Yuva Bharat Constitution (Hindi)

Yuva Bharat Constitution Hindi

युवा भारत का आठवां अखिल भारतीय प्रतिनीधी सम्मेलन

 

२१,२२,२३ मार्च २०१७

स्थल;- भारतीय लोकसेवक मंडल,हरी हर नाथ शास्त्री स्मारक भवन,खलासी लाईन,कानपूर (उत्तर प्रदेश)

साथियों,

युवाओ का अखिल भारतीय संगठन युवा भारत अपना ८वा अखिल भारतीय सम्मेलन कानपूर (उत्तर प्रदेश) में २१-२३ मार्च के दौरान करने जा रहा है..

“टेम्पल ऑफ़ डेवलपमेंट से मेक इन इंडिया तक; भारत कहाँ “ यह विषय इस बार चर्चा के केंद्र में होगा. भाक्रा-नंगल बांध परियोजना का उद्घाटन करते वक्त प्रधानमंत्री नेहरू ने बी बांधो को आधुनिक भारत के मंदिर कहा था. आज के समय मोदी मेक इन इंडिया,न्यू इंडिया जैसे नारों को उछाल रहे है. नेहरू से मोदी तक नीतियों के परिणामस्वरूप देश की जनता पर हुए सामाजिक,सांस्कृतिक,पर्यावरनीय परिणामो  की चर्चा,भूमी,उद्योग्य,खेती,शिक्षा एवं रोजगार की नीतीया तथा देश और दुनिया में हो रहे वैकल्पिक संघर्षो पर सम्मेलन में बात  की जायेगी ..

युवा भारत संघठन का ८ वा अखिल भारतीय सम्मेलन कानपूर शहर में हो रहा है. युवा भारत साम्राज्यवाद विरोधी युवाओ का संघठन है एवं इसने अपनी स्थापना के समय से लेकर आज तक अपनी सीमित क्षमता के बावजूद साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में अपनी भूमिका निभायी है. वह महाराष्ट्र,झारखण्ड,प.बंगाल से लेकर यूपी,हरियाणा एवं दिल्ली में मेहनतकश वर्ग-जातियों के संघर्षो के साथ खड़ा रहते आया है.

 

सेवाग्राम,वर्धा(महाराष्ट्र) में संपन्न ६ वे सम्मेलन में हम लोगोने नवउदारवादी नीतियों के २५ साल एवं युवा भारत के हस्तक्षेप के १२ साल की चर्चा की थी.उस समय के पहले एवं तब भी हम लोग प.बंगाल के सिंगुर-नदीग्राम,उलुबेडिया,महाराष्ट्र में डाउ,महामुबई सेझ,उत्तन भाईंदर की लढाई में,चंद्रपुर में अदानी कोयला खदान विरोधी संघर्ष में  कही अहम तो कही सहभागीता की भूमिका थे.हम लोगोने उन जगहों पर लढाई में सहभागीता की है एवं हरसंभव स्थिती में संघर्ष को सफलता का पहुचाने का संघर्ष किया है.

वर्धा सम्मेलन के एक प्रस्ताव में ही हम लोगोने इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के सन्दर्भ,नयी हरित क्रांती तथा नदी जोड़ परियोजना संबंधी प्रस्ताव के विरोध में,शिक्षा नीतियों में बदलाव के विरोध में लढने की बात की थी.मोदीजीने मेक इन इंडिया का नारा दिया है.पीछले सम्मेलन में हमने भारत बनने की प्रक्रिया में भाषाई एवं वांशिक राष्ट्रीयताओ का क्या भविष्य होगा यह सवाल उठाया. अब जब आनेवाले २०२२ तक उत्तर प्रदेश चुनाव में जित हासिल करने के बाद उन्होंने आजादी की ७५ वी वर्षगांठ पर नए भारत को बनाने की बात की है उस सन्दर्भ में हमे आज नेहरू के आधुनिक भारत,राजीव गांधी के डिजिटल भारत,इंदिराजी के गरीबी हटाव,वाजपेयी का इण्डिया शायनिंग,मनमोहन का भारत उदय अब मोदी का मेक इन इण्डिया एवं न्यू इंडिया यह जो सारे जुमले है वह पूंजीवादी विकास बढ़ावा देते वक्त ही उस पूंजीवादी विकास की प्रकिया से हाशिये पर धकेली जा रही आबादी को पूंजीवाद के समर्थन में खड़े करने के नारे रहे है. इससे पूंजीवाद की अर्थनीती को बढ़ावा देनेवाले दल ने ही सत्ता संभाली है. नीतीश जी का नारा है सामाजिक न्याय के साथ पूंजीवाद .केजरीवाल का नारा है क्रोनी पूंजीवाद नहीं चाहिए.अखिलेश का समाजवाद पूंजीवाद के अलग अलग वर्जन है.१९४७ से लेकर २०१७ तक के वर्षो में एक जुमले के बाद दूसरा नया जूमला लाया गया.पूंजीवादी विकास प्रकिया से इत्तर दृष्टिकोण के आधार पर नहीं सोचा गया. एक उत्तर सत्य के बाद दूसरा उत्तर सत्य हमारे सामने ला खड़ा किया गया.हम भी सत्ता द्वारा गढे जा रहे उत्तर सत्य की प्रतिक्रिया में ही अपना विमर्श चलाते रहे है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ जी विराजमान किये गए है.छवि हिंदुत्व के नायक की है,विकास का रथ तेजी से दौड़ाने प्रतिबध्दता है एवं सबका साथ सबका विकास नारा है. नेहरू,राजीवजी,मनमोहनजी छवि हिंदुत्व की नहीं तो सेकुलर है,विकास का रथ तेजी से दौड़ाने की प्रतिबद्धता रहि एवं नारा भारत उदय,डिजिटल इंडिया,गरीबी हटाव का रहा.सबका साथ सबका विकास का दावा उधर भी था लेकिन हम हिंदुत्व या सेकुलर वाली छवियो की बहस में उलझे रहे.एवं छवियो के आभासी युद्ध में एक दुसरे को स्थापित करते रहे एवं वह सब विकास का रथ जमीन बेरहमी से दौडाते रहे. यह रथ जब दौड़ रहा था.तो उसने दो विभिन समूहों के भीतर दंगे की राजनीती भी की.राष्ट्रीयताओ के संघर्ष का दमन भी किया,भाषाई एवं वांशिक राष्ट्रीयताओ के संघर्षो को धर्म के आधार पर में तब्दील कर उनके दमन की राजनीती भी सभी सताधारी वर्ग-जातियों ने किया.इसलिए हमें यह जो सत्तर साल के विकास का विमर्श है एवं २०२२ तक न्यू इंडिया बनाने की बात हो रही है उसका जायजा लेते हुए आम मेहनतकश के जीवन में बुनियादी तब्दीली लाने के विकास के वैकल्पिक विमर्श का मोडल क्या हो इसकी बात हमें करनी होगी.आज मोदी को हराएगा कौन वाली डिबेट में राहुल हराएंगे या केजरीवाल या नीतीश   वाली चर्चा है जबकि हमको यह बहस नीतियों के स्तर चलानी होगी. युवा का ८ वा अखिल भारतीय सम्मेलन दिशा किया जा रहा एक प्रयास है..

१९५४ में भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरूजी ने भाक्रा-नांगल बांध परियोजना का उद्घाटन करते समय कहा की “यह आधुनिक भारत के मंदिर है! नेहरू जी की नेतृत्व में बनी सरकारने आधुनिक भारत की नींव रखते हुए कई सारी बड़ी परियोजनाए स्थापित की जो देश के कृषि,औद्योगिक विकास के नए मापदंड बने.इन्ही बड़ी परियोजनाओ आधुनिक भारत के विकास के नए मंदिर के रूप में प्रस्तुत किया गया.इन्ही मंदिरों ने पिछले ६८ वर्षो में देश के भीतर पूंजीवादी विकास को आगे बढाया.इन्ही मंदिरों के आधार पर हरित क्रांति की उद्घोषणा  हुयी. गरीबी हटाव के नारे लगे.इन्ही मंदिरो के आश्रय से १९९० के दशक से चल रही नव उदारवादी नीतिया फली फूली जिसने इण्डिया शायनिंग,भारत उदय  से लेकर मेक इन इण्डिया जैसे जुमले एवं अब २०२२ में आजादी की ७५ वी वर्षगांठ तक न्यू इण्डिया बनाने की बाते हो रही है .टेम्पल ऑफ़ डेवलपमेंट की चमक धमक में इंडिया आगे बढ़ते जरूर नजर आ जायेगा लेकिन आम मेहनतकश का भारत इन मंदिरों के बाहर खड़ा कर दिया गया है और दबाया भी गया है.उस आम मेहनतकश की तकलीफ,उसके भारत के सपनो की खोज क्या टेम्पल ऑफ़ डेवलपमेंट में पुरी हो पाई है ? गरीबी हटाव का नारा इंदिराजी का गरीब कल्याण की मोदीजी की.. वही जुमले नयी परिस्थिती में क्यों उभर कर आ रहे है?? इसपर एवं विकास का जो प्रारूप इस देश में अपनाया जा रहा है उसपर हमें सोचना चाहिए.अंगरेजी हुकूमत द्वारा लाये गए एवं बाद विश्व के धरातल पर बने साम्राज्यवादी विकास के प्रारूप का क्या कोई विकल्प नहीं होगा..? वह होगा तो क्या होगा ..? इसपर बातचीत की जानी चाहिए..

