असहिष्णुता से आगे…….!

 

२०१४ में कांग्रेसविरोधी त्सुनामी पर सवार होकर अच्छे दिनों के सब्जबाग दिखाते हुए सत्तासीन हुयी सरकार इस मोर्चे पर कुछ भी नहीं कर पायी है .. हालाँकि कॉर्पोरेट हितो को सर्वोपरी रखते हुए उसने पिछले डेढ़ साल में जिस तरह से नीतीयो को बदला है वह काबिले तारीफ है.. इससे न मध्यवर्ग से उच्चमध्यवर्ग में जाने को आतुर लोग खुश है न झुग्गी से निकलकर फ्लैट में जाने को आतुर गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोग..उल्टा जीवनावश्यक चीजो के दाम जिस तरह बढे है उसने लोगो को “लौटा तो वह बुरे दिन” कहने को मजबूर किया है… कुछ दिन पहले आये गुजरात पंचायत चुनावों के नतीजे कहने को भाजपा के पक्ष में है लेकिन कांग्रेस की वापसी भी उसकी नीद बिघाडनेवाली है..प्रधानमंत्री के गृह जिल्हे मेहसाना में भी भाजपा को पराभव का सामना करना पड़ा है..पाटीदार आरक्षण आन्दोलन भी इसी  जगह से शुरू हुआ था.. हो सकता है,पाटीदार आन्दोलन ने कांग्रेस की वापसी में भूमिका निभायी हो लेकिन ही वाइब्रेंट गुजरात के गुब्बारे को जरूर फोड़ा है.. मोदी दुनियाभर में सस्ते संसाधनों एवं सस्ते श्रम के उपलब्धी की गारंटी देते हुए घूम रहे है लेकिन आज की तारिख तक दुनिया २००८ के आर्थिक संकट से उभरी नहीं है..अमरीका,यूरोप,चायना सभी गर्त में फसे हुए है.. ज्यादा से ज्यादा निवेश को आकर्षित करने के लिए जितनी बेरहमी  से मोदी ने अपना बुलडोजर चलाना प्रारंभ किया है उसके असंतोष की अभिव्यक्ती के रूप में भी इन चीजो को देखा जाना चाहिए..

मई २०१४ में मीली करारी जीत के बाद पिछले सालभर में हुए विधानसभा चुनावों में दिल्ली एवं बिहार में उतनी ही करारी हार का सामना भाजपा को करना पड़ा है.. लोकसभा चुनावों के परीणामो ने इस बात पर मुहर लगा दि थी की,मंडलवाद की राजनीती के सहारे ही मोदी सता के शीर्ष पर पहुंचे थे.. दरमियान के वर्षोँ में समता की राजनीती को समरसता में बदलकर संघ ने ओबीसी चेहरे को आगे बढाया था.. वही समता की राजनीती से आगे आये मंडलवादी लालू नीतीश साम्प्रदायिकता की राह पर चल पड़े थे .. मेरी पीढी के मतदाताओ को  मोदी की विकास की गुहार अपने विकास की गुहार लगी थी इसलिए उन्होंने इतिहास की परवाह किए बगैर वर्तमान के प्रचार के पक्ष में मत दिया… साल-डेढ़ साल के सरकार के वर्तन एवं उससे देशभर में उपजी असहिष्णुता के मद्देनजर बिहार में मंडल पार्ट-२ की स्क्रिप्ट लिखने का काम किया.. इस स्क्रिप्ट को आवाज देने में लालू कामयाब हुए तो चेहरा देने में नीतीश..पुरे चुनाव की बहस में कमंडल विरोधी मंडल की बहस जोरोसे थी विकास की बहस कही भी नहीं.. बीसवी सदी पूंजीवाद के विकास की सदी के साथ साथ समाजवाद निर्माण की ओर अग्रसर मेहनतकश जनता के प्रयासों की भी रही है.. रशियन क्रांति एवं चीनी क्रांति के दबाव स्वरुप पूंजीवाद ने जो कल्याणकारी चेहरा ओढा था उसे उसने पीछले 20 सालो में मेहनतकश जनता की चुनौती के कमजोर पड़ने के फलस्वरूप फाड़ फेंका है.. ..इंदिराप्रणीत घोषित आपातकाल से लेकर आज के मोदीप्रणित अघोषित आपातकाल तक का काल इसका साक्ष्य है.इस दरमियान मेहनतकश जनता के अधिकारों का भारी संकुंचन हुआ है तथा जल जंगल जमीन की लूट बेतहाशा बढी है..

नीतीश की विकास की जो भाषा है, वह सभी जातियों में दरमियान के समय उपजे मध्यवर्ग के आकांक्षाओ की प्रतिनीधी भाषा है ..मनमोहन,मोदी,नीतीश इन सबके विकास की परिभाषा एक ही है.. सब उसी पूंजीवादी माडल की मोडलिंग करनेवाले अच्छे अभिनेता है लेकिन सामान्य मतदाता ने उन्हें कल्याणकारी राज्य की वापसी के भ्रम में अपनी हताशा से उबरने के लिए चुना है इसे भी याद रखना चाहिए..

कल्याणकारी राज्य के वापसी के भ्रम में केजरी या नीतीश को चुनने से हमें वर्तमान असहिष्णुता से थोड़ी राहत और बेरहमी से लुटे जाने में ढिलाई तो मिल सकती है लेकिन मुक्ती नहीं.. संसद के शीत सत्र में भाजपा का रवैया बिहार की हार के बाद सहिष्णु सा हो गया है.जीएसटी,रक्षा एवं अन्य क्षेत्रो में एफडीआई को लेकर कानून पास करवाने के लिए यह सहिष्णु रवैया अपनाया जा रहा है इसका सीधा अर्थ यह है की जमीन,पानी,प्राकृतिक संसाधन आजीविका का हक  छीनने की गती में ज्यादा परिवर्तन नहीं आनेवाला है.इसलिए चाहिए की हमें जल्द से जल्द राहत मिल जाने के भ्रम एवं लालू नीतीश के द्वारा हमारी लढाई लढे जाने के  भ्रम से निकलकर जमीन पर आने की जरूरत है..

_  दयानंद कनकदंडे

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