Yuva Bharat Constitution (Hindi)

Yuva Bharat Constitution Hindi

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बाबा राम रहीम प्रकरण पर युवा भारत अखिल भारतीय संयोजन समिती का वक्तव्य

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को सुनाई गयी २० साल सश्रम कारावास की सजा का युवा भारत संगठन स्वागत करता है ।बलात्कार के लिए बाबा को सजा सुनाया जाना एक अहम घटना है । बाबा के विरोध में लढाई खडी करनेवाली साध्वी बहनो एवं रामचंद्र छत्रपती जैसे साथीयो के संघर्ष को संगठन सलाम करता है । राम रहीम प्रकरण पर हरियाणा एवं केंद्र सरकार के प्रमुखो द्वारा लिए गए दब्बू रवैये की हम कडे शब्दो में निंदा करते है । बलात्कारियो के लिए फांसी की सजा की मांग करनेवाले बहुतायत लोग इस दौरान चुप रहे इसे हम चिंताजनक मानते है । फांसी की सजा के हम सख्त विरोधी है । आँख के बदले आँख के न्याय से दुनिया अंधी हो जायेगी । किंतु फासी की सजा के हिमायती लोगो का जो निर्भया प्रकरण के बाद मुखर थे उन्हे राम रहीम प्रकरण में साध्वीयो एवं रामचंद्र छत्रपती के साथ खडे होकर संगठित होकर अभियान चलाने की आवश्यकता थी । हमारे समाज में घटना विशेष के बारे में ही प्रतिक्रिया देने का जो नया चलन आया है वह भी चिंता का विषय है ।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को अदालत द्वारा हिरासत में लिए जाने का आदेश देने के उपरांत पंचकुला में भडकी हिंसा एवं उसके भडकने का अंदेशा होने के बावजुद उसको रोकने की नाकामी के लिए केंद्र एवं हरियाणा राज्य की सरकारे जिम्मेवार ही नही,दंगे को सुलगते रहने देने हेतू कसुरवार भी है ।दंगो का तय समय में भडकना एवं शांत होना संशयास्पद ही है । बाबा राम रहीम का सत्तापक्ष एवं विरोधी पक्ष के राजनीतीक दलो के साथ सियासी गठजोड रहा है । बाबा के सबंध में ठोस भूमिका लेने की सुरत में सियासी गठजोड गडबडाने के भय-स्वार्थ से उन्होने यह सब घटित होने दिया है ।

बीते २०-२५ सालो में खासकर आर्थिक नवउदारवाद के दौर में नये-पुराने मठ,डेरे,बाबाओ का विस्तार हुआ है । पंजाब-हरियाणा में मुख्य धर्म-संस्थानों के अलावा लगभग 9000 डेरे है । पूरे देश में गिनती की जाय तो इनकी संख्या लाख से भी अधिक हो सकती है।पहले कई तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक सुधारों की मुहिम चला करती थी लेकिन अब सभी जगह  मजहबी अभिनयपरकता का विशाल वैभव  है।ये संस्थान व्यक्ति को वैभव के साम्राज्य की आराधना में संलग्न कर भक्तो के बीच भोगवाद का प्रचार करते है । प्रवचन के साथ-साथ दवा, दैनंदिन उपयोग एवं उपभोग की वस्तू,ऑडीओ-विडीओ कॅसेटस आदी का कारोबार भी खडे किये हुए है । आर्थिक नितीयो तथा सामाजिक उपेक्षा के शिकार लोग इन बाबाओ की शरण लेते है । कल्याणकारी राज्य के पीछे हटने की सुरत में समाज में उपेक्षित वर्ग की तादात बढ रही है । ऐसे में मसिहा बने यह बाबा पुंजीवादी नितीयो से निर्मित अलगाव के अवकाश को पाटकर जनता का अराजनीतिकरन कर उनका ध्यान उनकी माली हालात के लिए जिम्मेवार अर्थ-राजनीतीक-सामाजिक कारनो से भटकाने का काम कर रहे है ।यह बाबा राजनेताओ सें साठगाँठ कर अपने स्वतंत्र राज्य जैसी समानांतर सत्ता कायम कर लेते हैं।इनके पास अपनी पुलिस-फौज बनती जाती है।जो अंधानुयायी इनके यहाँ आते हैं वे चूंकि वोटर भी होते हैं इसलिए सत्ताखोर नेता इनका संरक्षण प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं ।इन भक्तो की भीड के सहारे चूनाव भी जीते जा सकते है तथा समुदाय विशेष के बीच  में  दहशत निर्माण के लिए भी इनका उपयोग किया जाता रहा है । राजसी प्रभाव फैलता और बढ़ता जाता है  जो इसके आड़े आने का साहस दिखाता है उसे ये आसानी से रास्ते से हटाना जानते हैं। ऐसेही एक बाबा अपनी समानानंतर शक्ती की बदौलत देश के बडे सुबे का मुख्यमंत्री बन बैठा है ।

 

डेरा सच्चा सौदा,कबीरपंथ,नाथपंथ आदी मूलरूप से समतावादी पंथ जोकी हिंदू धर्म के मोनोलिथ के विरोध में खडे है उनपर ऐसे पाखंडी,बलात्कारी बाबाओ का कब्जा हो जाने की वजह से वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा सत्ताधारी जमाते इन धाराओ के लोगो को समुदाय विशेष के विरोध में गोलबंद कर सामाजिक फासीवाद के ब्राह्मणी संस्करण के निर्माण में लगी है । इन पंथो को भोगवादी ,स्त्री विरोधी,पितृसत्ता समर्थक बुनियाद के आधार पर ढाला जा रहा है । इन बाबाओ के वक्तव्यो से साक्षी महाराज आदी एवं योगी आदित्यनाथ की अधिकारीक वेबसाईट पर छपे उनके लेखो के आधार पर देखा जा सकता है । लोकतंत्र के भीडतंत्र में तब्दील होने एवं उसकी चालक स्त्रीविरोधी,जातीवादी,सांप्रदायिक विचारधारा के विरोध में हमे एकजूट होकर संघर्ष चलाने की जरूरत है ।

एक तरफ भ्रष्ट,बलात्कारी,विलासी बाबाओ की संपत्ती जब्त कर उनपर मुकदमा चलाने का अभियान सभी प्रगतीशील समुहो को चलाना होगा ।दुसरी तरफ समता को माननेवाले पंथो,डेरो को स्त्री-पुरुष समानता,उपभोक्तावाद का विरोध के आधार पर जोडकर व्यापक जनता के बीच सामाजिक फासीवाद के विरोध का प्रबोधन अभियान चलाना पडेगा जो लोकतांत्रिक मुल्यो की पुनर्स्थापना की नीव के रूप में आगे बढे । महाराष्ट्र में वारकरी,महानुभाव,लिंगायत,बौद्ध,इस्लाम धर्म अनुयायी एवं महंतो के द्वारा ४-५ साल पहले सर्वधर्मीय सर्वपंथीय सामाजिक परिषद का गठन इस दिशा में किया गया एक महत्त्वपूर्ण प्रयास रहा है । ऐसे और भी प्रयासो को आगे बढाने की आज आवश्यकता है ।

 

अखिल भारतीय संयोजन समिती

युवा भारत
दि.२९ अगस्त २०१७

http://www.yuvabharat.wordpress.com

Email- bharatyuva@gmail.com

चले जावं DMIC, बुलेट ट्रेन, वाढवण बंदर, एक्सप्रेसवे, MMRDA, सागरी महामार्ग चले जावं !

 

प्रकृती एवं समाज संवर्धन परिषद

दि. 9 अगस्त 2017.

स्थल : तलासरी बस डेपो मैदान, तलासरी, जि. पालघर.(महाराष्ट्र)

 

भाई और बहनो,

हम सब मेहणतकश आदिवासी,किसान, मच्छीमार तथा सभी आम भूमीपुत्रो के जीवन में अच्छे दिन आने की बजाय एक के बाद एक संकट मंडराते जा रहे है । विकास के नाम पर बडे शेठ-साहूकारों,पुंजीपतीयो के फायदे के लिए हम सबको हाशिए पर फेंकनेवाले एवं पर्यावरण का विनाश करणेवाले प्रकल्पो को लादा जा रहा है ।

देशी-विदेशी पुंजीपतियो के फायदे के लिए सरकार 18 औद्योगिक कॉरिडॉर बनाने जा रही है । अकेले दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे के निर्माण हेतू 4 लक्ष 36 हजार 486 स्क्वे.कीलोमीटर अर्थात देश की कुल भूमी का 13.8 प्रतिशत,उसमे गुजरात 62%,महाराष्ट्र की 18 % भूमी इसके प्रभाव में आनेवाली है । हमारे देश की 17% जनसंख्या को यह प्रकल्प उध्वस्त कर देगा । इसमे महाराष्ट्र,गुजरात,मध्यप्रदेश,राजस्थान तक फैला आदिवासी क्षेत्र पुरी तरह से उध्वस्त होकर आदिवासी समूह हाशिए पर धकेल दिया जायेगा । पहले से ही प्रदूषण के शिकार दादरा नगर हवेली केंद्रशासित प्रदेश का संपूर्ण अस्तित्व ही इस प्रकल्प की बदौलत नष्ट हो जायेगा  । इस औद्योगिक गलियारे के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिस्से के रूप में मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन,मुंबई-वडोदरा एक्सप्रेस-वे,वाढवण बंदर सागरी महामार्ग,समर्पित रेल माल यातायात मार्ग(DFC),MMRDA विकास प्रारूप,नागपूर-मुंबई समृद्धी महामार्ग भूमीपुत्रोपर लादे जा रहे है । इन सभी विनाशकारी प्रकल्पो के लिए केंद्र बननेे जा रहा नवीनतम पालघर जिला अपना अस्तित्व ही खो देने की स्थिती में होगा एवं अपनी पहचान खो देगा । MMMRDA विकास प्रारूप के वजह से मुंबई महानगर विस्तारित हो वसई-उत्तन तथा रायगड हरित क्षेत्र काँक्रीट के जंगल में तब्दील हो जायेगा । इन सबके के लिए पालघर,थाना जिले का सिंचाई के लिए आरक्षित पानी लुटाया जा रहा है ।वाढवण बंदर एवं सागरी महामार्ग मच्छीमार, कीसानो की आजीविका पर कुठाराघात साबीत होने जा रहे है । पर्यावरण की दृष्टी से संवेदनशील वाढवण में जेएनपीटी से भी बडा बंदर स्थापित होने जा रहा है । जंगलो को काट, पहाडों को तोड,समुंदर में भराव डाल बंदर निर्माण हेतू 5 हजार एकड जमीन निर्माण का उद्देश है,इससे सारी समुंदर किनारा,खेतीबाडी, फल के बाग उध्वस्त होणेवाले है । उसी तरह गुजरात में नारगोल बंदर के विकास एवं विस्तार के नाम पर सैंकडो एकड कृषीभूमी का अधिग्रहण किया जा रहा है । इससे हजारो मच्छीमार एवं किसान परिवार उध्वस्त होणे जा रहे है ।