 

पूंजीवादी विकास की अवधारणा के खिलाफ मार्क्सवादी,गांधीवादी,आम्बेडकरवादी,समाजवादी खेमे की तरफ से वैचारिक धरातल पर एवं संघर्ष के धरातल पर भी जो हस्तक्षेप किये गए उसने विकल्प के सन्दर्भ में नए विमर्श आगे बढाया है.साथ ही बड़ी बांध परियोजनाओ के खिलाफ सबसे बड़ा संघर्ष १९२७ में पुणे के पास हुआ.१९६० के दशक से दामोदर नदी परियोजना,उड़ीसा के हीराकुंड उत्तराखंड में टिहरी से लेकर नर्मदा बांध परियोजना तक लगभग सभी बड़ी परियोजनाओ के खिलाफ संघर्ष जारी है .यह संघर्ष पर्यावरण पर होनेवाले विपरीत संघर्ष,प्राकृतिक संसाधनों की लूट एवं विस्थापितों के अधिकार की बहस जारी रखे हुए है. चारू मुजूमदार के नेतृत्व में नक्सलबारी,विनोबाजी की नेतृत्व में भूदान आन्दोलन,७० के दशक का जेपी के नेतृत्व में छात्र-युवा आन्दोलन,महाराष्ट्र का दलित पंथर,बाद में उभरा मंडल आन्दोलन  आदि नेहरू जी के टेम्पल ऑफ़ डेवलपमेंट की नीती से प्रभावित जनमानस के आन्दोलन थे.देशभर में आज की तारिक में हो रहे किसान जातियों के आंदोलन २५ साल की वैश्वीकरण की नीतियों की प्रतिक्रिया में जिसे पी.वी.-मनमोहन ने शुरू किया एवं अब इसे मोदीजी आगे ले जा रहे है. मुंबई से लेकर दिल्ली तक बनाये जानेवाले कोर्रीडार के कारन जो बड़ी आबादी प्रभावित होगी उसके संघर्षो के साथ जुड़कर सेज की नीती के विरोध में हमारे द्वारा किये गए संघर्ष एवं उन संघर्षो से निकले विमर्श को आगे बढ़ाना है..

युवा भारत अखिल भारतीय समिती

नोटबंदी किसके पक्ष में …??

 

८  नवम्बर कि रात भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ५०० और १००० के नोटों कि वैधता ख़त्म होने का ऐलान किया.

“ मै धारक को५०० रु.अदा करने का वचन देता हु.. यह नोट पर लिखा हुआ था. यह वचन हमें  रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर के हस्ताक्षर से मिलता है.. और इस वचन को ८ नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने तोड़ दिया. क्या यह सही था..? यह पहला सवाल है..”

मोदीने जो वादे हमसे.. भारतीय जनता से… चुनाव के प्रचार के दौरान और प्रधानमंत्री होने के बाद भी किए थे  उनकी वैधता क्या है..? .साथ ही साथ  रिजर्व बैंक के अधिकारों में हस्तक्षेप करके कि गयी नोटबंदी के वक्त भी..जो घोषनाए प्रधानमंत्री ने की उसके बाद ५०-६० बार नोटबदली के सबंध में में जो परिवर्तन किए उससे यह शक और भी गहरा गया है. जनता ने तकलीफ सहते हुए जितने पैसे बैंक में जमा करवाए है उतना तो लौटाना था.. उतने पैसे बैंको द्वारा  हमें नई करेंसी में लौटाने चाहिए थे लेकिन पैसे निकालने पर मोदी के आदेशो से पाबंदी लगाई जा चुकी है… ८ नवम्बर को मोदीद्वारा   कैशलेस कि बात नहीं कही गयी  थी.अपने संबोधन में काला धन लाने कि बात कि थी.. जाली नोट पर प्रतिबन्ध और आतंकवाद से लढाई कि बात कि थी. माल्या जैसे लोग लोन को डुबाकर कैसे भाग गए है या भगाए गए है. वैसे तो इसपर ज्यादा बताने कि जरूरत नहीं है .. बैंक पैसो कि कमी से जूझ रहे है. रोजाना १ लाख ४० हजार करोड़ की कमी है. पिछले सालो में बैंकों का मुनाफा घटते ही जा रहा है. मुनाफा तो औद्योगिक घरानों को हो रहा है.यह इसलिए हो रहा है की हरसाल एनपीए में बढोतरी हो रही है.इन बट्टा खातो में डाले गए कर्जे को वसूलने की कोई कारगर नीती सरकार के पास नहीं है. १९९१ के बाद से ही पिछले २५ सालो में बैंक सुधार के नाम पर बैंकों के राष्ट्रिय स्वामित्व को बदलकर उसे नीजी बनाने की कोशिश जारी है.मौजूदा सरकार ने बड़े औद्योगिक घरानों के एनपीए माफ़ कर दिए है उसी तरह पूर्व की यूपीए सरकार ने भी किए थे.बैंकों की अधिकतम पूंजी नीजी हाथो में चली गयी है जिससे बैंक दिवालियापन की कगार पर खड़े है. नोटबंदी के बाद आम जनता द्वारा बैंकों में जमा हो रही राशि से बैंक आज तो दिवालिया होने से बाख गए है लेकिन मौजूदा नीतिया ही चलती रही तो संकट के अधिक गहरे होते जाने की आशंका है.अमरिका में जो सब प्राइम संकट आया था वह भी रियल इस्टेट के क्षेत्र की मंदी को दूर करने के लिए मकानों पर कर्जे के लिए उन्डेले गए बैंक के पैसे के कारन पैदा हुआ था. पैसे निकालने पर लादी गयी सीमा बैंको की तरलता को बनाये रखने का ही इंतजाम है. बैंकों को बचाने के लिए भारत की अपारम्परिक अर्थव्यवस्था में लगे  ४० प्रतिशत से ज्यादा धन को खींच लिया गया है इसका व्यापक असर रोजगार पर पड़ेगा.नोटबंदी के असंगठित क्षेत्र के रोजगार ख़त्म होने की खबरे भी आ रही है.मुंबई,कोलकत्ता,दिल्ली,कानपूर आदि महानगरो से लोग अपने गाँवो की तरफ लौट रहे है.महाराष्ट्र का भिवंडी,गुजरात का सूरत कपड़ा,हिरा,सराफा उद्योग संकट में आ चूका है.अनाज मंडियों में भी ख़राब हो रहा है एवं खेतो में भी. किसान अपनी फसलो को नकदी की कमी के कारन नहीं काट पा रहे है. महिलाओ की जमापूंजी जिसे उन्होंने अपने बुरे वक़्त के लिए बचा रखा था  छीन लिया है.जिस देश में जीवन रक्षा की योजनाए न हो और जो थी उसे भी आर्थिक सुधारो के नाम पर कम कर दिया है ऐसे समय में महिलाओ की जमापूंजी को छिना जाना एक पुरुषसत्ताक समाज में अतिभयावह है.नोटबंदी के निर्णय ने एक झटके में लोगो के पैसे को वितीय पूंजी का हिस्सा बना दिया है. वित्त पूंजी एवं वितीय पूंजी के साम्राज्यवाद को समझने के लिए लेनिन को पढ़ा जा सकता है.

काला धन अब तक नहीं आया है.. बैंक में  जो पैसा जमा किया गया है, जनधन योजना के बाद भी और नोटबंदी  के बाद भी  वह आम जनता का है. किसान का,मजदुर का,छोटे दुकानदारो का,फेरीवालो का है.. विजय माल्या,अम्बानी,अदानी या टाटा या बिड़ला का नहीं है. जनधन योजना के बाद हो या नोटबंदी के बाद भी जिनका कर्जा राइट ऑफ किया गया है अथवा माफ़ कर  दिया गया है उनमें जरूर माल्या,अम्बानी,अदानी वगैरह के नाम है..साथ ही इन्ही बड़े औद्योगिक घरानों को बड़े बड़े कर्जे भी दिए गए है.                                                    यह दावा कि यह काले  पैसे को रोकेगा और यह नीति  काले पैसे को निकलवाने के लिए बनाई गयी है , बेबुनियाद है . वह इसलिए कि : सरकारी अनुमानों  के  ही अनुसार कुल काले पैसे  का  मात्र  ६%, मुद्रा नोट,  के रूप में रखा जाता है .बाकी  सभी पैसा  आभूषण, भवन निर्माण और अन्य व्यवसायी कार्यों में लगा रहता है .  काला पैसा कोइ  स्थिर चीज़ नही  है. जो बण्डल के रूप में पड़ा रहता  है  और जिसे हम एक छापा मारकर प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वह लगातर  प्रवाह में है ,व्यवसाय में प्रयोग हो रहा है . इसलिए  यदि नोट बंदी भी की जाती है  तो भी काला पैसा बाहर नहीं आएगा क्योंकि यह पैसा नोट  के रूप में नहीं है  और कर अधिकारियों का इंतज़ार नहीं कर रह है .इसलिए नोट बंदी या बैंक लौकेरों  पर छापे  से काला पैसा खतम नहीं होगा.  हाँ वह कुछ मात्रा  में मिल सकता है.

