युवा भारत : कानपुर इकाई के काम और भावी योजनाओं पर रिपोर्ट .

Vijay Chawla
India
युवा भारत : कानपुर इकाई के काम और भावी योजनाओं पर रिपोर्ट .

कानपुर बस्तियो का शहर है. ये बस्तियां शहर की स्थापना से जुडी हुई हैं . शहर की शुरुआत गंगा किनारे वर्ष १७५७ में हुई थी और प्रारंभिक आबादी गंगा किनारे ही बसी थी. आज इस क्षेत्र को पुराना कानपुर कहते हैं. बाद में औद्योगीकरण के दौर में यहाँ तमाम कारखाने लगाए गए .लकिन बस्तित्यों को सुधारने का कोई कार्यक्रम नहीं किया गया. अंग्रेजों ने भारत छोड़त समय एक बहुत ही गन्दा , लकिन आन्दोलनों में सबसे अव्वल , मज़दूर वर्ग और पून्जीपत्री वर्गों के एक बड़े केंद्र, वाले शहर को विरासत के साथ छोड़ा .

१९५० के दशक में प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू एक यात्रा के दौरान कानपुर के मजदूरों की बदतर स्तिथि को दिखकर हैरत में पड़ गए , और फिर उनके आदेश पर सरकार ने श्रमिक कालोनियों का निर्माण शुरू किया.

उसके बाद से भी कई तरह की स्कीमें लाइ गई लेकिन कुछ बातों को छोडकर इन बस्तियों की स्तिथि में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं आया है . इस बीच पिछली बसपा सरकार ने निर्धनों के लिए आवास बनवाने शुरू किये थे . वह योजना आंशिक रूप से ही पूरी हो सकी. सरकार की गिरने के बाद से कई नई योअजनाओं की चर्चा हो रही है लेकिन अभी तक कुछ लागू नहीं हो सका है और समस्त स्तिथि ज्यों की त्यों है . इन सभी स्कीमों में यह एक मंशा रहती है कि महंगी ज़मीन को भू महियाओं को सौंप दी जाय , इसपर बाद में .पहले बस्तियों का सामजि ढाँचा देख ले.

इन बस्तित्यों में सभी जातियों , और अधिकांशत: मेहनतकश वर्ग और कुछ मध्यम वर्ग ही पाया जाता है इन बस्तित्यों में , विशेष रूप से पुराना कानपुर, जहां युवा भारत ने संगठन का निर्माण किया है वहाँ जाति के हिसाब से मकान नहीं बने हुए हैं बल्कि किसी भी जाति का आदमी कही भी मकान बना लेता है . जातिवादी तनाव इन स्थानों में देखने के लिए नहीं मिला है. और यहाँ के निवासियों में एक नैसर्गिक सी वर्गीय सामोहिकता की भावना है. यहाँ सभी प्रकार के कार्य करने वाले लोग मिल जायंगे . मोटर मिस्त्री , कमर्चारी, कारखाना मज़दूर , रसोइया , चतुर्थ्श्रैनी सरकारी कर्मचारी आदि .यहाँ अधिकाँश महिल कार्मे भी कुछ ना कुछ रोज़गार करती हैं, वह चाहए घरों में काम का हो, अथवा सेल्स का , या कोई अन्य.

इसी पुराना कानपुर में हम युवा भारत का काम कानपुर में शुरू किया गया, उसकी प्रधान कारण यह था कि कैलाश् राजभर नामक कार्यकर्ता, जो आज संगठन की कानपुर इकाई के अध्यक्ष हैं , पुराना कानपुर की एक बस्ती में निवास करते थे. कैलाश जी अपने सामाजिक कार्य के दौरान बस्ती के अभी तक हावी एक कंग्रेसी नेता के द्ववारा पैदा की हुई बाधाओं का मुकाबला करते थे . नेता अव्वल रहता था. अधिकाँश बस्तियों में आप पाएंगे कि कुछ दादा लोग बाकी निवासियों को अपने रोआब में रखते हैं .पानी या टट्टी जाने तक के पैसे वसूलते हैं. कुल मिलाकर कैलाश राजभर, अनिल बाबा , राम शंकर र मिश्रा, कुसुम,शरद गुप्ता, सतीश , अरुण इत्यादि प्रारम्भिक साथियों ने इस नेता का मुकाबला किया और एक-दो साल तक कुछ ना कुछ विषय को लेकर कोर्ट कचहरी होतीं रही. लकिन जब हमारा जन कार्य आगे बड़ा, तभी हम नेता को पछाड़ने में सफल हुए.