मुंबई-वडोदरा एक्सप्रेस-वे के बहाणे कृषी योग्य जमीन छिनकर किसान, खेतिहर मजदूर,भूमीपुत्रो को उध्वस्त करणे का षडयंत्र सरकार कर रही है । पालघर एवं थाना जिले के 44 गांव तथा गुजरात-दादरा नगर हवेली के 163 गावो की कृषीभूमी लेने का दांव खेला जा रहा है । आम रेल यात्रीयो के लोकल ट्रेन आदी को सुखदायी करने की प्राथमिकता को छोड 8 घंटे की रेल यात्रा को ढाई घंटे पर ले आने के नाम पर जनता का 1 लाख 10 हजार रुपया खर्चा कर मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन को जनता पर लादा जा रहा है । इसकी किम्मत आदिवासीओ एवं पशु-पक्षीयोको अपना जंगल खोकर देनी होगी । आदिवासी समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओ के संवर्धन संवर्धन एवं आजीविका, नैसर्गिक संसाधनो के संरक्षण के लिए 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1993 को लिया गया है । 13 सितम्बर 2007  के दिन आदिवासी अधिकारो के घोषणापत्र  को युनो की आमसभा में मंजुरी दि गयी है । इस घोषणापत्र का उल्लंघन राजकर्ताओ द्वारा किया जा रहा है ।एक तरफ संविधान के द्वारा जीने के मूलभूत अधिकारो की गारंटी,पांचवी अनुसुची तथा स्वयं निर्णय के अधिकार को ध्यान में रख विशेष संरक्षण दिया गया है । दुसरी तरफ संघर्ष के द्वारा प्राप्त एवं हम लोगो द्वारा संवर्धित जमीन,जंगल तथा पााणी  को

राजकर्ता जमात धनपतीयो के लिए हमसे छिनकर संविधान को खुलेआम पैरोतले रौन्द रही है ।सरकार का दावा है की,यह सब देश के विकास के नाम पर किया जा रहा है । सवाल सीधा है की मैं मुट्ठीभर लोगो के धंदो को फायदे के लिए करोडो लोगो को विस्थापित करनेवाली नितीयो को विकास कहे या विनाश..?? और इसकी किमत हम आम लोगो द्वारा ही क्यो चुकायी जानी चाहीये..?? इसलिये महाराष्ट्र,गुजरात,दादरा नगर हवेली के हम सब आदिवासी,मच्छीमार, किसान, भूमिपुत्र संगठीत होकर संघर्षरत है । 9 अगस्त आंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस तथा अगस्त क्रांती दिवस के मौके पर तलासरी एसटी डेपो मैदान में सुबह 11 बजे इकठ्ठा होकर सभी विनाशकारी प्रकल्पो को चले जाव का इशारा देंगे ।

अपने अस्तित्व,अगली पिढी के भविष्य,प्रकुती एवं समाज के संवर्धन हेतू प्रचंड संख्या में उपस्थित होने का आप सब से नम्र निवेदन है  ।

 
*आयोजक*

*भूमिपुत्र बचाव आंदोलन*

1  भूमी सेना
2. आदिवासी एकता परिषद

3. खेडुत समाज (गुजरात)
4. शेतकरी संघर्ष समिती

5. वाढवण बंदर विरोधी संघर्ष समिती
6. ठाणे जिल्हा मध्यवर्ती सहकारी संघ
7. महाराष्ट्र मच्छिमार कृती समिती

8. कष्टकरी संघटना
9. सुर्या पाणी बचाव संघर्ष समिती

10. पर्यावरण संवर्धन समिती, वसई

11. पर्यावरण सुरक्षा समिती, गुजरात

12.आदिवासी किसान संघर्ष मोर्चा, गुजरात

13. कांठा विभाग युवा कोळी परिवर्तन ट्रस्ट, सूरत

14.  खेडुत हितरक्षक दल, भरुच

15. भाल बचाव समिती, गुजरात

16 श्रमिक संघटना

17. प्रकृती मानव हितैषी कृषी अभियान
18. सगुणा संघटना

19. युवा भारत

रात्री दिवस आम्हां युद्धाचा प्रसंग ।

रात्री दिवस आम्हां युद्धाचा प्रसंग|
अंतर्बाह्य जन आणि मन ||१||
जीवाही आगोज पडती आघात|
येउनिया नित्य नित्य करी ||२||
तुका म्हणे तुझ्या नामाचिया बळे|
अवघियांचे काळें केले तोंड||३||

शेतकरी- कामगारांचे राज्य आणायचे आहे म्हणत संयुक्त महाराष्ट्राची लढाई लढविली गेली आणि दिल्लीश्वरांना आव्हान देत संयुक्त महाराष्ट्र उभा राहिला. वारकऱ्यांच्या भागवत धर्माचा आणि छ. शिवाजी महाराजांच्या हिंदवी स्वराज्याचा ऐतिहासिक वारसा असलेल्या संयुक्त महाराष्ट्रात सत्तावन वर्षानंतर सुद्धा शेतकऱ्यांना हमीभाव मिळत नाही, कर्जमुक्ती होत नाही म्हणून संपावर जावे लागते यापेक्षा शोकांतिका कोणतीच नाही. कांदा मुळा भाजी, अवघी विठाई माझी अशी भुमिका घेत शेतकऱ्यांना आणि त्यांच्या श्रमाला सर्वात जास्त महत्व देणारे वारकऱ्यांचे संस्कार आणि शेतकऱ्यांच्या भाजीच्या देठालाही हात लावाल तर याद राखा अशा छ. शिवाजी महाराजांचा विचार महाराष्ट्रात दिवंसाढवळ्या सरकारकडून पायदळी तुडवला जात आहे. बुडती ही जन, न पहावे डोळा, म्हणून कळवळा येत असे अशी संतश्रेष्ठ जगतगुरू तुकोबारायांची भुमिका घेत आपण वारकरी मंडळींनी शेतकऱ्यांच्या संदर्भात वारकरी-शेतकरी अशी ऐक्याची भुमिका घेतली पाहिजे असे आम्हांस वाटते.
पेरणीचा काळ लक्षात घेता सरकारने दिलेल्या आश्वासनावर विसंबून पेरणीची कामे आटोपून व आटोपत-आटोपत आपण पंढरीच्या वारीत सामील झालो आहोत. स्वातंत्र्यापूर्वी १८७५-७६ मध्ये झालेल्या सावकारशाही विरोधी महात्मा फुले यांच्या नेतृत्वात झालेल्या शेतकरी उठाव, नंतर १९३०च्या दशकात डॉ.आंबेडकर आणि नारायण नागू पाटील यांच्या नेतृत्वात खोतीविरोधी चरीचा संप असे मोठमोठे आंदोलने महाराष्ट्रात झाली होती आणि त्यामुळे शेतकऱ्याला मान, सन्मान आणि हक्क मिळत होता परंतू माघील काही वर्षांपासून सरकारच्या धोरणांमुळे आणि निसर्गाच्या चक्रामुळे पुन्हा सुलतानी आणि अस्मानी संकट शेतकऱ्यांवर आले आहे. असेच काहीसे संकट डाउ या देशविघातक कंपनीच्या निमित्ताने महाराष्ट्रात काही वर्षांपूर्वी आले होते, त्यावेळी आपण वारकऱ्यांनी आपला निसर्ग, नदी आणि जंगल वाचवणारा वारसा सांगत त्या कंपनीला पळवून लावले. तसेच काहीसे शेतकऱ्यांच्या जमिनी घेणारे संकट समृद्धी महामार्गाच्या निमित्ताने महाराष्टात निर्माण झाले आहे. सद्या शेतकऱ्यांनी उभारलेला अभूतपूर्व लढा या मालिकेतील आहे. फडणवीस सरकारने सरसकट कर्जमाफीचे आश्वासन देत लाख रुपयापर्यंतचेच कर्ज माफ करण्याची घेतलेली भुमिका व पेरणीकरीता १०००० रुपयाचे नवे कर्ज देताना जे जाचक निकष लावले आहे. त्याने शेतकरी बांधवाचा भ्रमनिरास केला असला तरी अस्मानी आणि सुलतानी अशा संकटाशी लढण्याचे बळ आम्हास पांडुरंग देवो म्हणीत आपण वारकरी-शेतकरी पंढरीच्या दिशेने मार्गक्रमण करीत चालतो आहोत व लढा जिंकेपर्यंत आपण मार्गस्थ असणार आहात.
हा तो नोहे कांही निराशेचा ठाव|
भले पोटीं वाव राखिलिया||१||
विश्वंभरे विश्व समविले पोटीं |
तेथेची शेवटीं आम्ही असो ||२||
नेणता चिंतन करिता अंतरी|
तेथे अभ्यंतरी उमटेल||३||
तुका म्हणे माझा स्वामी अबोलणा |
पुरवू खुणे खूणा जाणतसे||४||

मागील काही वर्षापासून शेतीचे संकट अधिक गंभीर झाले आहे.स्वातंत्र्यानंतरच्या आधीच्या वर्षात शेतीकडे जे थोडेफार लक्ष सरकार कडून दिले जात होते, ते १९९१ पासून या देशात सुरु करण्यात आलेल्या खाजगीकरण,उदारीकरण आणि जागतिकीकरणाच्या धोरणास या देशात सुरुवात करून तिला बाजाराच्या तोंडी देऊन सर्व पक्षीय आणि रंगीय सरकारने आई जेऊ देईना आणि बाप भिक मागू देईना या स्थितीस आणून सोडले आहे. सरकारी मदत नाही,बियाणे,खते-कीटकनाशक यावर बाजाराचा कब्जा,या वस्तुकरिता बँककर्ज घेण्यावाचून पर्याय नाही आणि त्यातही त्याची उपलब्धताही जेमतेमच. पुन्हा खाजगी सावकाराचे कर्ज घेण्यावाचून पर्याय राहिलेला नाही अशाही परिस्थितीत पिकविल तर मालाला हमीभाव नाही. हातात येणाऱ्या रक्कमेत काय काय करायचं? कर्ज कसं फेडायचं? व्याज भरायचं? दैनंदिन गरजा भागवायच्या? मुलांना शिकवायच? घरातली आजारपण निस्तरायची कशी? असे एक ना अनेक प्रश्न आ वासून उभे आहेत. ऐपत असणाऱ्या व २०-२० मजले घर बांधून ऐशोरामात जगणाऱ्या अदानी-अंबानीचे करोडो-अब्ज रुपयाचे कर्ज सरसकट माफ करणारे सरकार मात्र शेतकऱ्यास त्याचे काही लाख कोटी रुपयाचे कर्ज माफ करीत नाही.त्याच्या मालास हमीभाव देत नाही व याकरिता त्याला संपासारखे याआधी कधीही न उपसलेले हत्यार उगारावे लागते हि आपल्या महाराष्ट्राला उद्विग्न करणारी परिस्थिती आहे आणि एवढे करूनही आश्वासन देऊन पाठीत खंजीर खुपसण्याचे काम सत्ताधारी वर्ग करतो आहे.
आपणच वर उल्लेख केल्याप्रमाणे काही वर्षापूर्वी शेती-पाण्यावर आक्रमणकरी डाउ प्रकल्पास हाकलून लावले होते तर तिकडे हजारो एक्कर शेतजमिनी ताब्यात घेऊ पाहणाऱ्या अंबानीला रायगडच्या आगरी-शेतकरी बांधवानी हाकलून लावले होते. मागच्या वर्षभरात आपल्याकडे निघनाऱ्या मराठा मूक मोर्च्याच्या मागण्यात दिसणारी शेतकरी संकटाची तीव्रता गंभीरपणे जाणवत होती. गुजरात,राजस्थान या राज्यात आरक्षणाच्या मागणीच्या आधाराने उभ्या राहणाऱ्या चळवळीच्या मुळात गंभीर होत जाणारे शेतीचे संकट आहे हे लक्षात घेतले तर समस्या किती गंभीर आहे हे समजून येईल. आधीच शेतीत न राहिलेला दम आणि त्यातही आपली पत खाली घातली गेलेली.. शेतीकडे सरकार लक्ष घालणारच नाहीये अशी दिसणारी चिन्ह आहेत.जमिनीचे भाव गगनाला भिडले आहेत.रियल इस्टेट जोरात आहे. जगभरात आजच्या घडीला मंदी आहे.बाहेरच्या उद्योगांना आपल्या देशात जमीनी देण्याकरीता मुंबई ते नागपूर समृद्धी महामार्ग, मुंबई ते दिल्ली औद्योगिक कॉरिडोर याद्वारे मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया वगैरेच्या घोषणा देत शेतकऱ्याच्या जमीनी ताब्यात घ्यायला निघाले आहे. आम्ही पिकविलेली तूर विकत घ्यायला तयार नसलेले हे सरकार मात्र आमच्या जमीनी समृद्धी महामार्गाच्या नावाखाली घ्यायला साम-दाम-दंड-भेद असे सगळे उपाय आजमविन्याच्या तयारीत दिसते आहे. शेतकऱ्याच्या शेतजमिनी ताब्यात घेऊन कसली समृद्धी येणार आहे? नागपूर ते मुंबई अशी सलग शेतजमीन ताब्यात घेतली कि शेतकरी उरतोच कुठे? शेतकऱ्यास समृद्ध करावयाचेच असेल तर मग संपूर्ण कर्जमुक्ती, शेतमालाला हमीभाव, शेतकऱ्याला पेन्शन, शेतकऱ्याच्या मुलाच्या शिक्षनासाठीच्या सुविधा या मागण्यांचा सरकार का विचार करीत नाही हा प्रश्न आम्हास यानिमित्ताने उपस्थित करावयाचा आहे. सत्ताधारी वर्ग म्हणून सगळ्या रंगांची सत्ताधारी जमात एकत्र येवून आमच्या हितावर घाला घालणार असेल तर वारकरी म्हणूनची आमची अस्मिता वाचविन्याकरीता नाठाळाच्या माथी काठी हानने हे आमचे कर्तव्यच ठरते…
उदार तरी देऊ गांडीची लंगोटी|
कुटिलाच्या काठी नाकीं देऊं||१||
भले तरी आम्ही जगासी दाखऊ|
दुर्जनासी होऊं काळ तैसे||२||
भल्याचिया आम्ही कुटुंबास तारू|
निंदकाचा संसारु पहावेना||३||
तुका म्हणे आम्हा दया येते कांही|
म्हणोनिया काही बोलतसें||४||