अर्थशास्त्री कौशिक बसु का कहना है, ”भारत में गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) अर्थव्यवस्था के लिए ठीक था, लेकिन विमुद्रीकरण (नोटों का रद्द किया जाना) ठीक नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था काफ़ी जटिल है और इससे फायदे के मुक़ाबले व्यापक नुक़सान उठाना पड़ेगा।” प्रोफ़ेसर बसु पूर्व यूपीए सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। अभी न्यूयॉर्क कोर्नेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। उनका कहना है कि एक बार में सब कुछ करने के बावजूद ब्लैक मनी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अब इसकी मौज़ूदगी संभव नहीं है। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस कदम का सीमित असर होगा। लोग नई करेंसी के आते ही तत्काल ब्लैक मनी ज़मा करना शुरू कर देंगे। इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ सैकड़ों हज़ारों आम लोगों को पास नकदी है लेकिन यहां से ब्लैक मनी बाहर नहीं आएगी। इन्हें प्रताड़ित होने का डर है। इन्हें लगता है कि वे सामने आएंगे तो इन्हें फंसा दिया जाएगा।

 

अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का कहना है कि सरकार के इस कदम से साफ है कि उन्हें पूंजीवाद की समझ नहीं है। उनका कहना है, ”आम तौर पर इस स्थिति में पूंजावादी व्यवस्था में नए बिज़नेस की ओपनिंग होती है ताकि पुरानी करेंसी को नई करेंसी में तब्दील किया जा सके। इस हालत में लोग सामने आकर प्रस्ताव देंगे कि आप मुझे 1000 का नोट दीजिए और आपको इसके बदले 800 या 700 रुपये दिए जाएंगे। इसके परिणामस्वरूप ब्लैक मनी पर काबू पाने के बजाय काले धंधों का प्रसार बढ़ता है।’

भारत के बजटों में कांग्रेस और अब भाजपा दोनों ने ही भागीदारी नोट्स ( PARTICIPATORY NOTES   PN या  पी एन  ) नामक योजना के तहत काले धन को बाहर से देश में लाने  के लिए  इस  योजना को लाया गया था इसके तहत, भारत में पैसा लगाने  वाले विदेशी  निवेश   संस्थाएं उन विदेशियों जो बिना अपना नाम और परिचय जाहिर कर , भारत में निवेश करना चाहती  हैं,  इन संस्थानों को यह अधिकार दिया गया है  की, वे ऐसे निवेशकों को पी एन  जारी कर सकते हैं  और इनको  भारत के  पूंजी बाजार में निवेषित किया जा सकता है. एक समय में तो भारत में शेयर बाजारों में लगे पैसे का आधा पी एन के द्वारा ही लगा हुआ था अब यह घटकर  १०% हों गया है. ये निवेशक गुमनाम हैं इनके  बारे  में जानकारी न करने की कानूनी बाध्यता है. ये देश में काले  पैसे का  बड़ा स्त्रोत है. ये पैसा भारत से बाहर गया हुआ है जिसके  मालिक भारत के अधिकारी  वर्ग, राजनेत और व्यवसायी हैं. इसी प्रकिया  से भारत में निवैश्  करने के बहुत सुगम रास्ता मॉरिशस  के साथ दोहरा कराधन  सन्धि है  इसके  तहत मॉरीशस में कंपनी खोलकर आप  भारत में निवेश कर सकते हैं और इस कंपनी को भारत  में कर नहीं देना होगा,. गत बजट में सरकार ने इनके लाभ पर पूंजी सवर्धन कर लगाया है  ; इसके बावजूद  संधि ऐसी है जिससे कर से बचा जा सकता है  और इसमें भे इतनी परतें हैं कौन  असली मालिक है मालुम भी नहीं पडता है. यह भी काले पैसे को देश में पैसे लाने  का एक अच्छा साधन है.

अपने दिमाग को गिरवी रख इक मसीहा को समाज के भले का ठेका देनेवाले लोगो कि हमारे यंहा कमी नहीं है .. वह मोदी के उदय के बाद ज्यादा बढ़ गयी है..वह भी इसलिए हुआ है कि पिछले ७० सालो से . आजादी के बाद भी.. (वह आजादी थी या नहीं थी इन बहसों से के बावजूद भी.) मेहनतकश आबादी समय समय पर जो अपनी समस्याओ से परेशान थी .उन परेशानीयों के  बरक्स उसने मोदी जैसे मसीहा को सत्तासीन किया है .बीच बीच में वह ऐसेही मसीहाओ के शोध में रही है. जिस प्रकिया से  लालू,मायावती,केजरीवाल भी उभरे है… सांप्रदायिक हो या सेकुलर अथवा सामाजिक न्यायवादी सभी नयी आर्थिक नीतियों के ही समर्थक रहे है.यह इसलिए हुआ है कि हम अपनी उन्नती का ठेका किसी दुसरे को दे रहे होते है. काँग्रेस कि भ्रष्ट नीतियों से भुक्तभोगी  जनता ने भ्रष्ट नीतियों से मुक्त बीजेपी को जिसके राष्ट्रिय अध्यक्ष को हम लोगोने रिश्वत लेते कैमरे पर देखा है उसको सत्तासीन किया है. यूपीए से पहले सत्तासीन सरकार ने सत्ता में रहते वक्त १००० का नोट जारी किया था.जिसे मोदी ने वापस लिया है.कांग्रेस का विरोध करते वक़्त वह यह भूल जाते है  की १००० का नोट वाजपेयी सरकार ने जारी किया था.

 

हम सबमें एक बड़ा वर्ग है जो मान चुका है कि मोदीजी अच्छा कर रहे हैं,कालेधन पर छापा मार रहे हैं,कालाधन सरकार के पास आएगा तो सरकार सड़क बनाएगी ,स्कूल खोलेगी,कारखाने खोलेगी,बैंकों से घरों के लिए सस्ता कर्ज मिलेगा,महंगाई कम हो जाएगी,हर चीज सस्ती होगी,सब ईमानदार हो जाएंगे,चारों ओर ईमानदारी का ही माहौल होगा,इत्यादि बातों को आम जनता के बहुत बड़े हिस्से के दिलो-दिमाग में बैठा दिया गया है,अब जनता इंतजार कर रही है कि कालेधन की मुहिम पचास दिन पूरे कर ले,फिर हम सब ईमानदारी के समुद्र में तैरेंगे ! ये सारी बातें फार्मूला फिल्म की तरह आम जनता के बीच में संप्रेषित करके उनको मोदी-अफीम के नशे में डुबो दिया गया है। जैसे चुनाव के वक़्त का माहौल था. नरेन्द्र मोदी के गुजरात विकास कि कहानिया कैसे जनता के बीच फैलाई गयी.उन्हें कैसे औद्योगिक घरानोने प्रायोजित किया  इसकी पड़ताल हम सबको करनी चाहिए.. २०१४ के चुनाव के वक़्त  जब मोदी गुजरात के विकास मॉडल कि बात कर रहे थे तब हमें उस विकास के दावो के बारे में सवाल उठाना चाहीए था… उस विकास में किसान,मजदूर कि समस्याए एवं रोजगार कितना बढ़ा है यह पुछना था लेकिन हम में से ज्यादातर लोग २००२ के गुजरात दंगे पर अड़ गए थे..दंगो के लिए तो मोदी को माफ़ किया ही नहीं जा सकता था लेकिन विमर्श को सिर्फ सेकुलर – नॉन-सेकुलर के खांचे तक ही सीमित रखना एक भारी भूल थी.साम्प्रदायिकता के अजेंडे को बीजेपी तक सीमित रखना सत्ताधारी वर्ग के चरित्र को कम करके आंकने जैसा है.२००२ का वह दंगा तो उसने उस विकास की खोखली हकीक़त को छुपाने के लिए ही किया था.साथ ही दंगा कराना उसका मुख्य अजेंडा भी है. पूंजीवाद की सेवा करना एवं पूंजीवादी विकास से उभरनेवाले अंतरविरोधो को दबाने के लिए मुस्लिम विरोध की राजनीती करना उसका मुख्य धंदा है. हिंदुत्व एवं पूंजीवाद दोनों के आईकॉन मोदी इसलिए तो बने है. गुजरात के कथित विकास के खोखलेपण को पाटीदार ओर उंना आन्दोलन ने सामने ला दिया है.गुजरात विकास का बबल टूट गया है..

