्दुस्थान जिंदाबाद बुलंद करने से हम और आप राष्ट्रवादी जरूर हो सकते है लेकिन यह सब करने के लिए हमको या आपको दूसरो की राष्ट्रीयता की भावना का खून करने की इजाजत कैसे हो सकती है..?
राष्ट्रवादी भावनाओं को उछालकर दोनों देशो का सत्ताधारी वर्ग जनता के दमन की राजनीती करता रहा है. दोनों भी देश अपने यंहा की राष्ट्रीयताओ को दमन करने के मामले में कई भी कम नहीं है.खुद को राष्ट्रवादी कहलानेवाले राष्ट्रवादीयों को उनकी परिभाषा में मेहनतकश दलितो,बहूजनो,आदिवासी एवं महीलाओं का स्थान क्या है..? अलग-अलग भाषिक एवं वांशिक समूहों क्या अधिकार होंगे .? यह सवाल पूछा जाना चाहीए | साथ ही हम सबको मेहनतकश दलितो,बहूजनो,आदिवासी एवं महीलाओं की मूक्ती का रास्ता किस वैकल्पिक राष्ट्रवाद से होकर गूजरेगा इसकी चर्चा भी करनी चाहीए | राष्ट्रवाद सबंधी लढाई को सर्वहारा के इन्कलाब तक ले जाने की चूनौती को हमे स्वीकारना होगा तभी हम इस अघोषित आपातकाल का सामना कर पाएंगे |

मौजूदा सरकार द्वारा जेएनयू के छात्रो की अभिव्यक्ती को कूचलने के लिए उनपर राष्ट्रद्रोह का चार्ज लगाना निंदनिय है | रोहीत को भी सत्ताधारी वर्ग के द्वारा राष्ट्रविरोधी गतिविधीयों में सामील होने का ठप्पा लगाकर प्रताडीत कीया गया था | आत्महत्या के बाद राष्ट्रवाद की परिभाषा को चूनौती देने सें बचने वाली ताकतो के लिए जेएनयू की यह घटना एक बडी ताकीद है | लढाई सिर्फ सहीष्णूता या असहीष्णूता,दलित-गैरदलित के बीच की नही बल्की सत्ताधारी राष्ट्रवाद एवं जनता के राष्ट्रवाद के बीच की लढाई है |
– दयानंद कनकदंडे

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