 

संपर्क
विनोद भुजबळ-९५०३४८६०३३ (अहमदनगर), सुरेश सोमकुंवर-९४२८२२१८२९ (नागपूर)
रोहित बागुल-९४०५१९६५४३(धुळे),भूषण पवार-७०२०४९५७४४(सोलापूर),शशी सोनवणे-८७९३६०६८३५ (वसई-विरार)
सुनील चौधरी-९३७३१२६४५०(नागपूर), दयानंद कनकदंडे- ९६३७९०१२०४ (नांदेड)
इमेल- bharatyuva@gmail.com, ब्लॉग- http://www.yuvabharat.wordpress.com
टीप- सदरील पत्रकातील अभंग हे समग्र तुकाराम गाथा, कै. तुकाराम तात्या पडवळ यांनी संपादित या ग्रंथातून घेतले आहेत.

 

युवा भारत महाराष्ट्र राज्य समितीचे पत्रक -२२ जून २०१७

शेतीचे संकट हे नुसते शेतीचे संकट नसून शेती-माती-नाती-जाती आणि संस्कृतीचे संकट आहे !!!

 

विरोधी पक्षाचं कारस्थान म्हटलं की सगळं काही सहजं नाकारता येतं अशी सरकारची व्यूहरचना असते. जनआंदोलनांचे राजकीय महत्व ओळखून विरोधी पक्ष सुद्धा जन आंदोलनात घुसून कहीही करून सरकार अस्थिर करण्याचा किंवा पाडण्याचा प्रयत्न करीत असतो, यातून जनआंदोलनाचे प्रश्न सुटावे ह्या भूमिकेपेक्षा पेक्षा आपली राजकीय पोळी भाजून घ्यावी भूमिका जास्त दिसते, पण यामुळे गंभीर प्रश्नांचा बोजवारा उडतो. 2014 पुर्वीच्या शेतकरी मागण्या करणारे फडणवीस,भाव मिळाला पाहिजे म्हणून मागणी करणारे अनेक भाजपाचे लोक दिसतील जसे आजकाल कॉंग्रेस आणि राष्ट्रवादी चे दिसतात. सत्ता बदल झाली पण शेतीचा प्रश्न तसाच राहिला आहे म्हणून एखाद्या पक्षाची सत्ता गेली म्हणजे शेतकऱ्यांचा प्रश्न संपले अशी भाबडी आशा आपण बाळगू नये ते राजकीयदृष्या आणि शेतीदृष्ट्या सुद्धा योग्य नाही. महाराष्ट्रासारखीच पंजाब, तामिळनाडू आणि मध्यप्रदेश येथील शेतकऱ्यांची परिस्थिती झालेली आहे. या राज्यातील सत्ताधारी पक्ष आणि विरोधी पक्ष हे वेगवेगळे आहेत परंतू शेतकऱ्यांसाठीच्या धोरणात आणि शोषणात खूपच साम्यपणा आहे.
मागील काही वर्षांपासून शेतीचे संकट गंभीर झालेले आहे त्यावर उपाय, चर्चा आणि संवाद झाला पाहिजे सोबत शेतकऱ्याला सन्मान आणि मोबदला सुद्धा मिळायला हवा विशेषतः कोरडवाहू शेतकरी, अल्पभूधारक शेतकरी, दुष्काळग्रस्त शेतकरी इत्यादी. महाराष्ट्रातील लाखोंचे मराठा क्रांती मोर्चे, गुजरातमधील पाटीदार आंदोलन, राजस्थान मधील गुज्जरांचे आंदोलन हे जरी जातीला ओबीसी दर्जा मिळून आरक्षण मिळावे म्हणून झाले असतील तरी त्याच्या पृष्ठभूमीत शेती संकट आणि शेतकरी समूहांच्या समस्या आहेत. या सर्व जाती उत्पादक शेतकरी जाती आहेत. यामुळेच शेतीचा प्रश्न नुसतां शेतीचा प्रश्न नाहीये तर जातीचा सुद्धा प्रश्न आहे. शेतकरी चळवळ आणि जातीअंत चळवळीतील अनेकांचा वैचारिक गोंधळ होतो, त्यांच्यामताप्रमाणे शेतकरी हा वर्ग आहे, त्यामुळे त्यांचा प्रश्न हा वर्गीय प्रश्न आहे. जातीचा आणि त्याचा काहीच संबंध नाही. मराठा, पाटीदार, गुज्जर या समूहांच्या आंदोलनांना जातीचे आंदोलन म्हणून सिमित करण्यात आले. या आंदोलनातील काही लोकांची भूमिका सुद्धा तशीच होती. यामुळे मुलभूत प्रश्नांवर त्यांना काहीच करता आले नाही.
समकालीन शेतकरी राजकारण हे लोकांचे राजकारण न राहता सत्तेचे राजकारण झाल्यामुळे शेतकरी सरकारवर दबावगट म्हणून प्रभाव करू शकत नाही. शेतकरी चळवळ ही विचार म्हणून आज अस्तित्वात असलेली दिसत नाही. देश पातळीवर शेतकरी चळवळीच्या अभावामुळे शेती प्रश्न, शेतकरी समस्या आणि उपाय यावर गंभीर विचारमंथन आणि चर्चा होतांना दिसत नाही. शेतकरी संघटना बहुतेक सरकार आणि विरोधी पक्षांच्या दावणीला आहेत. वैचारिक स्पष्टता आणि कणखर भूमिका नाही. नुसता कर्जमाफीने हा प्रश्न सुटणार नाहीये तर एकुणच विकासाच्या व्याख्येला आणि प्रक्रियेला प्रश्नांकित करायची गरज आहे. विकास, प्रगती या प्रश्नांना प्रश्नांकित करायची वैचारिक आणि राजकीय हिंमत नसेल तर सत्तेसाठी या पक्षातून त्या पक्षात उडी मारणारा तथाकथित शेतकरी नेता आणि शेतकऱ्यांचा प्रतिनिधी म्हणून गेलेला, परंतू सध्या सरकारी दलाल म्हणून भूमिका निभावणारा तथाकथित शेतकरी नेता सगळ्या शेतकरी आंदोलनाला मूठमाती देण्याचे कामही करू शकतो. यापुढे शेतकरी चळवळीने राजकीय दृष्ट्या ( विशेषत: निवडणुकींच्या वेळी) सजग राहिले पाहिजे आणि शेती प्रश्नाची फक्त आर्थिकच नाहीतर सांस्कृतिक, सामाजिक बाजूसुद्धा गांभीर्याने मांडली पाहिजे.
सरकारच्या धोरणांच्या पातळीवरच नव्हे तर चळवळींच्या पातळीवर आणि अभ्यासाच्या पातळीवर सुद्धा कृषी आणि शेतकरी याची चर्चा दिसेनासी झालेली आहे. कृषी समाजशास्त्र, शेतकरी चळवळीचा इतिहास, कृषी संस्कृति आणि मानवी श्रम प्रतिष्ठा, शेतकरी मुली-मुलांचे लग्नाचे प्रश्न, शेतकरी आत्महत्या आणि त्याची मानसिकता, बदलत्या वातावरण बदलाचा शेतीवर होणारा परिणाम, रासायनिक खतांनी नापिक केलेल्या जमिनी अशा अनेक विषयांवर चळवळींना, अभ्यासकांना काम आणि अभ्यास करण्यास खूप वाव आहे परंतू याकडे होणीही लक्ष देत नाही, कारण औद्योगिक अर्थशास्त्र या नवीन ब्राह्मणांच्या दृष्टीने कृषी अर्थशास्त्र हे अस्पृश आहे. त्याला स्पर्श करायचा नाही, त्याला जवळ घ्यायचे नाही, त्याची चर्चा करायची नाही आणि त्याची दखल सुद्धा घ्यायची नाही. अशी नवीन जातीव्यवस्था या निमित्ताने जन्माला आली आहे. जातीअंत चळवळीला या नवीन जातिव्यवस्थेविरुद्ध सुद्धा भूमिका घ्यावी लागेल.
समकालीन शेतीचे प्रश्न सोडवायचे असतील आणि त्यासाठी मोठी लढाई (संपाच्या नंतर) उभी करायची असेल तर शेतकरी चळवळीला आपला स्वतःचा इतिहास समजून घेतला पाहिजे आणि शेतकरी विरोधी सरकारला सुद्धा समजवून सांगायला हवे. ह्याच महाराष्ट्रात १८७५-७६ मध्ये मोठा शेतकरी उठाव झाला होता. शेतकऱ्यांनी मारवाडी, ब्राह्मण सावकारांना सळो कि पळो करून सोडले होते. सावकारांची उभे घरे झाळून टाकली होती.कर्ज खाते आणि हिशोबाच्या वह्या जाळणे हा या बंडाचा मुख्य उद्देश होता. अनेकांनी तर सावकारांवर सशस्त्र हल्ला केला होता यालाच नाककापीचे बंड सुद्धा म्हणतात. ओतूर-जुन्नर या भागात महात्मा फुलेंनी शेतकऱ्यांची चळवळ उभी करून ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ शेटजी, भटजी आणि लाटजींच्या विरोधात कडाडत सोडला होता. महात्मा फुलेंचा हाच वारसा पुढे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी ‘चरीचा संप’ उभारून चालू ठेवला. स्वतंत्र मजूर पक्षाच्या वतीने डॉ. आंबेडकरांनी खोतशाही, जमीनदारशाही, सावकारशाही नष्ट करण्यासाठी शेतकऱ्यांची मोठी चळवळ उभी केली होती. फुले- आंबेडकरांचा हाच शेतकरी हिताचा वारसा पुढे शेतकरी कामगार पक्ष, किसान कामगार पक्ष, शेतकरी संघटना यांनी काही काळ पुढे चालवला होता परंतू बदलणाऱ्या परिस्थितीला कसे समजून घ्यायचे? आणि काय भूमिका घ्यायची या संदर्भात शेतकरी चळवळीत काही गंभीर चुका सुद्धा झाल्या. झालेल्या चुका दुरुस्त करत पुन्हा एकदा आपला ऐतिहासिक, वैचारिक वारसा पुन्हा सांगत नव्याने उभे राहायचे आहे किंबहुना उभे राहिल्याशिवाय पर्यायच नाही.