मोदी का अबतक बीता कार्यकाल वितीय पूंजी की सेवा का कार्यकाल है.जनधन योजना से आए पैसे को अदानी को कर्जे के रूप में दिया गया .नोटबंदी के बाद ७३ कंपनीयो का कर्जा माफ़ कर दिया गया है.मेहनतकश जनता की पूंजी को छिनकर उसे औद्योगिक घरानों की सेवा में लगाने के लिए ही नोटबंदी का निर्णय लिया गया है . यह निर्णय करते वक़्त आरबीआई,संसद,मंत्रींमंडल,संविधान को ताक पर रखकर यह निर्णय किया है.यह कदम तानाशाही भी है एवं फासिस्ट भी इसे जनता के बीच प्रचारित करने की जरूरत है.जिस देश में इन्टरनेट अब भी अधिकतम आबादी की पहुँच से बाहर है.बिजली भी ठीक से गाँवो तक नहीं पहुँची है ऐसे हालात देश को जबरदस्ती कैशलेस अर्थव्यवस्था में  क्यों धकेला जा रहा है यह सवाल भी इस बीच महत्वपूर्ण है..बैंकों  से पैसे निकालने पर राशनिंग  और जबरदस्ती डिजिटल भुगतान करने के लिए  डाला जा रहा दबाव भारतीय जनता के हित में है की वितीय पूंजी के विस्तार के हित में…? इस सवाल पर चर्चा होनी चाहिए.नोटबंदी हो या कैशलेस का नारा सब देशप्रेम की चाशनी में दिए जा रहे है एवं सवाल उठाने वालो को देशद्रोही करार दिया जा रहा है, इस फासिस्ट स्तिथि को समझकर हम सबको हमलावर होने की जरूरत है. अंबानी ने जिओ सिम को जारी किया है.कुछ दिनों बाद वह जिओ मनी भी जारी करनेवाले है.मोदीजी जिओ को डिजिटल इंडिया की यात्रा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में चिन्हित कर चुके है. जिओ सिम ,जिओ मणी,डिजिटल भुगतान जिओ के साथ साथ मोदी पेटीएम के विज्ञापन में भी दिखे है.  पेटीएम ई वालेट कम्पनी है.इस कम्पनी में ४० प्रतिशत पैसा चायना की अलीबाबा का है,जो लोग चीनी मालो का पटाखे,झालर बेचने वालो का विरोध कर रहे थे वही पेटीएम करने को कह रहे है. मोदीभक्तो को भी इस पर विचार करना चाहिए.  जीडीपी में जो गिरावट आयी है उसकी चर्चा मनमोहन सिंग को करने दीजिए.वह जीडीपी बढ़ाने के उपाय मोदी को बताएँगे.मोदी उन्हीके उत्तराधिकारी है.मतभेद काम करने के तरीके को लेकर है बाकि नीतियों पर तो सहमती है ही..!! जीडीपी और रोजगार के सृजन का तर्क नवउदारवाद के युग बेमानी हो गया है. पिछले २५ सालो में जीडीपी बढ़ाने के नाम पर जो नीतिया इस देश में लाई गयी उसने कितने पारंपरिक रोजगारो को ख़त्म किया है? कितने जंगलो का दोहन किया है? नदियो पर बांध बनाने,अलग अलग इंडस्ट्रीयल झोन बनाने के नाम पर कितने आदीवासीयो को उजाड़ा है? किस तरह खेती को चौपट किया है ?  इसपर बात होनी चाहिए.ग्रॉस डिस्ट्रक्शन की बात होनी चाहिए.मोदी की घोषणा मेक इन इण्डिया की है जिसमे मुम्बई-दील्ली,अमृतसर से कोलकाता जैसे ६ इंडस्ट्रीयल कोर्रीडोर बनाने है.इन कॉरिडोरो का बनाने के लिए लाखो एकड़ जमीन कब्जाई जायेगी.नदी जोड़ परियोजना से नदी जोड़कर पानी पर कब्ज़ा किया जाएगा एवं जीडीपी बढ़ाने के नारे के साथ हमारे पैसो को निवेशित किया जाएगा.यह भी देशभक्ती के नाम पर होगा .नोटबंदी की मार झेलने के बाद अगली बारी इस विकास के कथित जनांदोलन को झेलने की होगी. नोटबंदी हो या मेक इन इंडिया दोनों भी मेहनतकश जनता पर लादे गए युद्ध है.

मोदीने  हमें काला धन  आने के बाद हिस्सा देने कि बात कि है.. जो राष्ट्र कि संपती है उसमे नहीं..  राहुल गांधी ने तो एक सभा में १ प्रतिशत लोगो के पास संपती होने कि बात कही है.और वह संपती पिछले ढाई साल में जमा हो जाने कि बात कही है. .राहुल गांधी की आधी बात सच है पुरी नहीं. यह संपती १ प्रतिशत लोगो के पास किनकी नीतियों की वजह से चली गयी इसपर तो वह कुछ नहीं बोलते.क्या संपती का मतलब काला धन है.. ?? थोड़े ही है.. संपती ओर काला धन एक नहीं है.. मेरी समज में तो नहीं है   .उन्होंने गलती से काले धन कि जगह संपती कह कह दिया होगा. अगर संपती के बटवारे कि बात करते है तो स्वागत है.लेकिन यह बटवारा करना उनके बस की बात नहीं है.कॉर्पोरेट से चंदा लेकर राजनीती करनेवाले लोग एक सीमा तक मालिको का विरोध कर सकते है.वह करना उनकी मजबूरी भी है.हर ५ साल बाद जनता में जाना जो होता है !  काला धन,भ्रष्टाचार तो पूंजीवाद कि अपनी समस्या है.वह उसका अंगभूत गुण भी है.लेकिन वही जब उसके विकास में बाधा बनता है तो वह उसके खिलाफ मोर्चा खोल देता है.. उस मोर्चे के अगुवा केजरीवाल हो या मोदी बन जाते है.. लेकिन हमें तो वह संपती जो मेहनतकश जनता के श्रम एवं ,नैसर्गिक संसाधनों का दोहन कर प्राप्त कि गयी है उसका हिसाब मांगना चाहिए..  प्रधान है शोषण से निर्मित संपती .. दुसरा सवाल है उस संपती के बटवारे में हुआ भ्रष्टाचार… अमरीका में आकुपाय वालस्ट्रीट वी आर ९९ कि घोषणा के साथ आन्दोलन. हुआ है.. हमको तो आकुपाय आल स्ट्रीट करना है.

जैसे ही नोट्बंदी का ऐलान हुआ है लोग लाइन में है.. वह लाईन अब भी ख़त्म नहीं हुयी है.३१ दिसंबर के बाद भी ख़त्म होने की संभावना नहीं है. ५० दिन के बाद के हालात हर मोर्चे ज्यादा गंभीर होंगे.लोग जो आक्रोशित नहीं दिख रहे है क्योंकि वे अपनी कमाई जमा करने के लिए कतारों में खड़े है. हमको ५० दिन बाद जो आक्रोश उपजेगा उसको संगठित करने की तैयारी में लगना होगा.आज 25 दिसंबर है. .. ख्रिसमस का महिना है..येशु दुखितो के लिए क्रूस पर चढ़ गए थे. ..इस स्वयंघोषित मसीहा ने तो १०० से ज्यादा लोगो को मृत्यूद्वार पहुंचा दिया है.. संसद में इनको दो मिनट का मौन भी नसीब नहीं हुआ.यह मसीहा न संसद के लिए जवाबदेह है  न किसी संवैधानिक संस्था के लिए जवाबदेही समझता है.. नोटबंदी के दौरान कम पैसे में शादिया करने की नसीयते दी जा रही है एवं बैंकों से पैसा निकालने के लिए तरह तरह की पाबंदिया लगाई जा रही है.. लेकिन इसी बीच रेड्डी के घर ५०० करोड़ की नीतीन गडकरी के घर ५० करोड़ की शादी संपन्न की गयी है. नैतिकता उठते-बैठते जाप करनेवालों का असली चेहरा है यह..!!

अमरीका २००८ के आर्थिक संकट से उभरी नहीं है. अमरीका हथियारों का बड़ा कारोबारी भी है.अमरीका में रोजगार का संकट अधिक गहराता जा रहा है.अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की जरूरत के बीच अमरीका में डोनाल्ड ट्रम्प नामक मोदी के अवतार सत्तासीन हो गए है. वे चायना को ललकार रहे है जैसे इधर मोदी पाकिस्तान को..! ट्रम्प ने भारतीय मजदूरो को भगाने की नीती पर भी काम करना शुरू कर दिया है.इस मायने में वह राज ठाकरे के बाप नजर आते है.अमरीका चीन को ललकार रहा है,युद्ध की स्तिथी में अमरीका के साथ भारत,चायना के साथ पाकिस्तान.हालात बहुत ख़राब होंगे.नोटबंदी के बाद या जैसा की मैंने कहा विकास का कथित जनांदोलन चलाने के बाद जो संभावित जनाक्रोश उभर सकता है उसको दबाने के लिए मोदी पाकिस्तान के साथ युद्ध की घोषणा कर भी सकते है. उधर नवाज शरीफ भी तैयार होंगे.नवाज शरीफ का नाम पनामा पेपर्स में आ चूका है. वंहा वे इस मुद्दे पर घेरे भी जा चुके है..कैशलेस से भ्रष्टाचार कम होगा कहनेवालो को पनामा पेपर्स प्रकरण को पढ़ना चाहिए.उन्हें युद्ध संजीवनी दे सकता है.ऐसे में अगर हम युद्ध होने की स्तिथी में संभावित जनाक्रोश को जनक्रांति में बदलने की जरूरत होगी. स्थितिया अराजकता की तरफ न जाए इसलिए हमे मैदान में उतर जाना चाहिए नहीं तो इतिहास हमे माफ़ नहीं करेगा..

 

इन्कलाब जिंदाबाद !!

– दयानंद कनकदंडे 

[ एनडीपीआई,सीपीआई(माले),युवा भारत,जाति विरोधी आन्दोलन द्वारा गांधी शांति प्रतिष्ठान,नयी दिल्ली में आयोजित नोटबंदी:किसके पक्ष में सेमिनार में दिया गया वक्तव्य..२५ दिसंबर २०१६ ]  

नोट बंदी : गरीब को और गरीब करने की योजना है

( ८ नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लादी गयी नोटबंदी के अन्वयार्थ कि चर्चा करता आलेख)

नोट बंदी या विमुद्रीकरण  पर समूचा देश बुरी तरह से विभाजित  हो गया है. सभी पूंजीवादी पार्टियां भी इस विषय पर विभाजित हैं.  वे अपने वर्ग के लाभ  के लिए ही इस विषय  पर   अलग अलग  सोच रखती हैं. हमें  भी शोषित वर्गों के प्रतिनिधि के  लिहाज़ से इस नीति को देखना है .

