श्रम की लूट एवं भूमि की लूट के खिलाफ एकताबद्ध हो.। जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करो । 2 सितम्बर की देशव्यापी हड़ताल को युवा भारत का समर्थन ।

 श्रम की लूट एवं भूमि की लूट के खिलाफ एकताबद्ध हो.।

                            जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करो ।

                2 सितम्बर की देशव्यापी हड़ताल को युवा भारत का समर्थन ।

देशभर के सभी केंद्रीय संगठनों ने और कर्मचारियो की फेडरेशनों ने एकसाथ मिलकर 2 सितम्बर 2015 के दिन देशव्यापी आम हड़ताल का आवाहन किया है । ठेका मजदूरी प्रथा को बंद करने,दिहाड़ीकरण और आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने,रक्षा,रेलवे,खुदरा व्यापार, वित्तीय क्षेत्रो में एफडीआई निवेश पर रोक लगाने,श्रम कानूनों में सुधारो को रद्द करने और भूमि अधिग्रहण कानून वापस लेने आदी 12 मांगो को लेकर यह देशव्यापी आम हड़ताल हो रही है । युवा भारत संग़ठन, जो की साम्राज्यवाद विरोधी युवाओ का अखिल भारतीय संगठन है, इस हड़ताल को सफल बनाने का आव्हान करता है..।

देश की वर्तमान राजग सरकार द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ विकास मॉडल,जो इस देश के पूर्ववर्ती कथित विकास मॉडलों का अगला चरण है । इस मॉडल की प्रतिपूर्ति हेतु बहुराराष्ट्रीय पूंजी की सेवा के लिए भूमी और श्रम को सस्ते दामो पर उपलब्ध करा देने के अजेंडे को पूरा करने में पहले दिन से लगी हुयी है ।

सरकार के द्वारा प्रस्तावित ‘स्मॉल फॅक्टरीज अधिनियम 2014 के अनुसार 40 से कम मजदूरो वाली सभी छोटी फॅक्टरिओ को 14 श्रम कानूनों से मुक्त कर दिया जायेगा । इस कानून के लागू हो जाने से करीबन 80 प्रतिशत कारखाने और उसके मजदूर श्रम कानूनों से मिलने वाले अधिकारो से बाहर हो जाएंगे । इन फॅक्टरिओ में में देश के सबसे आधुनिक और रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत माने जानेवाले आई टी सेक्टर का समावेश है। आई टी सेक्टर में 40  से  कम मजदूरो वाली  बहुतेरी कंपनीया है । साथ ही बाल श्रम(निषेध और नियमन ) कानून में संशोधन करके पारंपरिक उद्यम और कौशल विकास के लुभावने नाम पर वैध तथा अवैतनिक बनाने और महिला श्रमिको को उनकी समुचित सुरक्षा के बगैर रात्र पालियो में काम की अनुमति प्रदान करने जैसे प्रावधान श्रमिक हित विरोधी है । युवा भारत ऐसे कानूनों के क्रियान्वयन का पुरजोर विरोध करता है ।

देश के 60 प्रतिशत लोग आज भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार और भरण-पोषण के लिए खेती पर निर्भर है ।  किसान,खेतिहर मजदूर,पशुपालक से लेकर जंगल के मूलनिवासी आदीवासी परिवारो को मिलाकर एक बड़ी आबादी बनती है ।कृषि पर उनका अधिकार उसके जीविका का अधिकार है ।पिछले 20 वर्षो में खेती के लिए उपयोग में लाये जानेवाली भूमि का क्षेत्र घटा है । यह कृषियोग्य भूमि घटने का एकमात्र कारन है .. विकास के नाम पर अंदाधुंद भूमि अधिग्रहण …। इसी विकास प्रकिया के नाम पर इस देश में सेज नीती का क्रियान्वयन शुरू किया गया था । इसके विरोध में उभरे जनसंघर्षों में युवा भारत  संग़ठन ने सकारात्मक हस्तक्षेप किया  |जनविरोधी सेझ कानून २००५ के खिलाफ युवा भारत ने महामुंबई शेतकरी (किसान) समिती बनाकर रायगढ (महाराष्ट्र) में निर्णायक लढाई खडी की.पोस्को(उडीसा) सिंगूर,नंदीग्राम की लढाई में सक्रीय सहभागिता ,उलुबेरिया (प.बंगाल) में जमीन हथियाने कि साम्राज्यवादी नितीयो के खिलाफ संघर्ष खडा किया | सेझ के माध्यम से जल,जंगल,जमीन हथियाने कि इस प्रक्रिया में इन संघर्शो के परिणामस्वरूप २०१३ में ब्रिटीश हुकमत के जमीन अधिग्रहण कानून १८९४ में व्यापक संशोधन कर जमीन अधिग्रहण के लिए आवश्यक सार्वजनिक हित के प्रावधान को हटा दिया गया | हर प्रकार के निजी एवं सार्वजनिक परीयोजनाओ के लिए जमीन हथियाने को मान्यता देकर केवल मुआवजे व पुनर्वास के दायरे में चर्चा को सिमटा कर रख दिया | २०१३ में बनाये गए इसी “उचित मुआवजा का अधिकार,पुनर्स्थापना,पुनर्वास एवं पारदर्शिता भूमी अधिग्रहण विधेयक  २०१३ “ में  हाल कि  सरकार ने और भी संशोधन एक अध्यादेश द्वारा किये है |