# युवा भारत महाराष्ट्र समितीकडून शेतकरी संपाला पाठींबा देत, एकूण प्रश्नाची चर्चा करणारे पत्रक जारी करण्यात येत आहे.
(७-६-२०१७)
महाराष्ट्र राज्य समिती –
विनोद भुजबळ-९५०३४८६०३३ (अहमदनगर),

सुरेश सोमकुंवर-९४२८२२१८२९ (नागपूर),
रोहित बागुल-९४०५१९६५४३ (धुळे),

भूषण पवार-७०२०४९५७४४ (सोलापूर)

अधिक संपर्क-
शशी सोनवणे-८७९३६०६८३५,

दयानंद कनकदंडे- ९६३७९०१२०४,

वनराज शिंदे- ९९२१४९४६९६
इमेल- bharatyuva@gmail.com,
ब्लॉग – http://www.yuvabharat.wordpress.com

 

युवा भारत का आठवां अखिल भारतीय प्रतिनीधी सम्मेलन

 

२१,२२,२३ मार्च २०१७

स्थल;- भारतीय लोकसेवक मंडल,हरी हर नाथ शास्त्री स्मारक भवन,खलासी लाईन,कानपूर (उत्तर प्रदेश)

साथियों,

युवाओ का अखिल भारतीय संगठन युवा भारत अपना ८वा अखिल भारतीय सम्मेलन कानपूर (उत्तर प्रदेश) में २१-२३ मार्च के दौरान करने जा रहा है..

“टेम्पल ऑफ़ डेवलपमेंट से मेक इन इंडिया तक; भारत कहाँ “ यह विषय इस बार चर्चा के केंद्र में होगा. भाक्रा-नंगल बांध परियोजना का उद्घाटन करते वक्त प्रधानमंत्री नेहरू ने बी बांधो को आधुनिक भारत के मंदिर कहा था. आज के समय मोदी मेक इन इंडिया,न्यू इंडिया जैसे नारों को उछाल रहे है. नेहरू से मोदी तक नीतियों के परिणामस्वरूप देश की जनता पर हुए सामाजिक,सांस्कृतिक,पर्यावरनीय परिणामो  की चर्चा,भूमी,उद्योग्य,खेती,शिक्षा एवं रोजगार की नीतीया तथा देश और दुनिया में हो रहे वैकल्पिक संघर्षो पर सम्मेलन में बात  की जायेगी ..

युवा भारत संघठन का ८ वा अखिल भारतीय सम्मेलन कानपूर शहर में हो रहा है. युवा भारत साम्राज्यवाद विरोधी युवाओ का संघठन है एवं इसने अपनी स्थापना के समय से लेकर आज तक अपनी सीमित क्षमता के बावजूद साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में अपनी भूमिका निभायी है. वह महाराष्ट्र,झारखण्ड,प.बंगाल से लेकर यूपी,हरियाणा एवं दिल्ली में मेहनतकश वर्ग-जातियों के संघर्षो के साथ खड़ा रहते आया है.

 

सेवाग्राम,वर्धा(महाराष्ट्र) में संपन्न ६ वे सम्मेलन में हम लोगोने नवउदारवादी नीतियों के २५ साल एवं युवा भारत के हस्तक्षेप के १२ साल की चर्चा की थी.उस समय के पहले एवं तब भी हम लोग प.बंगाल के सिंगुर-नदीग्राम,उलुबेडिया,महाराष्ट्र में डाउ,महामुबई सेझ,उत्तन भाईंदर की लढाई में,चंद्रपुर में अदानी कोयला खदान विरोधी संघर्ष में  कही अहम तो कही सहभागीता की भूमिका थे.हम लोगोने उन जगहों पर लढाई में सहभागीता की है एवं हरसंभव स्थिती में संघर्ष को सफलता का पहुचाने का संघर्ष किया है.

वर्धा सम्मेलन के एक प्रस्ताव में ही हम लोगोने इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के सन्दर्भ,नयी हरित क्रांती तथा नदी जोड़ परियोजना संबंधी प्रस्ताव के विरोध में,शिक्षा नीतियों में बदलाव के विरोध में लढने की बात की थी.मोदीजीने मेक इन इंडिया का नारा दिया है.पीछले सम्मेलन में हमने भारत बनने की प्रक्रिया में भाषाई एवं वांशिक राष्ट्रीयताओ का क्या भविष्य होगा यह सवाल उठाया. अब जब आनेवाले २०२२ तक उत्तर प्रदेश चुनाव में जित हासिल करने के बाद उन्होंने आजादी की ७५ वी वर्षगांठ पर नए भारत को बनाने की बात की है उस सन्दर्भ में हमे आज नेहरू के आधुनिक भारत,राजीव गांधी के डिजिटल भारत,इंदिराजी के गरीबी हटाव,वाजपेयी का इण्डिया शायनिंग,मनमोहन का भारत उदय अब मोदी का मेक इन इण्डिया एवं न्यू इंडिया यह जो सारे जुमले है वह पूंजीवादी विकास बढ़ावा देते वक्त ही उस पूंजीवादी विकास की प्रकिया से हाशिये पर धकेली जा रही आबादी को पूंजीवाद के समर्थन में खड़े करने के नारे रहे है. इससे पूंजीवाद की अर्थनीती को बढ़ावा देनेवाले दल ने ही सत्ता संभाली है. नीतीश जी का नारा है सामाजिक न्याय के साथ पूंजीवाद .केजरीवाल का नारा है क्रोनी पूंजीवाद नहीं चाहिए.अखिलेश का समाजवाद पूंजीवाद के अलग अलग वर्जन है.१९४७ से लेकर २०१७ तक के वर्षो में एक जुमले के बाद दूसरा नया जूमला लाया गया.पूंजीवादी विकास प्रकिया से इत्तर दृष्टिकोण के आधार पर नहीं सोचा गया. एक उत्तर सत्य के बाद दूसरा उत्तर सत्य हमारे सामने ला खड़ा किया गया.हम भी सत्ता द्वारा गढे जा रहे उत्तर सत्य की प्रतिक्रिया में ही अपना विमर्श चलाते रहे है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ जी विराजमान किये गए है.छवि हिंदुत्व के नायक की है,विकास का रथ तेजी से दौड़ाने प्रतिबध्दता है एवं सबका साथ सबका विकास नारा है. नेहरू,राजीवजी,मनमोहनजी छवि हिंदुत्व की नहीं तो सेकुलर है,विकास का रथ तेजी से दौड़ाने की प्रतिबद्धता रहि एवं नारा भारत उदय,डिजिटल इंडिया,गरीबी हटाव का रहा.सबका साथ सबका विकास का दावा उधर भी था लेकिन हम हिंदुत्व या सेकुलर वाली छवियो की बहस में उलझे रहे.एवं छवियो के आभासी युद्ध में एक दुसरे को स्थापित करते रहे एवं वह सब विकास का रथ जमीन बेरहमी से दौडाते रहे. यह रथ जब दौड़ रहा था.तो उसने दो विभिन समूहों के भीतर दंगे की राजनीती भी की.राष्ट्रीयताओ के संघर्ष का दमन भी किया,भाषाई एवं वांशिक राष्ट्रीयताओ के संघर्षो को धर्म के आधार पर में तब्दील कर उनके दमन की राजनीती भी सभी सताधारी वर्ग-जातियों ने किया.इसलिए हमें यह जो सत्तर साल के विकास का विमर्श है एवं २०२२ तक न्यू इंडिया बनाने की बात हो रही है उसका जायजा लेते हुए आम मेहनतकश के जीवन में बुनियादी तब्दीली लाने के विकास के वैकल्पिक विमर्श का मोडल क्या हो इसकी बात हमें करनी होगी.आज मोदी को हराएगा कौन वाली डिबेट में राहुल हराएंगे या केजरीवाल या नीतीश   वाली चर्चा है जबकि हमको यह बहस नीतियों के स्तर चलानी होगी. युवा का ८ वा अखिल भारतीय सम्मेलन दिशा किया जा रहा एक प्रयास है..

१९५४ में भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरूजी ने भाक्रा-नांगल बांध परियोजना का उद्घाटन करते समय कहा की “यह आधुनिक भारत के मंदिर है! नेहरू जी की नेतृत्व में बनी सरकारने आधुनिक भारत की नींव रखते हुए कई सारी बड़ी परियोजनाए स्थापित की जो देश के कृषि,औद्योगिक विकास के नए मापदंड बने.इन्ही बड़ी परियोजनाओ आधुनिक भारत के विकास के नए मंदिर के रूप में प्रस्तुत किया गया.इन्ही मंदिरों ने पिछले ६८ वर्षो में देश के भीतर पूंजीवादी विकास को आगे बढाया.इन्ही मंदिरों के आधार पर हरित क्रांति की उद्घोषणा  हुयी. गरीबी हटाव के नारे लगे.इन्ही मंदिरो के आश्रय से १९९० के दशक से चल रही नव उदारवादी नीतिया फली फूली जिसने इण्डिया शायनिंग,भारत उदय  से लेकर मेक इन इण्डिया जैसे जुमले एवं अब २०२२ में आजादी की ७५ वी वर्षगांठ तक न्यू इण्डिया बनाने की बाते हो रही है .टेम्पल ऑफ़ डेवलपमेंट की चमक धमक में इंडिया आगे बढ़ते जरूर नजर आ जायेगा लेकिन आम मेहनतकश का भारत इन मंदिरों के बाहर खड़ा कर दिया गया है और दबाया भी गया है.उस आम मेहनतकश की तकलीफ,उसके भारत के सपनो की खोज क्या टेम्पल ऑफ़ डेवलपमेंट में पुरी हो पाई है ? गरीबी हटाव का नारा इंदिराजी का गरीब कल्याण की मोदीजी की.. वही जुमले नयी परिस्थिती में क्यों उभर कर आ रहे है?? इसपर एवं विकास का जो प्रारूप इस देश में अपनाया जा रहा है उसपर हमें सोचना चाहिए.अंगरेजी हुकूमत द्वारा लाये गए एवं बाद विश्व के धरातल पर बने साम्राज्यवादी विकास के प्रारूप का क्या कोई विकल्प नहीं होगा..? वह होगा तो क्या होगा ..? इसपर बातचीत की जानी चाहिए..