 

पूंजीपती वर्गों के लोगों और पार्टियों  ने इसे इस लिहाज़ से देखा है कि  कितनी जल्दी अर्थव्यवस्था दुबारा पटरी पर आ पायेगी  और  किस मात्रा  में लोग नकदी के प्रयोग घटा देंगे या बंद कर देंगे . लेकिन किसी ने भी   इसका गरीबों पर सीधे  और स्थायी हो रहे असर पर गौर करना ज़रूर नहीं समझा  है.

 

आइये देखे क्या असर है :  नोट बंदी से अर्थव्यवस्था के अंदर ही सम्पति और धन  का पुन: वितरण हो रहा  है और आगे भी होगा. इससे कमज़ोर लोगों की सम्पदा , शक्तिशाली  लोगों हाथों  में स्थानांतरित हो रही है  और  सरकार यह दावा कर रही है  कि वह निर्धनों के लाभ के लिए  इस नीति को लाइ है  जब कि हो इसके ठीक उल्टा रहां  है .

 

यह इस प्रकार है कि देश के अधिकाँश  मेहनतकश, करीब ८०-९०%  असंगठित  क्षेत्र में कार्यरत हैं जहां वेतन नगदी में दिया जाता है और वे खर्चा भी नगदी में करते हैं . इस नगदी के अभाव का असर सभी पर पड़ेगा और  निर्धनों पर विपरीत और अन्य पर सकारत्मक .   मेहनतकशों की अधिकाँश महिलाएं  अपनी रोज की आमदनी से कुछ पैसा बचाकर अलग से रख लेती हैं  . उनमें से कई अपने आदमियों से बचाकर और कुछ अन्य किसी आड़े वक्त में काम आने के लिए.यह उनकी सुरक्षा का  बड़ा कवच है .आज के नकदी संकट  में यह सभी पैसा निकल जायगा  और उनके  जीवन को अत्यंत असुरक्षित  कर देगा .  उनका शोषण और अधिक हो जायगा.

 

वे किसान जो रबी की फसल समय से या उसके अलावा  बो नहीं सकेगा और खरीफ को बेच नहीं सकैगा  , उसे इन फसलों  को बोने के लिए महाजनों के पास जाना पड़ेगा,विशेष रूप से  इसलिए भी की सहकारी बैंकों को अभी तक नोट बदलने की सुविधा नहीं दी गयी है और ये  सभी बैंक बंदी की कगार पर हैं.

 

यही हाल मजदूरों का भी है जिन्हें बड़ी तादाद में काम से हाथ धोना पड़ा है . इनमें से बहुतेरे तो लंगरों की तलाश में रहते  हैं जहां उन्हें  खाना मिल सके; कुछ  ने कानपूर में  नसबंदी भी कराई है ताकि चार पांच दिन तक वे परिवार को खिला सके, और बाकी  सभी महाजनों के चंगुल मैं हैं . कानपूर के मजदूर बाजारों में मजदूरों की संख्या घटती जा रही है क्योंकि कोई काम नहीं है. जो गांव जा सकते हैं वे गांव जा चुके हैं .   इन वर्गों के सभी  लोगों को किसी ना किसी रूप में अपने सम्पति बेचनी  होगी और उनकी माली  हालत पहले से भी बहुत खराब होनी  अवश्यम्भावी हैं .

 

इसके अलावा उन सभी को जिनको किन्ही आपदा के कारण अपने  ५०० अथवा १००० के नोटों को तुरंत ही  बदलवाना पड़ा , इस सब को इन्हें  कम दामों पर देना पड़ा है . बाजार की दर थी ५०० रुपये का ४०० रुपये में बेचना तो आम बात थी.आकस्मिक लेकिन आवश्यक कार्यों के लिए हर व्यक्ति को इन पैसो  के लिए  दलालों के पास जाना पड़ा. यह काम कई करोड लोगों को करना पड़ा . इन दलालों की पौ बारह  हो गई है .

 

छोटे दुकानदारों, खोमचे और रेडी पर सामान  रख कर बेचने  वालों को हानि होनी शुरू हो गयी है  क्योकी बना सामन बिक नहीं रह है. गरीब आदमियों के बाजार बिलकुल खाली पड़े हैं . कानपूर का शीशामऊ बाजार जो आम दिनों में पैदल पार करना भी मुश्किल था  आजकल मोटर साइकिल चलाकर तेज़ी से निकल सकते हैं  और कही आपको रफ़्तार कम  करने की ज़रूरत नहीं होगी. कही कोई खरीदार नहीं मिलेगा .यह सारा व्यव्साय उनको जा रहा है जो लोग कार्ड से खरीदारी करते हैं . सरकार प्रचार कर रही है  कि मशीनॉ  से भुगतान करे. पे टीएम् के विज्ञापन रोज हमको यही बताते  हैं. ; लेकिन इसके लिए यह आवशयक है कि आपके पास एक स्मार्टफोन  हो यदि आप   १०,००० से अधिक कमाना चाहते हैं तो तो आपके पास एक  कर सूचना संख्या भी होनी चाहिए. छोटे दूकानदार इस हानि को बर्दाश्त नहीं  हीं कर पा  रहे हैं  और कई खोमचे वालों  ने अपनी  रेड़िया भी बेच दी हैं .यह प्रक्रिया केवल और अधिक तेज ही हो सकती है .

 

कारखाना बंदी बहुत तेज  रफ़्तार से  हो रही है . सूरत का हीरा  उद्योग, तिरुप्पूर , तमिल नाड, का कपड़ा उद्योग . यह दोनों निर्यात के केंद्र इस समय बुरी दशा से गुजर रहे हैं . तमाम कारखाने  बंद हो रहे हैं नीर्यात के आर्डर रद्द किये जा रहे हैं . बाकी  सभी औद्योगिक क्षेत्रों में भी कमोबेश यही दशा है . अधिकाँश उद्योगों में बंदी हैं और मजदूर सड़क पर आ गए है . उत्पादन चक्र टूट चूका है . पैसा नहीं होने से खरीदारी बंद है . खरीदारी बंद होने से वे उद्योग भी  बंद हो गए हैं. बंद होने के कारण मजदूर सडकों पर आते जा रहे हैं , जिससे वेतन ना मिलने के कारण  वे खरीदारी नहीं  कर पा रहे हैं  , जिससे उद्योग  और अधिक्  बंदी की ओर जा रहे हैं  . तमाम कारखाने  बैंकों से कर्जा लेकर काम करते हैं उन पर बैंकों का ब्याज ही  भारी  पड़ रहा  है. इनमें से तमाम कारखाने दुबारा चालू भी नहीं हो सकंगे , जब भी नगदी का संकट  समाप्त या कम होगा. इस प्रकार यह संकट मंदी में बदल सकता है , अर्थात बना माल बिके  नहीं, इसलिए नया माल बनना बंद हो जाय.इससे बेरोजगारी और अधिक हो जायगी , और लोगों की क्रय शक्ति और कम.  ऐसी अवस्था को ही मंदी कहते हैं जब बना हुआ माल बिकता नहीं इसलिए और  अधिक कारखाने बंद हो जाते है और जो माल बिक रहां  था वह भी बंद हो जाता है. एक ऐसा चक्र बन जाता है जिससे त्क़भी निकला जा सकता है जब पुराना माल बिक जाए और नया माल बनना शुरू हो.

 

दूसरी ओर बैंकों के पास बेंतेहा  राशि जमा हो गई है और इसलिए उनकी  ब्याज दरे  नीचे आ रही हैं. देश के कुल १० सर्वाधिक धनी  घरानों पर  ७.३ लाख करोड के कर्जा है जो बैंकों से लिया गया है  और यदि  बैंक अपने ब्याज की दर १% नीचे लाते हैं  तो इन सब को ७,३०० करोड रुँपुए का ब्याज देनदारी में लाभ हो होगा . इस प्रकार इस कार्य से गरीबो  की भलाई  के विपरीत , पैशेवर काला पैसा कमाने वाले उद्योपतियों को लाभ देने की तैय्यारी चल रही है.  यह  लगता है कि  फौरी तौर पर यह रोड़ा आ गया है  कि रिजर्व बैंक ने इस नई जमा राशि को नगद-आराक्षित अनुपात  के मद में अपने पास जमा कर लिया है , इसलिए यह सब फिलहाल टल गया है. लेकिन यह कुछ ही समय के लिये है उसके बाद यह लाभ होना स्स्वाभाविक है . यह लाभ इन कम्पनियों और बैंकों  को इसलिए हो रहा  है कि हम अपना पैसा  नहीं  निकाल सकते हैं .

 

बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जो अपने ५०० रुपये को बदलवा नहीं पायंगे , वे या तो बीमार होंगे अथवा बैंकों से बहुत दूरं होंगे  इत्यादि. बहुतेरे ऐसे भी हैं जो कतार में नही खड़े हो पायंगे.