इस बस्ती ,रानीघाट गोशाला, और सभी अन्य में सबसे अधिक और मूलभूत समस्या मकान निर्माण के लिए ज़मीन का हक मिलने की है .हमारी बुनियाद मांगे यही है कि जहां हम मकान बनाकर लंबे समय से रह रहे है वही ज़मीन हमें आवंटित कर दी जाय . यह मांग बुनियादी है क्योंकि गंगा के किनारे की ज़मीन के दाम बहुत अधिक हो चुके हैं और सभी निर्माण कंपनियों की निगाहें इन सब ज़मीनों पर लगी हुई है . इन भू माफियाओं से संघर्ष हमारा बुनियादी संघर्ष है.अभी तक इस संघर्ष में हम कुछ ही प्रगति कर पाए हैं लेकिन अभी ना जीते हैं और ना ही हारे.इसके अलावा अन्य मांगे जैसे संडास की व्यवस्था और टूटने पर उसका दोबारा निर्माण , पानी की व्यवस्था . रोशनी और आर सी सी की सड़क का निर्माण , इत्यादि कार्य करवाने में हम सफल रहे हैं .

पुराना कानपुर की गंगा किनारे दूसरी बस्ती सर्जूपुर्वा में तो गोशाला के सदस्यों ने ही काम शुरू किया , एक कमेटी का निर्माण किया . कमेटी के सद्स्त्यों नही युवा भारत के मार्ग दर्शन में निरंतर मेहनत करके अपनी कई मांगो को मनवा लिया है .इनकी सड़क टूट जाने से बेहद तकलीफ हो गई थी. निरंतर सामूहिक प्रयासों के बाद अब सड़क बन गई है . इससे साथियों का युवा भारत पर विश्वास बढ़ गया और लगभग तीस से भी अधिक निवासी सदस्य बन गए हैं.

यहाँ पर काम करने का तरीका पूरे तौर पर लोकतान्त्रिक रहा है. सभी निर्णय बैठकों में ही लिए गए हैं. किसी अधिकारी से मिलने के लिए आम तौर पर शिष्ट मण्डल ही गया है. बस्ती समूह के लोग ही गए हैं. इस कार्य में विजय लक्ष्मी , नरेन्द्र ,विमला , दिलीप ने अग्रानी भूमिका निभाई है .इस काम करने की पद्धति से नये साथियों की ट्रेनिंग हो जाती है ,उनका आत्म विश्वास बढ़ता है सामूहिकता में वृधि और उसका महत्व समझ में आता है. एक सामूहिक नेतृत्व का विकास का रास्ता खुल जाता है

. गोशाला और संर्जूपुर्वा मैं निरंतर संघर्ष और भगत सिंह की जन्मतिथी,मज़दूर दिवस और महिला दिवस के तीन कार्यक्रम आयोजित किये हैं जिसमें आम तौर पर ७५-१०० लोगों की उपस्थ्तिती थी . इन आयोजनों और इनमें परचा निकालने से जनता की चेंतना का विकास हुआ है. और युवा भारत को मज़बूत करने में सफलता मिली है.

युवा भारत के काम से आस पास की बस्तियों में भी चर्चा शुरू हो गई है . अब युवा बहारत के साथियों को कई स्थानों से निमंत्रण अ रहे हैं और वाय्सब युवा भारत में भर्ती होना चाहते हैं .इन कामों को अब शुरू किया जाएगा .

गत राष्ट्रीय कार्यकारिणी से साथी लोग उत्साहित लौटे हैं और वापस आकर उन्होनें स्थानीय सम्मेलन की तैयारियां शुरू कर दी है . उसकी तारिख अभी तय नहीं है . वे चाहते हैं कि पहले सम्मलेन हो और अगले दिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो . समाप्त.

प्रस्तुती :कैलाश और सतीश .

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