 

पूंजीवादी विकास की अवधारणा के खिलाफ मार्क्सवादी,गांधीवादी,आम्बेडकरवादी,समाजवादी खेमे की तरफ से वैचारिक धरातल पर एवं संघर्ष के धरातल पर भी जो हस्तक्षेप किये गए उसने विकल्प के सन्दर्भ में नए विमर्श आगे बढाया है.साथ ही बड़ी बांध परियोजनाओ के खिलाफ सबसे बड़ा संघर्ष १९२७ में पुणे के पास हुआ.१९६० के दशक से दामोदर नदी परियोजना,उड़ीसा के हीराकुंड उत्तराखंड में टिहरी से लेकर नर्मदा बांध परियोजना तक लगभग सभी बड़ी परियोजनाओ के खिलाफ संघर्ष जारी है .यह संघर्ष पर्यावरण पर होनेवाले विपरीत संघर्ष,प्राकृतिक संसाधनों की लूट एवं विस्थापितों के अधिकार की बहस जारी रखे हुए है. चारू मुजूमदार के नेतृत्व में नक्सलबारी,विनोबाजी की नेतृत्व में भूदान आन्दोलन,७० के दशक का जेपी के नेतृत्व में छात्र-युवा आन्दोलन,महाराष्ट्र का दलित पंथर,बाद में उभरा मंडल आन्दोलन  आदि नेहरू जी के टेम्पल ऑफ़ डेवलपमेंट की नीती से प्रभावित जनमानस के आन्दोलन थे.देशभर में आज की तारिक में हो रहे किसान जातियों के आंदोलन २५ साल की वैश्वीकरण की नीतियों की प्रतिक्रिया में जिसे पी.वी.-मनमोहन ने शुरू किया एवं अब इसे मोदीजी आगे ले जा रहे है. मुंबई से लेकर दिल्ली तक बनाये जानेवाले कोर्रीडार के कारन जो बड़ी आबादी प्रभावित होगी उसके संघर्षो के साथ जुड़कर सेज की नीती के विरोध में हमारे द्वारा किये गए संघर्ष एवं उन संघर्षो से निकले विमर्श को आगे बढ़ाना है..

युवा भारत अखिल भारतीय समिती

नोटबंदी किसके पक्ष में …??

 

८  नवम्बर कि रात भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ५०० और १००० के नोटों कि वैधता ख़त्म होने का ऐलान किया.

“ मै धारक को५०० रु.अदा करने का वचन देता हु.. यह नोट पर लिखा हुआ था. यह वचन हमें  रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर के हस्ताक्षर से मिलता है.. और इस वचन को ८ नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने तोड़ दिया. क्या यह सही था..? यह पहला सवाल है..”

मोदीने जो वादे हमसे.. भारतीय जनता से… चुनाव के प्रचार के दौरान और प्रधानमंत्री होने के बाद भी किए थे  उनकी वैधता क्या है..? .साथ ही साथ  रिजर्व बैंक के अधिकारों में हस्तक्षेप करके कि गयी नोटबंदी के वक्त भी..जो घोषनाए प्रधानमंत्री ने की उसके बाद ५०-६० बार नोटबदली के सबंध में में जो परिवर्तन किए उससे यह शक और भी गहरा गया है. जनता ने तकलीफ सहते हुए जितने पैसे बैंक में जमा करवाए है उतना तो लौटाना था.. उतने पैसे बैंको द्वारा  हमें नई करेंसी में लौटाने चाहिए थे लेकिन पैसे निकालने पर मोदी के आदेशो से पाबंदी लगाई जा चुकी है… ८ नवम्बर को मोदीद्वारा   कैशलेस कि बात नहीं कही गयी  थी.अपने संबोधन में काला धन लाने कि बात कि थी.. जाली नोट पर प्रतिबन्ध और आतंकवाद से लढाई कि बात कि थी. माल्या जैसे लोग लोन को डुबाकर कैसे भाग गए है या भगाए गए है. वैसे तो इसपर ज्यादा बताने कि जरूरत नहीं है .. बैंक पैसो कि कमी से जूझ रहे है. रोजाना १ लाख ४० हजार करोड़ की कमी है. पिछले सालो में बैंकों का मुनाफा घटते ही जा रहा है. मुनाफा तो औद्योगिक घरानों को हो रहा है.यह इसलिए हो रहा है की हरसाल एनपीए में बढोतरी हो रही है.इन बट्टा खातो में डाले गए कर्जे को वसूलने की कोई कारगर नीती सरकार के पास नहीं है. १९९१ के बाद से ही पिछले २५ सालो में बैंक सुधार के नाम पर बैंकों के राष्ट्रिय स्वामित्व को बदलकर उसे नीजी बनाने की कोशिश जारी है.मौजूदा सरकार ने बड़े औद्योगिक घरानों के एनपीए माफ़ कर दिए है उसी तरह पूर्व की यूपीए सरकार ने भी किए थे.बैंकों की अधिकतम पूंजी नीजी हाथो में चली गयी है जिससे बैंक दिवालियापन की कगार पर खड़े है. नोटबंदी के बाद आम जनता द्वारा बैंकों में जमा हो रही राशि से बैंक आज तो दिवालिया होने से बाख गए है लेकिन मौजूदा नीतिया ही चलती रही तो संकट के अधिक गहरे होते जाने की आशंका है.अमरिका में जो सब प्राइम संकट आया था वह भी रियल इस्टेट के क्षेत्र की मंदी को दूर करने के लिए मकानों पर कर्जे के लिए उन्डेले गए बैंक के पैसे के कारन पैदा हुआ था. पैसे निकालने पर लादी गयी सीमा बैंको की तरलता को बनाये रखने का ही इंतजाम है. बैंकों को बचाने के लिए भारत की अपारम्परिक अर्थव्यवस्था में लगे  ४० प्रतिशत से ज्यादा धन को खींच लिया गया है इसका व्यापक असर रोजगार पर पड़ेगा.नोटबंदी के असंगठित क्षेत्र के रोजगार ख़त्म होने की खबरे भी आ रही है.मुंबई,कोलकत्ता,दिल्ली,कानपूर आदि महानगरो से लोग अपने गाँवो की तरफ लौट रहे है.महाराष्ट्र का भिवंडी,गुजरात का सूरत कपड़ा,हिरा,सराफा उद्योग संकट में आ चूका है.अनाज मंडियों में भी ख़राब हो रहा है एवं खेतो में भी. किसान अपनी फसलो को नकदी की कमी के कारन नहीं काट पा रहे है. महिलाओ की जमापूंजी जिसे उन्होंने अपने बुरे वक़्त के लिए बचा रखा था  छीन लिया है.जिस देश में जीवन रक्षा की योजनाए न हो और जो थी उसे भी आर्थिक सुधारो के नाम पर कम कर दिया है ऐसे समय में महिलाओ की जमापूंजी को छिना जाना एक पुरुषसत्ताक समाज में अतिभयावह है.नोटबंदी के निर्णय ने एक झटके में लोगो के पैसे को वितीय पूंजी का हिस्सा बना दिया है. वित्त पूंजी एवं वितीय पूंजी के साम्राज्यवाद को समझने के लिए लेनिन को पढ़ा जा सकता है.

काला धन अब तक नहीं आया है.. बैंक में  जो पैसा जमा किया गया है, जनधन योजना के बाद भी और नोटबंदी  के बाद भी  वह आम जनता का है. किसान का,मजदुर का,छोटे दुकानदारो का,फेरीवालो का है.. विजय माल्या,अम्बानी,अदानी या टाटा या बिड़ला का नहीं है. जनधन योजना के बाद हो या नोटबंदी के बाद भी जिनका कर्जा राइट ऑफ किया गया है अथवा माफ़ कर  दिया गया है उनमें जरूर माल्या,अम्बानी,अदानी वगैरह के नाम है..साथ ही इन्ही बड़े औद्योगिक घरानों को बड़े बड़े कर्जे भी दिए गए है.                                                    यह दावा कि यह काले  पैसे को रोकेगा और यह नीति  काले पैसे को निकलवाने के लिए बनाई गयी है , बेबुनियाद है . वह इसलिए कि : सरकारी अनुमानों  के  ही अनुसार कुल काले पैसे  का  मात्र  ६%, मुद्रा नोट,  के रूप में रखा जाता है .बाकी  सभी पैसा  आभूषण, भवन निर्माण और अन्य व्यवसायी कार्यों में लगा रहता है .  काला पैसा कोइ  स्थिर चीज़ नही  है. जो बण्डल के रूप में पड़ा रहता  है  और जिसे हम एक छापा मारकर प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वह लगातर  प्रवाह में है ,व्यवसाय में प्रयोग हो रहा है . इसलिए  यदि नोट बंदी भी की जाती है  तो भी काला पैसा बाहर नहीं आएगा क्योंकि यह पैसा नोट  के रूप में नहीं है  और कर अधिकारियों का इंतज़ार नहीं कर रह है .इसलिए नोट बंदी या बैंक लौकेरों  पर छापे  से काला पैसा खतम नहीं होगा.  हाँ वह कुछ मात्रा  में मिल सकता है.

अर्थशास्त्री कौशिक बसु का कहना है, ”भारत में गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) अर्थव्यवस्था के लिए ठीक था, लेकिन विमुद्रीकरण (नोटों का रद्द किया जाना) ठीक नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था काफ़ी जटिल है और इससे फायदे के मुक़ाबले व्यापक नुक़सान उठाना पड़ेगा।” प्रोफ़ेसर बसु पूर्व यूपीए सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। अभी न्यूयॉर्क कोर्नेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। उनका कहना है कि एक बार में सब कुछ करने के बावजूद ब्लैक मनी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अब इसकी मौज़ूदगी संभव नहीं है। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस कदम का सीमित असर होगा। लोग नई करेंसी के आते ही तत्काल ब्लैक मनी ज़मा करना शुरू कर देंगे। इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ सैकड़ों हज़ारों आम लोगों को पास नकदी है लेकिन यहां से ब्लैक मनी बाहर नहीं आएगी। इन्हें प्रताड़ित होने का डर है। इन्हें लगता है कि वे सामने आएंगे तो इन्हें फंसा दिया जाएगा।

 

अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का कहना है कि सरकार के इस कदम से साफ है कि उन्हें पूंजीवाद की समझ नहीं है। उनका कहना है, ”आम तौर पर इस स्थिति में पूंजावादी व्यवस्था में नए बिज़नेस की ओपनिंग होती है ताकि पुरानी करेंसी को नई करेंसी में तब्दील किया जा सके। इस हालत में लोग सामने आकर प्रस्ताव देंगे कि आप मुझे 1000 का नोट दीजिए और आपको इसके बदले 800 या 700 रुपये दिए जाएंगे। इसके परिणामस्वरूप ब्लैक मनी पर काबू पाने के बजाय काले धंधों का प्रसार बढ़ता है।’