 

अब आधार पर आ जाएँ देश में ५.८ करोड लोग ऐसे हैं जिनके पास आधार कार्ड नहीं है .ऐसे लोगों के पास और कोई परिचय पत्र कम ही होने की संभावना  है  और ऐसों के पास कोई बैंक में खाता  होगा इसकी संभावना भी कम है .भारत में लगभग सभी घरों में कुछ नगदी रखी जाती है ताकि किसी आपात काल   स्तिथी  से निपटा जा सके.  एक अध्धयन के अनुसार  ५९% प्रतिशत लोग अपनी समस्त बचत  नगदी में रखते हैं.

 

ये हानियाँ और लाभ स्थायी प्रक्रति  के हैं  . इनमें  कोई परिवर्तन नहीं  आयगा.  और यह धन दौलत का स्थानांतरण  किसी उत्पादक कार्यों से  नहीं हुआ है यह इसलिए हुआ है क्योंकि वे अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली हैं . इसे ही प्रतिगामी आर्थिक  नीति कहते हैं .

 

यह दावा कि यह काला पैसा को रोकेगा और यह नीति  काले पैसे को निकलवाने के लिए बनाई गयी है , बेबुनियाद है . वह इसलिए कि : सरकारी अनुमानों  के  ही अनुसार कुल काले पैसे  का  मात्र  ६%, मुद्रा नोट,  के रूप में रखा जाता है .बाकी  सभी पैसा  आभूषण, भवन निर्माण और अन्य व्यवसायी कार्यों में लगा रहता है .  काला पैसा कोइ  स्थिर चीज़ नही  है जो बण्डल के रूप में पड़ा रहता  है  और जिसे हम एक छापा मारकर प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वह लगातर  प्रवाह में है ,व्व्यव्साय    में प्रयोग हो रहा है . इसलिए  यदि नोट बंदी भी की जाती है  तो भी काला पैसा बाहर नहीं आयगा क्योंकि यह पैसा नोट  के रूप में नहीं है  और कर अधिकारियों का इंतज़ार नहीं कर रह है .इसलिए नोट बंदी या बैंक लौकेरों  पर छापे  से काला पैसा खतम नहीं होगा  हाँ वह कुछ मात्रा  में मिल सकता है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है उसके अनुसार सरकार को  यह आशा है कि वह ४००० करोड रुपये का काला पैसा निकलवा सकेगी.

 

यदि काले धन को निकलवाना एक लक्ष्य है तो यह राशि बहुत कम है और इसे  निकलवाने के लिए उठायी  हानि बहुत अधिक. वैसे भी  सरकार ने ऐसे कोई  कदम नहीं उठाये हैं जिससे  यह लगे कि वह काला धन निकलवाने के बारे में गंभीर  है. भारत के बजटों में,कंग्रेस  और अब भाजपा दोनों ने ही भागीदारी नोट्स ( PARTICIPATORY NOTES   PN या  पी एन  ) नामक योजना के तहत काले धन को बाहर से देश में लाने  के लिए  इस  योजना को लाया गया था इसके तहत, भारत में पैसा लगाने  वाले विदेशी  निवेश   संस्थाएं उन विदेशियों जो बिना अपना नाम और परिचय जाहिर कर , भारत में निवेश करना चाहती  हैं,  इन संस्थानों को यह अधिकार दिया ज्ञाय है कि वे ऐसे निवेशकों को पी एन  जारी कर सकते हैं  और इनको  भारत के  पूंजी बाजार में निवेषित किया जा सकता है. एक समय में तो भारत में शेयर बाजारों में लगे पैसे का आधा पी एन के द्वारा ही लगा हुआ था अब यह घटकर  १०% हों गया है. ये निवेशक गुमनाम हैं इनके  बारे  में जानकारी न करने की कानूनी बाध्यता है. ये देश में काले  पैसे का  बड़ा स्त्रोत है. ये पैसा भारत से बाहर गया हुआ है जिसके  मालिक भारत के अधिकारी  वर्ग, राजनेत और व्यवसायी हैं. इसी प्रकिया  से भारत में निवैश्  करने के बहुत सुगम रास्ता मॉरिशस  के साथ दोहरा कराधन  सन्धि है  इसके  तहत मॉरीशस में कंपनी खोलकर आप  भारत में निवेश कर सकते हैं और इस कंपनी को भारत  में कर नहीं देना होगा,. गत बजट में सरकार ने इनके लाभ पर पूंजी सवर्धन कर लगाया है  ; इसके बावजूद  संधि ऐसी है जिससे कर से बचा जा सकता है  और इसमें भे इतनी परतें हैं किन असली मालकों कमालुम भी नहीं पडता है. यह भी काले पैसे को देश में पैसे लाने  का एक अच्छा साधन है.

 

भारत से पैसा बाहर नहीं जा सके और काला बाज़ारिये  पकडे जाय, इसके लिए २०१२ में जब प्रणब मुख़र्जी वित्त मंत्री थे, उस समय सामान्य कर बचाव नियमावली बनायी गयी थी  और इसे लोक सभा द्वारा पास कर दियागयाथा और इसे  लागू करने  की तारीख तय होनी बाकी थी. लेकिन यह लागू ना हो इसलिए प्रणब मुख़र्जी को राष्ट्रपति बना दिया गया और इस क़ानून को पास करना नए वित्त मंत्री चिदामब्रम द्वारा स्थगित कर दिया गया था  और उसके बाद की नरेन्द्र मोदी  सरकार भी इस लागू करने  की तारिख हर वर्ष आगे बढ़ा देती है  और यह तारीख २०१८ है. और साथ ही यह भी  घोषणा कर दी गई है कि यह  नियम  अप्रैल  २०१७ से पहले के सौदों पर लागू नहीं होंगे . अर्थात  नोट बंदी से छोटे सूटकेस   वालों को एक मौसम में हानि उठानी पड़ेगी, उसके  बाद से फिर वही सब दुबारा चालू हो जायगा.  इस प्रकार न तो नरेन्द्र मोदी सरकार और ना ही मन मोहन सिंह की सरकार ही काले धन को निकलवाने के बारे में गंभीर है .ये दोनों ही सरकारें     और उनकी पार्टियां पूंजीपति वर्गों को कोई तकलीफ देना तो दूर वह  इन्ही की प्रतिनिधि पार्टियां हैं और इन्ही के लाभ के लिए काम करती हैं .

 

१.   ऐसी दशा में हामारी  मांग यह है कि  १. सरकार जिन मजदूरों और उद्योगों की क्षति हुई है उनको तुरंत ही मुआवजा दे.उनकी समूची इस दौर का समूचा  वेतन  तथा उत्पादन को हुए नुक्सान की भार्पाये करे.

 

२. जिन किसानों को नकदी संकट  के कारण खरीफ बेचने में और रबी की फसल देरसे लगाने के कारण  जो नुक्सान हुआ है उसका मुआवजा  दे.

 

३. सभी स्थानों पर लंगर  खोल कर ऐसे  सभी लोगों को भोजन उपलब्ध कराये जो किसी प्रकार के सुरक्षा कवच अर्थात  सामजिक सुरक्षा की योजना के दायरे में नहीं आते हैं .४. इस बात का आंकलन करने के लिए इस नोट बंदी से कितनी हानि हुई है , एक विशाशाग्यों की कमेटी बनाई  जानी चाहिए जो इस रिपोर्ट को त्वरित आधार पर तैयार करके इस प्रस्तुत करे.

 

निवेदक : राम शंकर ,नवल कुमार मिश्रा ,कैलाश राजभर, सुश्री कुसुम ,श्रीमती आशा देवी,  सुश्री गीता , मनोज तिवारी , डॉ आर डी सिंह,  सतीश समुद्रे, सुजीत समुद्रे , विजय चावला ,

 

युवा  भारत  और इंडियन काउन्सिल  ऑफ ट्रेड यूनियंस

कानपूर जिला इकाई

एका अराजकतेतुन अधिक अराजकतेत….

हिटलरच्या प्रेमात मोठ्या प्रमाणात आपल्याकडे लोकं आहेत. डोकी गहाण ठेऊन एखाद्या मसिहाला समाजाच्या उद्धाराचे काँट्रँक्ट देण्याच्या प्रवृत्तीने हिटलर मोदींसारखे घटक उदयास येत असतात.   मसीहा हा माण…

Source: एका अराजकतेतुन अधिक अराजकतेत….

 पुरुषांनी आपली जात दाखवत स्री जातीवरती केलेल्या पाशवी अत्याचाराचा जाहीर निषेध.