अध्यादेश में कहा गया है कि पांच उद्देशो-सुरक्षा,रक्षा,ग्रामीण आधारभूत सरंचना,औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी सामाजिक के निर्माण के लिए अनिवार्य सहमती कि उपधारा आवश्यक नहीं है । साथ ही सामाजिक प्रभाव का आंकलन,5 साल तक अधिग्रहित भूमि का इस्तेमाल न करने पर उसको वापस करना जैसे प्रावधानो को हटा दिया है।

सरकार का यह फैसला पुंजीपतीयो के पक्ष में और किसान एवं गरीबो के खिलाफ तथा अलोकतांत्रिक है |

जिस प्रकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया और जिस प्रकार से सारी प्रक्रियाओ को तक पर रखकर श्रम कानूनों में सुधारो को अंजाम दिया जा रहा है ,यह दोनों प्रकार जनवादी परंपरा के संकेत और नीतियो का विडंबन और उल्लंघन है | सरकार यह संदेश देना चाहती है की वह बाजारकेंद्रित आर्थिक सुधारो के लिए बहुत बैचैन है |यह हकीकत है की बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था आज पुरे विश्वभर में चरमरा रही है;अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मंदी,युरोजोन का संकट तथा चीन कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती  इसका प्रमाण है | हाल ही में आये ग्रीस संकट ने इसकी पुष्टि कर दी है ।भारत की सरकार फीर भी आर्थिक सुधारो के उन्ही मार्गो का अनुसरण कर रही है | इसलिए विकास के  इस पुरे मॉडेल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है |

कुछ महत्वपूर्ण बातो को भी इस सन्दर्भ में देखे जाने की जरुरत है । जिन ट्रेड यूनियनों की तरफ से इस आम हड़ताल का आवाहन किया है, उनमे से बहुतायत राजनीतिक पार्टीयो से सबंधित ट्रेड यूनियनें ही है । CITU सीपीएम से सम्बद्ध है,INTUC कांग्रेस पार्टी से,BMS भाजपा से सम्बद्ध है ।जब यह राजनीतिक दल सत्ता में रहते वक़्त जनविरोधी नीतियों को लागु करते है तब यह ट्रेड यूनियनें आश्चर्यजनक रूप से इसपर चुप्पी साध लेती है । श्रम कानूनों में सुधारों  का प्रस्ताव जब कांग्रेस नीत यूपीए द्वारा लाया गया था तब INTUC खामोश रही । जब प.बंगाल की वाम मोर्चा सरकार मजदुर विरोधी सेझ कानून बंगाल में लेकर आयी तब CITU द्वारा इसका थोडा भी विरोध नहीं हुआ । हमको इस हड़ताल का समर्थन करते वक़्त कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए की यह ट्रेड यूनियनें अप्रत्यक्ष रूप से मेहनतकश वर्ग हितो के विरुद्ध भूमिका लेती रही है । ट्रेड यूनियनों का कर्तव्य मजदूरो के हितो का रक्षण करना होना चाहिए, न की वे जिन राजनितीक दलो से सम्बद्ध है उनके हितो का पोषण करना । एक राजनितीक दल के बदले दूसरे राजनितीक दल को सत्ता में बिठाने भर से मेहनतकश वर्ग के हितो को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। मेहनतकश जनता के ऊपर हो रही ज्यादतीयो को रोकने के लिए एक देशव्यापी जनांदोलन छेड़े जाने की जरुरत है । इससे कम और कुछ भी नहीं चल सकता । जनांदोलन का कुछ भी शॉर्टकट नहीं है ।

उद्योग के विकास के नाम पर बडे एवं भारी उद्योगो की चर्चा क्यो होती है?उद्योगो के विकास का अर्थ ग्रामीण   उद्योग  का विकास क्यो नही लिया जाता ?जिस विकास मॉडेल में कंपनीयो,निगमो की मुनाफाखोरी के लिए मानव श्रम  का शोषण हो ,जमीन एवं प्राकृतिक संसाधनो का दोहन हो तथा इससे जुडे परंपरागत किसान,आदिवासी समुदाय को उजाडे,उस विकास के मॉडेल को कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?विकास का सही मॉडेल वही है जो मनुष्य समाज एवं  प्रकृती के साथ संगती बैठाते हुए सबका विकास सुनिश्चित करे |इसलिए भारत जैसे श्रमबाहुल्य देश में मास प्रोडक्शन की  बजाय प्रोडक्शन बाई मासेज फॉर द मासेज की नीती ही कारगर हो सकती है |जल,जंगल,जमीन,पहाड आदी प्राकृतिक   धरोहर है,लोगो के जीविका के साधन है,इन्हे बाजार की वस्तू बनाना गलत है |

युवा भारत संग़ठन इन अध्यादेशो,सुधारो का विरोध करता है । जनविरोधी नीतियों के विरोध में चल रहे संघर्ष को जनहितैषी समाज के निर्माण की और अग्रसर करने तथा समतामूलक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाने का कृतसंकल्प करता है ।

(दयानंद कनकदंडे,कौशिक भारत,कृष्णा महतो,कैलाश राजभर )

युवा भारत की अखिल भारतीय संयोजन समीती द्वारा जारी

30 अगस्त 2015

नयी दिल्ली

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