भारत के बजटों में कांग्रेस और अब भाजपा दोनों ने ही भागीदारी नोट्स ( PARTICIPATORY NOTES   PN या  पी एन  ) नामक योजना के तहत काले धन को बाहर से देश में लाने  के लिए  इस  योजना को लाया गया था इसके तहत, भारत में पैसा लगाने  वाले विदेशी  निवेश   संस्थाएं उन विदेशियों जो बिना अपना नाम और परिचय जाहिर कर , भारत में निवेश करना चाहती  हैं,  इन संस्थानों को यह अधिकार दिया गया है  की, वे ऐसे निवेशकों को पी एन  जारी कर सकते हैं  और इनको  भारत के  पूंजी बाजार में निवेषित किया जा सकता है. एक समय में तो भारत में शेयर बाजारों में लगे पैसे का आधा पी एन के द्वारा ही लगा हुआ था अब यह घटकर  १०% हों गया है. ये निवेशक गुमनाम हैं इनके  बारे  में जानकारी न करने की कानूनी बाध्यता है. ये देश में काले  पैसे का  बड़ा स्त्रोत है. ये पैसा भारत से बाहर गया हुआ है जिसके  मालिक भारत के अधिकारी  वर्ग, राजनेत और व्यवसायी हैं. इसी प्रकिया  से भारत में निवैश्  करने के बहुत सुगम रास्ता मॉरिशस  के साथ दोहरा कराधन  सन्धि है  इसके  तहत मॉरीशस में कंपनी खोलकर आप  भारत में निवेश कर सकते हैं और इस कंपनी को भारत  में कर नहीं देना होगा,. गत बजट में सरकार ने इनके लाभ पर पूंजी सवर्धन कर लगाया है  ; इसके बावजूद  संधि ऐसी है जिससे कर से बचा जा सकता है  और इसमें भे इतनी परतें हैं कौन  असली मालिक है मालुम भी नहीं पडता है. यह भी काले पैसे को देश में पैसे लाने  का एक अच्छा साधन है.

अपने दिमाग को गिरवी रख इक मसीहा को समाज के भले का ठेका देनेवाले लोगो कि हमारे यंहा कमी नहीं है .. वह मोदी के उदय के बाद ज्यादा बढ़ गयी है..वह भी इसलिए हुआ है कि पिछले ७० सालो से . आजादी के बाद भी.. (वह आजादी थी या नहीं थी इन बहसों से के बावजूद भी.) मेहनतकश आबादी समय समय पर जो अपनी समस्याओ से परेशान थी .उन परेशानीयों के  बरक्स उसने मोदी जैसे मसीहा को सत्तासीन किया है .बीच बीच में वह ऐसेही मसीहाओ के शोध में रही है. जिस प्रकिया से  लालू,मायावती,केजरीवाल भी उभरे है… सांप्रदायिक हो या सेकुलर अथवा सामाजिक न्यायवादी सभी नयी आर्थिक नीतियों के ही समर्थक रहे है.यह इसलिए हुआ है कि हम अपनी उन्नती का ठेका किसी दुसरे को दे रहे होते है. काँग्रेस कि भ्रष्ट नीतियों से भुक्तभोगी  जनता ने भ्रष्ट नीतियों से मुक्त बीजेपी को जिसके राष्ट्रिय अध्यक्ष को हम लोगोने रिश्वत लेते कैमरे पर देखा है उसको सत्तासीन किया है. यूपीए से पहले सत्तासीन सरकार ने सत्ता में रहते वक्त १००० का नोट जारी किया था.जिसे मोदी ने वापस लिया है.कांग्रेस का विरोध करते वक़्त वह यह भूल जाते है  की १००० का नोट वाजपेयी सरकार ने जारी किया था.

 

हम सबमें एक बड़ा वर्ग है जो मान चुका है कि मोदीजी अच्छा कर रहे हैं,कालेधन पर छापा मार रहे हैं,कालाधन सरकार के पास आएगा तो सरकार सड़क बनाएगी ,स्कूल खोलेगी,कारखाने खोलेगी,बैंकों से घरों के लिए सस्ता कर्ज मिलेगा,महंगाई कम हो जाएगी,हर चीज सस्ती होगी,सब ईमानदार हो जाएंगे,चारों ओर ईमानदारी का ही माहौल होगा,इत्यादि बातों को आम जनता के बहुत बड़े हिस्से के दिलो-दिमाग में बैठा दिया गया है,अब जनता इंतजार कर रही है कि कालेधन की मुहिम पचास दिन पूरे कर ले,फिर हम सब ईमानदारी के समुद्र में तैरेंगे ! ये सारी बातें फार्मूला फिल्म की तरह आम जनता के बीच में संप्रेषित करके उनको मोदी-अफीम के नशे में डुबो दिया गया है। जैसे चुनाव के वक़्त का माहौल था. नरेन्द्र मोदी के गुजरात विकास कि कहानिया कैसे जनता के बीच फैलाई गयी.उन्हें कैसे औद्योगिक घरानोने प्रायोजित किया  इसकी पड़ताल हम सबको करनी चाहिए.. २०१४ के चुनाव के वक़्त  जब मोदी गुजरात के विकास मॉडल कि बात कर रहे थे तब हमें उस विकास के दावो के बारे में सवाल उठाना चाहीए था… उस विकास में किसान,मजदूर कि समस्याए एवं रोजगार कितना बढ़ा है यह पुछना था लेकिन हम में से ज्यादातर लोग २००२ के गुजरात दंगे पर अड़ गए थे..दंगो के लिए तो मोदी को माफ़ किया ही नहीं जा सकता था लेकिन विमर्श को सिर्फ सेकुलर – नॉन-सेकुलर के खांचे तक ही सीमित रखना एक भारी भूल थी.साम्प्रदायिकता के अजेंडे को बीजेपी तक सीमित रखना सत्ताधारी वर्ग के चरित्र को कम करके आंकने जैसा है.२००२ का वह दंगा तो उसने उस विकास की खोखली हकीक़त को छुपाने के लिए ही किया था.साथ ही दंगा कराना उसका मुख्य अजेंडा भी है. पूंजीवाद की सेवा करना एवं पूंजीवादी विकास से उभरनेवाले अंतरविरोधो को दबाने के लिए मुस्लिम विरोध की राजनीती करना उसका मुख्य धंदा है. हिंदुत्व एवं पूंजीवाद दोनों के आईकॉन मोदी इसलिए तो बने है. गुजरात के कथित विकास के खोखलेपण को पाटीदार ओर उंना आन्दोलन ने सामने ला दिया है.गुजरात विकास का बबल टूट गया है..

मोदी का अबतक बीता कार्यकाल वितीय पूंजी की सेवा का कार्यकाल है.जनधन योजना से आए पैसे को अदानी को कर्जे के रूप में दिया गया .नोटबंदी के बाद ७३ कंपनीयो का कर्जा माफ़ कर दिया गया है.मेहनतकश जनता की पूंजी को छिनकर उसे औद्योगिक घरानों की सेवा में लगाने के लिए ही नोटबंदी का निर्णय लिया गया है . यह निर्णय करते वक़्त आरबीआई,संसद,मंत्रींमंडल,संविधान को ताक पर रखकर यह निर्णय किया है.यह कदम तानाशाही भी है एवं फासिस्ट भी इसे जनता के बीच प्रचारित करने की जरूरत है.जिस देश में इन्टरनेट अब भी अधिकतम आबादी की पहुँच से बाहर है.बिजली भी ठीक से गाँवो तक नहीं पहुँची है ऐसे हालात देश को जबरदस्ती कैशलेस अर्थव्यवस्था में  क्यों धकेला जा रहा है यह सवाल भी इस बीच महत्वपूर्ण है..बैंकों  से पैसे निकालने पर राशनिंग  और जबरदस्ती डिजिटल भुगतान करने के लिए  डाला जा रहा दबाव भारतीय जनता के हित में है की वितीय पूंजी के विस्तार के हित में…? इस सवाल पर चर्चा होनी चाहिए.नोटबंदी हो या कैशलेस का नारा सब देशप्रेम की चाशनी में दिए जा रहे है एवं सवाल उठाने वालो को देशद्रोही करार दिया जा रहा है, इस फासिस्ट स्तिथि को समझकर हम सबको हमलावर होने की जरूरत है. अंबानी ने जिओ सिम को जारी किया है.कुछ दिनों बाद वह जिओ मनी भी जारी करनेवाले है.मोदीजी जिओ को डिजिटल इंडिया की यात्रा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में चिन्हित कर चुके है. जिओ सिम ,जिओ मणी,डिजिटल भुगतान जिओ के साथ साथ मोदी पेटीएम के विज्ञापन में भी दिखे है.  पेटीएम ई वालेट कम्पनी है.इस कम्पनी में ४० प्रतिशत पैसा चायना की अलीबाबा का है,जो लोग चीनी मालो का पटाखे,झालर बेचने वालो का विरोध कर रहे थे वही पेटीएम करने को कह रहे है. मोदीभक्तो को भी इस पर विचार करना चाहिए.  जीडीपी में जो गिरावट आयी है उसकी चर्चा मनमोहन सिंग को करने दीजिए.वह जीडीपी बढ़ाने के उपाय मोदी को बताएँगे.मोदी उन्हीके उत्तराधिकारी है.मतभेद काम करने के तरीके को लेकर है बाकि नीतियों पर तो सहमती है ही..!! जीडीपी और रोजगार के सृजन का तर्क नवउदारवाद के युग बेमानी हो गया है. पिछले २५ सालो में जीडीपी बढ़ाने के नाम पर जो नीतिया इस देश में लाई गयी उसने कितने पारंपरिक रोजगारो को ख़त्म किया है? कितने जंगलो का दोहन किया है? नदियो पर बांध बनाने,अलग अलग इंडस्ट्रीयल झोन बनाने के नाम पर कितने आदीवासीयो को उजाड़ा है? किस तरह खेती को चौपट किया है ?  इसपर बात होनी चाहिए.ग्रॉस डिस्ट्रक्शन की बात होनी चाहिए.मोदी की घोषणा मेक इन इण्डिया की है जिसमे मुम्बई-दील्ली,अमृतसर से कोलकाता जैसे ६ इंडस्ट्रीयल कोर्रीडोर बनाने है.इन कॉरिडोरो का बनाने के लिए लाखो एकड़ जमीन कब्जाई जायेगी.नदी जोड़ परियोजना से नदी जोड़कर पानी पर कब्ज़ा किया जाएगा एवं जीडीपी बढ़ाने के नारे के साथ हमारे पैसो को निवेशित किया जाएगा.यह भी देशभक्ती के नाम पर होगा .नोटबंदी की मार झेलने के बाद अगली बारी इस विकास के कथित जनांदोलन को झेलने की होगी. नोटबंदी हो या मेक इन इंडिया दोनों भी मेहनतकश जनता पर लादे गए युद्ध है.