 

कोपर्डी येथे एका अल्पवयीन मुलीवर (छकुली) सामुहिक बलात्कार करून तिची निर्घुण हत्या करण्यात आली. पुरुषसत्ताक व्यवस्थेचे वर्चस्व भारतीय समाजात वाढल्यापासून स्री जातीवरील अन्याय, अत्याचारात दिवसेंदिवस वाढ होत असतानाच त्यांचे स्वरूपही अत्यंत विकृत व अमानुष होताना दिसत आहे. स्री ही एक उपभोग्य वस्तू बनलेल्या समाजात ती उच्च शिक्षीत असो वा निरक्षर, व्यावसायिक असो वा कष्टकरी-कामगार-मजूर, बालिका असो वा वयोवृद्ध, अपंग, मतिमंद तरुणी असो वा आश्रम शाळेतील विद्यार्थिनी, तोकड्या कपड्यातील स्वतःला आधुनिक म्हणवणारी तरुणी असो वा पूर्ण अंग झाकून घेतलेली शालीन, कुलीन ठरवलेली पारंपरिक स्त्री यातील कुणीच पुरुषी शोषणापासून, हिंसाचारापासून मुक्त होऊ शकत नाहीत. घरात आणि घराच्या बाहेर लैंगिक अत्याचार, बलात्कार, हिंसाचार, अन्याय, भेदभाव व स्री म्हणून मिळणारी दुय्यमत्वाची वागणूक पदोपदी वाटयाला येत असल्याने स्त्रीचे जीवन असुरक्षित झाले आहे. त्याचीच परिणीती म्हणून आज आपण कोपर्डी येथील घटनेकडे पहिले पाहिजे.
भारतात इंग्रजांच्या काळात स्री प्रश्न हा येथील पुरुषांच्या आधुनिक व सुसंस्कृत असण्याचं परिमाण होता. स्वातंत्र्य आंदोलनानेही येथील ‘स्रीशूद्रातिशूद्र’ यांच्या मुक्तीच्या लढयाची परंपरा दुय्यम ठरविली. सर्व प्रकारच्या विषमतांना (स्री-पुरुष, गरीब-श्रीमंत, सवर्ण-अवर्ण, श्रेष्ठ-कनिष्ठ) नाकारणाऱ्या समतामुलक, मानवतावादी श्रमण- जैन, बौद्ध, महानुभाव, लिंगायत, सुफी, वारकरी परंपरांना छेद देणारी विषमतावादी ब्राह्मणी, भांडवली मूल्यव्यवस्था व जीवनशैली समाजावर लादली गेली. ही विषमतावादी मूल्ये प्रबळ होत असतानाच स्वातंत्र्योत्तर काळात झालेल्या विषम आर्थिक विकासाची किंमतही वरील शोषित-पिडीत घटकांनाच मोजावी लागली. त्याच काळात हरित क्रांती आणि सहकारातून गब्बर झालेले जमीनदार, कारखानदार आणि व्यावसायिक यांच्यामध्ये एक प्रकारचा अहंगंड निर्माण झालेला दिसतो. तसेच आपल्या समाजातील विषम सामाजिक-आर्थिक-राजकीय व्यवस्थेमुळे पराभूत मानसिकतेपोटी न्युनगंडात जगणारा एक वर्ग तयार झालेला आहे. अहंगंडातून येणारा माज व न्यूनगंडातून निर्माण होणारी असूया शेवटी कुठल्यातरी स्रीच्याच शरीराचा चावा घेऊन शमविली जाते. त्यात भर पडली आहे ती जागतिकीकरणातून आलेल्या किळसवाण्या उपभोगवादी, चंगळवादी मूल्यांची. प्रत्येक क्षणाचा पाशवी आनंद घेण्याच्या वृत्तीतूनही स्रीयांचे शोषण व अत्याचाराच्या घटना वाढत आहेत.
यवतमाळच्या प्रतिष्ठित शाळेतील शिक्षकांकडून बालिकांचे झालेले लैंगिक शोषण असो, चंद्रपुरात बालिकेवर झालेला बलात्कार, शासकीय वैद्यकीय अधिकारी डॉ. मनीषा महाजन यांचा आरोग्य मंत्र्याच्या स्वीय सहायकाने केलेला विनयभंग व त्यानंतरची दमदाटी या सर्व प्रकाराला वैतागून डॉ. महाजन यांनी केलेला आत्महत्येचा प्रयत्न असो, मंत्र्याकडून महिला अधिकाऱ्याचा छळ झाल्याचा नुकताच विधान परिषदेत झालेला आरोप. या सर्व घटना समाजातील स्त्रीचे जीवन असह्य होत असल्याचे निदर्शक आहे. स्रियांच्या स्वातंत्र्याच्या बाबतीत आपला समाज नेहमीच संकुचित व बीभत्स स्वरूप धारण करतो. आशा शिंदेचे किंवा कोल्हापूरच्या मेघाचे जोडीदार निवडणे असो वा खर्डा येथील प्रेमाचा बळी, निर्भयाच्या लैंगिक स्वातंत्र्यावर जबरदस्तीने घातलेला घाला असो वा कोपर्डी येथील छकुलीचे अस्तित्व नाकारणे असो यातून आपला पुरुषी समाज किती कामांध, हिंस्र व अमानुष आहे हेच दिसून आले आहे. वेगवेगळ्या जातीय वा धार्मिक दंगली असो तेथेही स्री चे शरीर हेच लढाईचे रणांगण ठरत असते.
कोपर्डी येथे घडलेली घटना ही संपूर्ण समाजमनाला हादरून टाकणारी आहे. येथे एका मुलीचा जीव गेला आहे आणि तिचा जीव घेणाऱ्या गुन्हेगारांना शिक्षा होऊन तिला न्याय मिळाला पाहिजे ही एक प्रामाणिक भावना आहे. आणि ही भावना समाजातील सगळ्या जात-वर्गातून तीव्रपणे व्यक्त होत आहे. परंतु तरीही या घटनेला संकुचित राजकीय उद्देशाने जातीय रंग दिला जात आहे. समाजामध्ये तेढ निर्माण करून मराठा विरुद्ध दलित अशी दुही निर्माण करण्याचा समाजविघातक प्रयत्न अशा लोकांकडून केला जात आहे. यामुळे हा वाद फक्त दोन्ही गटातील पुरुषांच्या पुरुषी सत्तासंबंधांच्या किंवा हितसंबंधांच्या छायेखाली झाकोळून जाऊन मुळचा स्री-प्रश्न मात्र बाजूला पडण्याचीच जास्त शक्यता आहे. स्वतंत्रपणे स्री-प्रश्नांना भिडण्याची ताकद भारतीय पुरुषांच्या अंगी असलेली दिसत नाही. सतत ते स्रियांच्या शरीराची ढाल करून आपले पुरुषी हितसंबंध जोपासत असतात. स्री दास्याच्या, स्री-शोषणाच्या कारण असलेल्या मूळ सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक व राजकीय संरचानाना कधीही प्रश्न विचारले जात नाहीत. त्यामुळे कडक कायदे झाले तरी स्रीयांवर अत्याचार होत आलेले आहेत आणि यापुढील काळातही होतील अशीच परिस्थिती आहे. कारण चालू असलेल्या या वादातून किंवा पुरुषी हितसंबंधांच्या चढाओढीतून निर्माण होणारी सुडाची भावना परत एकदा कुठल्यातरी स्रियांचे लचके तोडण्यातच समाधान मानणारी असते. म्हणून या सूड चक्राची पुढची बळी ‘मी तर नसेल ना’ किंवा ‘माझ्या कुटुंबातील स्त्री तर नसेल ना’ ही भीती आपल्या समाजमनावर सतत घोंगावत राहणार आहे.
अशा परिस्थितीत कोपर्डी येथील पीडित मुलीला खरा न्याय कोणता असेल तर तो यापुढील काळात कुठल्याही मुलीवर, आईवर, बहिणीवर अत्याचार होणार नाहीत असा समाज निर्माण करणे होय. त्यासाठी आपल्या समाजातील पुरुषसत्तेचा, पुरुषी मानसिकतेचा बिमोड करणे, कुठल्याही जात-वर्गातील घटकांमध्ये अहंगंड निर्माण होणार नाही किंवा ते न्यूनगंडाचे शिकार होणार नाहीत असा संतुलित आर्थिक-सामाजिक विकास घडवून आणणे, बाजारू व उपभोगवादी मूल्यांना विरोध करणे किंवा त्यांचा उच्छेद करणे गरजेचे आहे. स्री च्या व्यक्ती म्हणूनच्या स्वतंत्र अस्तित्वाचा मान राखला पाहिजे.

 मुळापासून स्री-प्रश्न सोडविला जावा अशी प्रबळ इच्छाशक्ती आजपर्यंत कुठल्याही राज्यकर्त्यांची नव्हती व आजही असलेली दिसत नाही. सरकारने एखादा कायदा केला तरी त्याच्या अंमलबजावणीचा प्रश्न आ वासून उभा असतोच. त्यामुळे आपल्या दृष्टीने महात्मा फुले, ताराबाई शिंदे, छत्रपती शाहूमहाराज व डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी स्रियांच्या मुक्तीसाठी प्रस्थापित सामाजिक-आर्थिक संरचनांविषयी जे प्रश्न उपस्थित केले तेच आज नव्याने उपस्थित करण्याची गरज आहे. स्री-पुरुष समतेसाठी व त्यांच्या सन्मानासाठी व्यक्तिगत व सामुहिक पातळीवरती प्रत्येक व्यक्तीने प्रयत्न करावेत असे आवाहन आपणा सर्वांना युवा भारत संघटनेकडून करण्यात येत आहे.

                (युवा भारत राज्य समिती  कडून जारी..)

विनोद भुजबळ ९५०३४८६०३३ सुरेश सोमकुवर ९७६६१२४५६१

IMG-20160704-WA0012

रोहीत वेमुलाच्या आत्महत्येचा अन्वयार्थ’ सदरील पुस्तक युवा भारत राज्य समिती महाराष्ट्र ने प्रकाशीत केले आहे.

