दादरी कांड: जरूरत सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के विमर्श से आगे जाने की …..

दिल्ली,जो की भारत की राजधानी है,वहॉंसे कूछ दूर बिसहाडा गॉंव(दादरी इलाका,उ.प्र) में गोमांस घर में रखे होने की बात से खफा गॉंव के लोगों ने महम्मद ईखलाक की हत्या कर दि । जहॉं यह घटना हूयी है उसे हम सब नोएडा के नाम सें जानते है , यह दिल्ली का चमक दमक वाला ईलाका है । यह चमक दमक जिन लोगों को उजाडकर हूयी है उन उजाडे गए लोगोंके बीच के असंतोष को दरकिनार कर लोग ईस घटना का विश्लेषण करने में जूटे है,उससे हम सब लोगों को बचने की जरूरत है । सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के आईने में ईस घटना को देखने से ईसकी समझ हमें प्राप्त नही हो सकती । हमने हमारे पहले वाक्य में गोमांस रखे होने की अफवाह जानबूझकर नही कहॉं क्योंकी देश के धर्मनिरपेक्ष कहलाये जानेवाले लोग भी यह मानकर चलते की,मूसलमानही गोमांस भक्षक होता है या ज्यादातर गोमांस भक्षक मूसलमान ही होते है ।  महाराष्ट्र में जब पाबंदी लगायी गयी है उसको उठाने की मॉंग करनेवाले बीफ ईटर लोग नॉन मूस्लिम है ।ईस देश में प्राणीहत्या खासकर गाय और बैलो की हत्या के ऊपर पाबंदी की मांग जैन,बूद्ध से लेकर आधूनिक काल में महात्मा फूले तक ने की है । बूद्ध का काल इलापूर्व ५०० है, जबकी इस्लाम ७ वी सदी में आया है ।खेती की संपूर्ण व्यवस्था जो बडी जनसंख्या का भरणपोषण करती है  उससे जूडे ईन मवेशीओं को अपने भोग के लिए स्वाहा करने के खिलाफ ऊनकी लडाई रही । म.फूले ने भी गोहत्याबंदी कानून की मॉंग ईसी परीप्रेक्ष्य में रखी थी । गांधीजी द्वारा स्थापित एक संघ का नाम है कृषि-गोसेवा संघ । आज कृषि भारी संकट से जूझ रही है । खेती के कॉर्पोरेटायझेशन ने गाय बैलो को बडी संख्या में बाहर कर दिया है । कृषि का संकट ईतना गहरा है की पिछले बीस वर्षो    में  ३ लाख किसानों ने खूदकूशी कर ली है । स्थिती यह है की, खेती से किसान भी बाहर और गायबैल भी ।  सरकारे कृषि को संकट में डालकर गाय बचाने के नाम पर किसानों को धर्म के नाम पर आपस में भीडा रही है ।मूजफ्फरनगर में हिंदू जाट मूसलमान जाट सें भीडा था । जाट उत्तर भारत की किसान जाति है । आज जाट,पटेल,मराठा आरक्षण माॉंग रहे है ,क्यों ..??  वह आरक्षण नीती को खत्म करने की मंशा रखते ईसलिए नही तो कृषि संकट जिसे हमारी पूंजीवादी व्यवस्था नें निर्मान किया है उसके वजह बेदखल लोगों की इससे उभरने की छटपटाहट भर है । आज गाय बचाने की लडाई हो या आरक्षण बचाने की लडाईया समस्या सूलझानें की भासमान लडाईया है क्योंकी खेती और सामाजिक न्याय की गारंटी की व्यवस्था दोनों खतरे मे है ।  कृषि व्यवस्था को मानव और समाज हितैषी आधार पर खडा करने की लडाई लढे बगैर न सामाजिक न्याय की स्थापना हो सकती है न सांप्रदायिकता के खिलाफ लढाई ।
–  दयानंद कनकदंडे

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