मोदीने  हमें काला धन  आने के बाद हिस्सा देने कि बात कि है.. जो राष्ट्र कि संपती है उसमे नहीं..  राहुल गांधी ने तो एक सभा में १ प्रतिशत लोगो के पास संपती होने कि बात कही है.और वह संपती पिछले ढाई साल में जमा हो जाने कि बात कही है. .राहुल गांधी की आधी बात सच है पुरी नहीं. यह संपती १ प्रतिशत लोगो के पास किनकी नीतियों की वजह से चली गयी इसपर तो वह कुछ नहीं बोलते.क्या संपती का मतलब काला धन है.. ?? थोड़े ही है.. संपती ओर काला धन एक नहीं है.. मेरी समज में तो नहीं है   .उन्होंने गलती से काले धन कि जगह संपती कह कह दिया होगा. अगर संपती के बटवारे कि बात करते है तो स्वागत है.लेकिन यह बटवारा करना उनके बस की बात नहीं है.कॉर्पोरेट से चंदा लेकर राजनीती करनेवाले लोग एक सीमा तक मालिको का विरोध कर सकते है.वह करना उनकी मजबूरी भी है.हर ५ साल बाद जनता में जाना जो होता है !  काला धन,भ्रष्टाचार तो पूंजीवाद कि अपनी समस्या है.वह उसका अंगभूत गुण भी है.लेकिन वही जब उसके विकास में बाधा बनता है तो वह उसके खिलाफ मोर्चा खोल देता है.. उस मोर्चे के अगुवा केजरीवाल हो या मोदी बन जाते है.. लेकिन हमें तो वह संपती जो मेहनतकश जनता के श्रम एवं ,नैसर्गिक संसाधनों का दोहन कर प्राप्त कि गयी है उसका हिसाब मांगना चाहिए..  प्रधान है शोषण से निर्मित संपती .. दुसरा सवाल है उस संपती के बटवारे में हुआ भ्रष्टाचार… अमरीका में आकुपाय वालस्ट्रीट वी आर ९९ कि घोषणा के साथ आन्दोलन. हुआ है.. हमको तो आकुपाय आल स्ट्रीट करना है.

जैसे ही नोट्बंदी का ऐलान हुआ है लोग लाइन में है.. वह लाईन अब भी ख़त्म नहीं हुयी है.३१ दिसंबर के बाद भी ख़त्म होने की संभावना नहीं है. ५० दिन के बाद के हालात हर मोर्चे ज्यादा गंभीर होंगे.लोग जो आक्रोशित नहीं दिख रहे है क्योंकि वे अपनी कमाई जमा करने के लिए कतारों में खड़े है. हमको ५० दिन बाद जो आक्रोश उपजेगा उसको संगठित करने की तैयारी में लगना होगा.आज 25 दिसंबर है. .. ख्रिसमस का महिना है..येशु दुखितो के लिए क्रूस पर चढ़ गए थे. ..इस स्वयंघोषित मसीहा ने तो १०० से ज्यादा लोगो को मृत्यूद्वार पहुंचा दिया है.. संसद में इनको दो मिनट का मौन भी नसीब नहीं हुआ.यह मसीहा न संसद के लिए जवाबदेह है  न किसी संवैधानिक संस्था के लिए जवाबदेही समझता है.. नोटबंदी के दौरान कम पैसे में शादिया करने की नसीयते दी जा रही है एवं बैंकों से पैसा निकालने के लिए तरह तरह की पाबंदिया लगाई जा रही है.. लेकिन इसी बीच रेड्डी के घर ५०० करोड़ की नीतीन गडकरी के घर ५० करोड़ की शादी संपन्न की गयी है. नैतिकता उठते-बैठते जाप करनेवालों का असली चेहरा है यह..!!

अमरीका २००८ के आर्थिक संकट से उभरी नहीं है. अमरीका हथियारों का बड़ा कारोबारी भी है.अमरीका में रोजगार का संकट अधिक गहराता जा रहा है.अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की जरूरत के बीच अमरीका में डोनाल्ड ट्रम्प नामक मोदी के अवतार सत्तासीन हो गए है. वे चायना को ललकार रहे है जैसे इधर मोदी पाकिस्तान को..! ट्रम्प ने भारतीय मजदूरो को भगाने की नीती पर भी काम करना शुरू कर दिया है.इस मायने में वह राज ठाकरे के बाप नजर आते है.अमरीका चीन को ललकार रहा है,युद्ध की स्तिथी में अमरीका के साथ भारत,चायना के साथ पाकिस्तान.हालात बहुत ख़राब होंगे.नोटबंदी के बाद या जैसा की मैंने कहा विकास का कथित जनांदोलन चलाने के बाद जो संभावित जनाक्रोश उभर सकता है उसको दबाने के लिए मोदी पाकिस्तान के साथ युद्ध की घोषणा कर भी सकते है. उधर नवाज शरीफ भी तैयार होंगे.नवाज शरीफ का नाम पनामा पेपर्स में आ चूका है. वंहा वे इस मुद्दे पर घेरे भी जा चुके है..कैशलेस से भ्रष्टाचार कम होगा कहनेवालो को पनामा पेपर्स प्रकरण को पढ़ना चाहिए.उन्हें युद्ध संजीवनी दे सकता है.ऐसे में अगर हम युद्ध होने की स्तिथी में संभावित जनाक्रोश को जनक्रांति में बदलने की जरूरत होगी. स्थितिया अराजकता की तरफ न जाए इसलिए हमे मैदान में उतर जाना चाहिए नहीं तो इतिहास हमे माफ़ नहीं करेगा..

 

इन्कलाब जिंदाबाद !!

– दयानंद कनकदंडे 

[ एनडीपीआई,सीपीआई(माले),युवा भारत,जाति विरोधी आन्दोलन द्वारा गांधी शांति प्रतिष्ठान,नयी दिल्ली में आयोजित नोटबंदी:किसके पक्ष में सेमिनार में दिया गया वक्तव्य..२५ दिसंबर २०१६ ]  

नोट बंदी : गरीब को और गरीब करने की योजना है

( ८ नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लादी गयी नोटबंदी के अन्वयार्थ कि चर्चा करता आलेख)

नोट बंदी या विमुद्रीकरण  पर समूचा देश बुरी तरह से विभाजित  हो गया है. सभी पूंजीवादी पार्टियां भी इस विषय पर विभाजित हैं.  वे अपने वर्ग के लाभ  के लिए ही इस विषय  पर   अलग अलग  सोच रखती हैं. हमें  भी शोषित वर्गों के प्रतिनिधि के  लिहाज़ से इस नीति को देखना है .

 

पूंजीपती वर्गों के लोगों और पार्टियों  ने इसे इस लिहाज़ से देखा है कि  कितनी जल्दी अर्थव्यवस्था दुबारा पटरी पर आ पायेगी  और  किस मात्रा  में लोग नकदी के प्रयोग घटा देंगे या बंद कर देंगे . लेकिन किसी ने भी   इसका गरीबों पर सीधे  और स्थायी हो रहे असर पर गौर करना ज़रूर नहीं समझा  है.

 

आइये देखे क्या असर है :  नोट बंदी से अर्थव्यवस्था के अंदर ही सम्पति और धन  का पुन: वितरण हो रहा  है और आगे भी होगा. इससे कमज़ोर लोगों की सम्पदा , शक्तिशाली  लोगों हाथों  में स्थानांतरित हो रही है  और  सरकार यह दावा कर रही है  कि वह निर्धनों के लाभ के लिए  इस नीति को लाइ है  जब कि हो इसके ठीक उल्टा रहां  है .

 

यह इस प्रकार है कि देश के अधिकाँश  मेहनतकश, करीब ८०-९०%  असंगठित  क्षेत्र में कार्यरत हैं जहां वेतन नगदी में दिया जाता है और वे खर्चा भी नगदी में करते हैं . इस नगदी के अभाव का असर सभी पर पड़ेगा और  निर्धनों पर विपरीत और अन्य पर सकारत्मक .   मेहनतकशों की अधिकाँश महिलाएं  अपनी रोज की आमदनी से कुछ पैसा बचाकर अलग से रख लेती हैं  . उनमें से कई अपने आदमियों से बचाकर और कुछ अन्य किसी आड़े वक्त में काम आने के लिए.यह उनकी सुरक्षा का  बड़ा कवच है .आज के नकदी संकट  में यह सभी पैसा निकल जायगा  और उनके  जीवन को अत्यंत असुरक्षित  कर देगा .  उनका शोषण और अधिक हो जायगा.

 

वे किसान जो रबी की फसल समय से या उसके अलावा  बो नहीं सकेगा और खरीफ को बेच नहीं सकैगा  , उसे इन फसलों  को बोने के लिए महाजनों के पास जाना पड़ेगा,विशेष रूप से  इसलिए भी की सहकारी बैंकों को अभी तक नोट बदलने की सुविधा नहीं दी गयी है और ये  सभी बैंक बंदी की कगार पर हैं.

 

यही हाल मजदूरों का भी है जिन्हें बड़ी तादाद में काम से हाथ धोना पड़ा है . इनमें से बहुतेरे तो लंगरों की तलाश में रहते  हैं जहां उन्हें  खाना मिल सके; कुछ  ने कानपूर में  नसबंदी भी कराई है ताकि चार पांच दिन तक वे परिवार को खिला सके, और बाकी  सभी महाजनों के चंगुल मैं हैं . कानपूर के मजदूर बाजारों में मजदूरों की संख्या घटती जा रही है क्योंकि कोई काम नहीं है. जो गांव जा सकते हैं वे गांव जा चुके हैं .   इन वर्गों के सभी  लोगों को किसी ना किसी रूप में अपने सम्पति बेचनी  होगी और उनकी माली  हालत पहले से भी बहुत खराब होनी  अवश्यम्भावी हैं .

 

इसके अलावा उन सभी को जिनको किन्ही आपदा के कारण अपने  ५०० अथवा १००० के नोटों को तुरंत ही  बदलवाना पड़ा , इस सब को इन्हें  कम दामों पर देना पड़ा है . बाजार की दर थी ५०० रुपये का ४०० रुपये में बेचना तो आम बात थी.आकस्मिक लेकिन आवश्यक कार्यों के लिए हर व्यक्ति को इन पैसो  के लिए  दलालों के पास जाना पड़ा. यह काम कई करोड लोगों को करना पड़ा . इन दलालों की पौ बारह  हो गई है .

 

छोटे दुकानदारों, खोमचे और रेडी पर सामान  रख कर बेचने  वालों को हानि होनी शुरू हो गयी है  क्योकी बना सामन बिक नहीं रह है. गरीब आदमियों के बाजार बिलकुल खाली पड़े हैं . कानपूर का शीशामऊ बाजार जो आम दिनों में पैदल पार करना भी मुश्किल था  आजकल मोटर साइकिल चलाकर तेज़ी से निकल सकते हैं  और कही आपको रफ़्तार कम  करने की ज़रूरत नहीं होगी. कही कोई खरीदार नहीं मिलेगा .यह सारा व्यव्साय उनको जा रहा है जो लोग कार्ड से खरीदारी करते हैं . सरकार प्रचार कर रही है  कि मशीनॉ  से भुगतान करे. पे टीएम् के विज्ञापन रोज हमको यही बताते  हैं. ; लेकिन इसके लिए यह आवशयक है कि आपके पास एक स्मार्टफोन  हो यदि आप   १०,००० से अधिक कमाना चाहते हैं तो तो आपके पास एक  कर सूचना संख्या भी होनी चाहिए. छोटे दूकानदार इस हानि को बर्दाश्त नहीं  हीं कर पा  रहे हैं  और कई खोमचे वालों  ने अपनी  रेड़िया भी बेच दी हैं .यह प्रक्रिया केवल और अधिक तेज ही हो सकती है .