जेएनयू पर हमले के निहितार्थ

रोहित की आत्महत्या के बाद पूरा देश इस आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या करार देते हत्यारों को दण्डित किये जाने की मांग को लेकर आंदोलित है. इसी बीच जेएनयू मे एक कार्यक्रम मे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाने की खबर आने के बाद जिस तरह केंद्र सरकार और सत्ताधारी पार्टी विवि कैंपस मे हस्तक्षेप कर रही है एवं बिना गहरी छानबीन के छात्रसंघ अध्यक्ष को राष्ट्रद्रोही करार दे चुकी है,इसे देखते हुए आंदोलित समुदाय के गुस्से में बेतहाशा वृद्धि हुयी है.
यूजीसी द्वारा फंड कट एवं नॉन-नेट स्कॉलरशिप का निर्णय आने के बाद उसके मुखर विरोध की शुरुआत भी इसी विवि से हुयी थी. आकुपाय यूजीसी के नाम से शुरू हुए इस आन्दोलन ने फेलोशिप से लेकर शिक्षा के निजीकरण एवं भगवाकरण के विरोध मे अपनी उपस्तिथी दर्ज करायी. नॉन नेट फेलोशिप एवं फंड कट के विरोध में देशभर के जो कँम्पस आंदोलित दिखे वह सभी कँम्पस रोहीत की आत्महत्या के मामले को लेकर मौजूदा सरकार के विरोध में संगठित होकर आंदोलनरत है ।सरकार को पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे दिए जाने की चिंता से ज्यादा छात्र समुदाय के फेलोशिप से लेकर दलित उत्पीडन के सवालो पर संगठित होने की चिंता है. हमारे प्रधानसेवक पूंजी के दबाव मे शरीफ साहब के साथ बिना तय कार्यक्रम के लंच पर चले जाते है एवं अफजल गुरु का समर्थन करनेवाली पार्टी के साथ कश्मीर मे उनकी पार्टी सत्तासुख मे लीन है. मेक इन इंडीया मे भारी निवेश की आशंका टूट चुक है.,पाटीदार आन्दोलन के बाद गुजरात विकास का गुब्बारा फूट गया है,पाटीदार से लेकर जाट अहमदाबाद से दिल्ली तक के इलाके के किसान समुदाय औद्योगिक विकास का गुब्बारा फूट जाने एवं कृषी के संकट में आने की वजह से आरक्षण की मांग को लेकर मौजूदा सरकार के नाक में दम कर रहा है. विश्व अर्थव्यवस्था २००८ के संकट से जल्द ही उभर पाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे है. आनन फानन में घोषित भूमि अधिग्रहण एवं श्रम सुधारो का निर्णय सरकार द्वारा घोषित किए जाने के बाद किसान एवं मजदूरों के बीच से एक असंतोष भी उभरा है. इन सब स्तिथियों के मद्देनजर मौजूदा सरकार का भयाक्रांत होना स्वाभाविक है. चारो तरफ उभर रहा असंतोष एवं विष अर्थव्यवस्था की मंदी के बीच फेलोशिप की मांग से शुरू हुआ आकुपाय यूजीसी आन्दोलन कही आकुपाय आल स्ट्रीट मे न परिणत हो जाए इसकी चिंता ज्यादा दिखती है. पूंजीवाद जब अपने संकट के दौर मे होता है एवं अलग अलग वर्गों द्वारा सत्ता के ऊपर जब सवालात खड़े किए जाने लगते है तब सत्ता फासीवादी ही हो सकती है. यह शासकवर्ग का चरित्र है,कांग्रेस या बीजेपी का नहीं.इंदिराजी का घोषित आपातकाल एवं मोदीजी के अघोषित आपातकाल मे आपको सांप्रदायिकता के उफान,अभिव्यक्ती का दमन जैसी बहुत कुछ समानताये इसलिए भी दिख सकती है.
दलित उत्पीडन के सवाल से दो हाथ कर रहे दलित पृष्टभूमि से आए छात्र रोहित द्वारा सत्ता को उसकी राष्ट्र की परिभाषा मे दलितों,अल्पसंख्यको,किसानो,मजदूरों का क्या स्थान होगा यह सवाल पूछना नागवार गुजरा एवं अभाविप नेता से लेकर केन्द्रीय मंत्री द्वारा बुने गए जाल ने रोहित की जान ली. इसी तरह का जाल अब जेएनयू के छात्रो के लिए बुना जा रहा है.
जेएनयू में अफजल गूरू की फासी की तीसरी बरसी पर गूरू की फासी को न्यायिक हत्या बताते हूए किए गए कार्यक्रम में पाकीस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये जाने की खबर है. यह नारे किन लोगो की तरफ से लगाए गए इसको लेकर अबतक कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आयी है.यह नारे अभाविप द्वारा लगाये जाने की खबरे भी है. अगर ऐसे नारे लगाये गए है तो उसका समर्थन कतई नही किया जाना चाहीए | पाकीस्तान का धर्माधारीत राष्ट्रवाद की वजह से जो हश्र हूआ है उसे देखते हूए मै इसका कतई समर्थन नही करता हु. विभिन्न भाषा,संस्कृती,राष्ट्रीयताओ वाले भारत देश मे धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने का सपना पाले हुए जो लोग हिन्दूस्थान जिंदाबाद करते रहते है उनको भी हिन्दुस्थान जिंदाबाद कहने से पहले पाकिस्तान का हश्र देख लेना चाहिए.भारत एक देश है,जिसमे विभिन्न राष्ट्रीयताए है,उनकी अपनी भाषा,संस्कृती और इतिहास है. इसके बावजूद भारत के सत्ताधारी वर्ग द्वारा एक भाषा एवं एक संस्कृती के नाम पर इन सबको एक राष्ट्रीयता मे ढालने का प्रयास रहा है. इस प्रयास के विरोध मे आसाम,कश्मीर,मणिपुर,नागालैंड आदी जगह संघर्ष जारी है. भारत को एक राष्ट्र मे ढालने की कोशिश के विरोध मे अपने स्वनिर्णय,स्वशासन के अधिकार को लेकर कोई भी भाषाई या सामाजिक समूह खड़ा होता है तो सत्ताधारी जमात उसका दमन करने मे कोई कसर नहीं छोड़ती.इस मामले मे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों के रवैये मे कोई खास फर्क नहीं है. एक सेकुलर राष्ट्रवादी है तो दूसरा धार्मिक राष्ट्रवादी. कांग्रेस के पुरे शासनकाल का अगर बारीकीसे अध्ययन किया जाए तो उनके लिए छद्म सेकुलर शब्द ज्यादा उपयोगी सिद्ध हो सकता है.
जेएनयू मे जो कार्यक्रम किया गया उसके केंद्र मे कश्मीर का मुद्दा था. भारत की एवं पाकिस्तान की स्वाधीनता के साथ ही कश्मीर की स्वाधीनता लूट ली गयी है. कश्मीरी अफजल गुरू को न्यायिक प्रक्रिया मे गड़बड़ी करते हुए यूपीए सरकार ने खुद को अपने प्रतिद्वंदी से ज्यादा राष्ट्रवादी सिद्ध करने के चक्कर मे एवं जनता मे राष्ट्रवादी भावनाओ को उबाल कर पुनः सत्ता मे लौटने के लिए फासी पर लटकाया था. कश्मीर के स्वनिर्णय का मुद्दा,वंहा की जनता की इच्छा,उनके अपने राष्ट्रवाद के मायने को दरकिनार कर पाकिस्तान जिंदाबाद या हिन्दुस्थान जिंदाबाद बुलंद करने से हम और आप राष्ट्रवादी जरूर हो सकते है लेकिन यह सब करने के लिए हमको या आपको दूसरो की राष्ट्रीयता की भावना का खून करने की इजाजत कैसे हो सकती है..?
राष्ट्रवादी भावनाओं को उछालकर दोनों देशो का सत्ताधारी वर्ग जनता के दमन की राजनीती करता रहा है. दोनों भी देश अपने यंहा की राष्ट्रीयताओ को दमन करने के मामले में कई भी कम नहीं है.खुद को राष्ट्रवादी कहलानेवाले राष्ट्रवादीयों को उनकी परिभाषा में मेहनतकश दलितो,बहूजनो,आदिवासी एवं महीलाओं का स्थान क्या है..? अलग-अलग भाषिक एवं वांशिक समूहों क्या अधिकार होंगे .? यह सवाल पूछा जाना चाहीए | साथ ही हम सबको मेहनतकश दलितो,बहूजनो,आदिवासी एवं महीलाओं की मूक्ती का रास्ता किस वैकल्पिक राष्ट्रवाद से होकर गूजरेगा इसकी चर्चा भी करनी चाहीए | राष्ट्रवाद सबंधी लढाई को सर्वहारा के इन्कलाब तक ले जाने की चूनौती को हमे स्वीकारना होगा तभी हम इस अघोषित आपातकाल का सामना कर पाएंगे |

मौजूदा सरकार द्वारा जेएनयू के छात्रो की अभिव्यक्ती को कूचलने के लिए उनपर राष्ट्रद्रोह का चार्ज लगाना निंदनिय है | रोहीत को भी सत्ताधारी वर्ग के द्वारा राष्ट्रविरोधी गतिविधीयों में सामील होने का ठप्पा लगाकर प्रताडीत कीया गया था | आत्महत्या के बाद राष्ट्रवाद की परिभाषा को चूनौती देने सें बचने वाली ताकतो के लिए जेएनयू की यह घटना एक बडी ताकीद है | लढाई सिर्फ सहीष्णूता या असहीष्णूता,दलित-गैरदलित के बीच की नही बल्की सत्ताधारी राष्ट्रवाद एवं जनता के राष्ट्रवाद के बीच की लढाई है |
– दयानंद कनकदंडे