 

कारखाना बंदी बहुत तेज  रफ़्तार से  हो रही है . सूरत का हीरा  उद्योग, तिरुप्पूर , तमिल नाड, का कपड़ा उद्योग . यह दोनों निर्यात के केंद्र इस समय बुरी दशा से गुजर रहे हैं . तमाम कारखाने  बंद हो रहे हैं नीर्यात के आर्डर रद्द किये जा रहे हैं . बाकी  सभी औद्योगिक क्षेत्रों में भी कमोबेश यही दशा है . अधिकाँश उद्योगों में बंदी हैं और मजदूर सड़क पर आ गए है . उत्पादन चक्र टूट चूका है . पैसा नहीं होने से खरीदारी बंद है . खरीदारी बंद होने से वे उद्योग भी  बंद हो गए हैं. बंद होने के कारण मजदूर सडकों पर आते जा रहे हैं , जिससे वेतन ना मिलने के कारण  वे खरीदारी नहीं  कर पा रहे हैं  , जिससे उद्योग  और अधिक्  बंदी की ओर जा रहे हैं  . तमाम कारखाने  बैंकों से कर्जा लेकर काम करते हैं उन पर बैंकों का ब्याज ही  भारी  पड़ रहा  है. इनमें से तमाम कारखाने दुबारा चालू भी नहीं हो सकंगे , जब भी नगदी का संकट  समाप्त या कम होगा. इस प्रकार यह संकट मंदी में बदल सकता है , अर्थात बना माल बिके  नहीं, इसलिए नया माल बनना बंद हो जाय.इससे बेरोजगारी और अधिक हो जायगी , और लोगों की क्रय शक्ति और कम.  ऐसी अवस्था को ही मंदी कहते हैं जब बना हुआ माल बिकता नहीं इसलिए और  अधिक कारखाने बंद हो जाते है और जो माल बिक रहां  था वह भी बंद हो जाता है. एक ऐसा चक्र बन जाता है जिससे त्क़भी निकला जा सकता है जब पुराना माल बिक जाए और नया माल बनना शुरू हो.

 

दूसरी ओर बैंकों के पास बेंतेहा  राशि जमा हो गई है और इसलिए उनकी  ब्याज दरे  नीचे आ रही हैं. देश के कुल १० सर्वाधिक धनी  घरानों पर  ७.३ लाख करोड के कर्जा है जो बैंकों से लिया गया है  और यदि  बैंक अपने ब्याज की दर १% नीचे लाते हैं  तो इन सब को ७,३०० करोड रुँपुए का ब्याज देनदारी में लाभ हो होगा . इस प्रकार इस कार्य से गरीबो  की भलाई  के विपरीत , पैशेवर काला पैसा कमाने वाले उद्योपतियों को लाभ देने की तैय्यारी चल रही है.  यह  लगता है कि  फौरी तौर पर यह रोड़ा आ गया है  कि रिजर्व बैंक ने इस नई जमा राशि को नगद-आराक्षित अनुपात  के मद में अपने पास जमा कर लिया है , इसलिए यह सब फिलहाल टल गया है. लेकिन यह कुछ ही समय के लिये है उसके बाद यह लाभ होना स्स्वाभाविक है . यह लाभ इन कम्पनियों और बैंकों  को इसलिए हो रहा  है कि हम अपना पैसा  नहीं  निकाल सकते हैं .

 

बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जो अपने ५०० रुपये को बदलवा नहीं पायंगे , वे या तो बीमार होंगे अथवा बैंकों से बहुत दूरं होंगे  इत्यादि. बहुतेरे ऐसे भी हैं जो कतार में नही खड़े हो पायंगे.

 

अब आधार पर आ जाएँ देश में ५.८ करोड लोग ऐसे हैं जिनके पास आधार कार्ड नहीं है .ऐसे लोगों के पास और कोई परिचय पत्र कम ही होने की संभावना  है  और ऐसों के पास कोई बैंक में खाता  होगा इसकी संभावना भी कम है .भारत में लगभग सभी घरों में कुछ नगदी रखी जाती है ताकि किसी आपात काल   स्तिथी  से निपटा जा सके.  एक अध्धयन के अनुसार  ५९% प्रतिशत लोग अपनी समस्त बचत  नगदी में रखते हैं.

 

ये हानियाँ और लाभ स्थायी प्रक्रति  के हैं  . इनमें  कोई परिवर्तन नहीं  आयगा.  और यह धन दौलत का स्थानांतरण  किसी उत्पादक कार्यों से  नहीं हुआ है यह इसलिए हुआ है क्योंकि वे अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली हैं . इसे ही प्रतिगामी आर्थिक  नीति कहते हैं .

 

यह दावा कि यह काला पैसा को रोकेगा और यह नीति  काले पैसे को निकलवाने के लिए बनाई गयी है , बेबुनियाद है . वह इसलिए कि : सरकारी अनुमानों  के  ही अनुसार कुल काले पैसे  का  मात्र  ६%, मुद्रा नोट,  के रूप में रखा जाता है .बाकी  सभी पैसा  आभूषण, भवन निर्माण और अन्य व्यवसायी कार्यों में लगा रहता है .  काला पैसा कोइ  स्थिर चीज़ नही  है जो बण्डल के रूप में पड़ा रहता  है  और जिसे हम एक छापा मारकर प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वह लगातर  प्रवाह में है ,व्व्यव्साय    में प्रयोग हो रहा है . इसलिए  यदि नोट बंदी भी की जाती है  तो भी काला पैसा बाहर नहीं आयगा क्योंकि यह पैसा नोट  के रूप में नहीं है  और कर अधिकारियों का इंतज़ार नहीं कर रह है .इसलिए नोट बंदी या बैंक लौकेरों  पर छापे  से काला पैसा खतम नहीं होगा  हाँ वह कुछ मात्रा  में मिल सकता है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है उसके अनुसार सरकार को  यह आशा है कि वह ४००० करोड रुपये का काला पैसा निकलवा सकेगी.

 

यदि काले धन को निकलवाना एक लक्ष्य है तो यह राशि बहुत कम है और इसे  निकलवाने के लिए उठायी  हानि बहुत अधिक. वैसे भी  सरकार ने ऐसे कोई  कदम नहीं उठाये हैं जिससे  यह लगे कि वह काला धन निकलवाने के बारे में गंभीर  है. भारत के बजटों में,कंग्रेस  और अब भाजपा दोनों ने ही भागीदारी नोट्स ( PARTICIPATORY NOTES   PN या  पी एन  ) नामक योजना के तहत काले धन को बाहर से देश में लाने  के लिए  इस  योजना को लाया गया था इसके तहत, भारत में पैसा लगाने  वाले विदेशी  निवेश   संस्थाएं उन विदेशियों जो बिना अपना नाम और परिचय जाहिर कर , भारत में निवेश करना चाहती  हैं,  इन संस्थानों को यह अधिकार दिया ज्ञाय है कि वे ऐसे निवेशकों को पी एन  जारी कर सकते हैं  और इनको  भारत के  पूंजी बाजार में निवेषित किया जा सकता है. एक समय में तो भारत में शेयर बाजारों में लगे पैसे का आधा पी एन के द्वारा ही लगा हुआ था अब यह घटकर  १०% हों गया है. ये निवेशक गुमनाम हैं इनके  बारे  में जानकारी न करने की कानूनी बाध्यता है. ये देश में काले  पैसे का  बड़ा स्त्रोत है. ये पैसा भारत से बाहर गया हुआ है जिसके  मालिक भारत के अधिकारी  वर्ग, राजनेत और व्यवसायी हैं. इसी प्रकिया  से भारत में निवैश्  करने के बहुत सुगम रास्ता मॉरिशस  के साथ दोहरा कराधन  सन्धि है  इसके  तहत मॉरीशस में कंपनी खोलकर आप  भारत में निवेश कर सकते हैं और इस कंपनी को भारत  में कर नहीं देना होगा,. गत बजट में सरकार ने इनके लाभ पर पूंजी सवर्धन कर लगाया है  ; इसके बावजूद  संधि ऐसी है जिससे कर से बचा जा सकता है  और इसमें भे इतनी परतें हैं किन असली मालकों कमालुम भी नहीं पडता है. यह भी काले पैसे को देश में पैसे लाने  का एक अच्छा साधन है.

 

भारत से पैसा बाहर नहीं जा सके और काला बाज़ारिये  पकडे जाय, इसके लिए २०१२ में जब प्रणब मुख़र्जी वित्त मंत्री थे, उस समय सामान्य कर बचाव नियमावली बनायी गयी थी  और इसे लोक सभा द्वारा पास कर दियागयाथा और इसे  लागू करने  की तारीख तय होनी बाकी थी. लेकिन यह लागू ना हो इसलिए प्रणब मुख़र्जी को राष्ट्रपति बना दिया गया और इस क़ानून को पास करना नए वित्त मंत्री चिदामब्रम द्वारा स्थगित कर दिया गया था  और उसके बाद की नरेन्द्र मोदी  सरकार भी इस लागू करने  की तारिख हर वर्ष आगे बढ़ा देती है  और यह तारीख २०१८ है. और साथ ही यह भी  घोषणा कर दी गई है कि यह  नियम  अप्रैल  २०१७ से पहले के सौदों पर लागू नहीं होंगे . अर्थात  नोट बंदी से छोटे सूटकेस   वालों को एक मौसम में हानि उठानी पड़ेगी, उसके  बाद से फिर वही सब दुबारा चालू हो जायगा.  इस प्रकार न तो नरेन्द्र मोदी सरकार और ना ही मन मोहन सिंह की सरकार ही काले धन को निकलवाने के बारे में गंभीर है .ये दोनों ही सरकारें     और उनकी पार्टियां पूंजीपति वर्गों को कोई तकलीफ देना तो दूर वह  इन्ही की प्रतिनिधि पार्टियां हैं और इन्ही के लाभ के लिए काम करती हैं .

 

१.   ऐसी दशा में हामारी  मांग यह है कि  १. सरकार जिन मजदूरों और उद्योगों की क्षति हुई है उनको तुरंत ही मुआवजा दे.उनकी समूची इस दौर का समूचा  वेतन  तथा उत्पादन को हुए नुक्सान की भार्पाये करे.

 

२. जिन किसानों को नकदी संकट  के कारण खरीफ बेचने में और रबी की फसल देरसे लगाने के कारण  जो नुक्सान हुआ है उसका मुआवजा  दे.

 

३. सभी स्थानों पर लंगर  खोल कर ऐसे  सभी लोगों को भोजन उपलब्ध कराये जो किसी प्रकार के सुरक्षा कवच अर्थात  सामजिक सुरक्षा की योजना के दायरे में नहीं आते हैं .४. इस बात का आंकलन करने के लिए इस नोट बंदी से कितनी हानि हुई है , एक विशाशाग्यों की कमेटी बनाई  जानी चाहिए जो इस रिपोर्ट को त्वरित आधार पर तैयार करके इस प्रस्तुत करे.

 

निवेदक : राम शंकर ,नवल कुमार मिश्रा ,कैलाश राजभर, सुश्री कुसुम ,श्रीमती आशा देवी,  सुश्री गीता , मनोज तिवारी , डॉ आर डी सिंह,  सतीश समुद्रे, सुजीत समुद्रे , विजय चावला ,

 

युवा  भारत  और इंडियन काउन्सिल  ऑफ ट्रेड यूनियंस

कानपूर जिला इकाई