Yuva Bharat Constitution (Hindi)

Yuva Bharat Constitution Hindi

जेएनयू पर हमले के निहितार्थ

रोहित की आत्महत्या के बाद पूरा देश इस आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या करार देते हत्यारों को दण्डित किये जाने की मांग को लेकर आंदोलित है. इसी बीच जेएनयू मे एक कार्यक्रम मे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाने की खबर आने के बाद जिस तरह केंद्र सरकार और सत्ताधारी पार्टी विवि कैंपस मे हस्तक्षेप कर रही है एवं बिना गहरी छानबीन के छात्रसंघ अध्यक्ष को राष्ट्रद्रोही करार दे चुकी है,इसे देखते हुए आंदोलित समुदाय के गुस्से में बेतहाशा वृद्धि हुयी है.
यूजीसी द्वारा फंड कट एवं नॉन-नेट स्कॉलरशिप का निर्णय आने के बाद उसके मुखर विरोध की शुरुआत भी इसी विवि से हुयी थी. आकुपाय यूजीसी के नाम से शुरू हुए इस आन्दोलन ने फेलोशिप से लेकर शिक्षा के निजीकरण एवं भगवाकरण के विरोध मे अपनी उपस्तिथी दर्ज करायी. नॉन नेट फेलोशिप एवं फंड कट के विरोध में देशभर के जो कँम्पस आंदोलित दिखे वह सभी कँम्पस रोहीत की आत्महत्या के मामले को लेकर मौजूदा सरकार के विरोध में संगठित होकर आंदोलनरत है ।सरकार को पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे दिए जाने की चिंता से ज्यादा छात्र समुदाय के फेलोशिप से लेकर दलित उत्पीडन के सवालो पर संगठित होने की चिंता है. हमारे प्रधानसेवक पूंजी के दबाव मे शरीफ साहब के साथ बिना तय कार्यक्रम के लंच पर चले जाते है एवं अफजल गुरु का समर्थन करनेवाली पार्टी के साथ कश्मीर मे उनकी पार्टी सत्तासुख मे लीन है. मेक इन इंडीया मे भारी निवेश की आशंका टूट चुक है.,पाटीदार आन्दोलन के बाद गुजरात विकास का गुब्बारा फूट गया है,पाटीदार से लेकर जाट अहमदाबाद से दिल्ली तक के इलाके के किसान समुदाय औद्योगिक विकास का गुब्बारा फूट जाने एवं कृषी के संकट में आने की वजह से आरक्षण की मांग को लेकर मौजूदा सरकार के नाक में दम कर रहा है. विश्व अर्थव्यवस्था २००८ के संकट से जल्द ही उभर पाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे है. आनन फानन में घोषित भूमि अधिग्रहण एवं श्रम सुधारो का निर्णय सरकार द्वारा घोषित किए जाने के बाद किसान एवं मजदूरों के बीच से एक असंतोष भी उभरा है. इन सब स्तिथियों के मद्देनजर मौजूदा सरकार का भयाक्रांत होना स्वाभाविक है. चारो तरफ उभर रहा असंतोष एवं विष अर्थव्यवस्था की मंदी के बीच फेलोशिप की मांग से शुरू हुआ आकुपाय यूजीसी आन्दोलन कही आकुपाय आल स्ट्रीट मे न परिणत हो जाए इसकी चिंता ज्यादा दिखती है. पूंजीवाद जब अपने संकट के दौर मे होता है एवं अलग अलग वर्गों द्वारा सत्ता के ऊपर जब सवालात खड़े किए जाने लगते है तब सत्ता फासीवादी ही हो सकती है. यह शासकवर्ग का चरित्र है,कांग्रेस या बीजेपी का नहीं.इंदिराजी का घोषित आपातकाल एवं मोदीजी के अघोषित आपातकाल मे आपको सांप्रदायिकता के उफान,अभिव्यक्ती का दमन जैसी बहुत कुछ समानताये इसलिए भी दिख सकती है.
दलित उत्पीडन के सवाल से दो हाथ कर रहे दलित पृष्टभूमि से आए छात्र रोहित द्वारा सत्ता को उसकी राष्ट्र की परिभाषा मे दलितों,अल्पसंख्यको,किसानो,मजदूरों का क्या स्थान होगा यह सवाल पूछना नागवार गुजरा एवं अभाविप नेता से लेकर केन्द्रीय मंत्री द्वारा बुने गए जाल ने रोहित की जान ली. इसी तरह का जाल अब जेएनयू के छात्रो के लिए बुना जा रहा है.
जेएनयू में अफजल गूरू की फासी की तीसरी बरसी पर गूरू की फासी को न्यायिक हत्या बताते हूए किए गए कार्यक्रम में पाकीस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये जाने की खबर है. यह नारे किन लोगो की तरफ से लगाए गए इसको लेकर अबतक कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आयी है.यह नारे अभाविप द्वारा लगाये जाने की खबरे भी है. अगर ऐसे नारे लगाये गए है तो उसका समर्थन कतई नही किया जाना चाहीए | पाकीस्तान का धर्माधारीत राष्ट्रवाद की वजह से जो हश्र हूआ है उसे देखते हूए मै इसका कतई समर्थन नही करता हु. विभिन्न भाषा,संस्कृती,राष्ट्रीयताओ वाले भारत देश मे धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने का सपना पाले हुए जो लोग हिन्दूस्थान जिंदाबाद करते रहते है उनको भी हिन्दुस्थान जिंदाबाद कहने से पहले पाकिस्तान का हश्र देख लेना चाहिए.भारत एक देश है,जिसमे विभिन्न राष्ट्रीयताए है,उनकी अपनी भाषा,संस्कृती और इतिहास है. इसके बावजूद भारत के सत्ताधारी वर्ग द्वारा एक भाषा एवं एक संस्कृती के नाम पर इन सबको एक राष्ट्रीयता मे ढालने का प्रयास रहा है. इस प्रयास के विरोध मे आसाम,कश्मीर,मणिपुर,नागालैंड आदी जगह संघर्ष जारी है. भारत को एक राष्ट्र मे ढालने की कोशिश के विरोध मे अपने स्वनिर्णय,स्वशासन के अधिकार को लेकर कोई भी भाषाई या सामाजिक समूह खड़ा होता है तो सत्ताधारी जमात उसका दमन करने मे कोई कसर नहीं छोड़ती.इस मामले मे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों के रवैये मे कोई खास फर्क नहीं है. एक सेकुलर राष्ट्रवादी है तो दूसरा धार्मिक राष्ट्रवादी. कांग्रेस के पुरे शासनकाल का अगर बारीकीसे अध्ययन किया जाए तो उनके लिए छद्म सेकुलर शब्द ज्यादा उपयोगी सिद्ध हो सकता है.
जेएनयू मे जो कार्यक्रम किया गया उसके केंद्र मे कश्मीर का मुद्दा था. भारत की एवं पाकिस्तान की स्वाधीनता के साथ ही कश्मीर की स्वाधीनता लूट ली गयी है. कश्मीरी अफजल गुरू को न्यायिक प्रक्रिया मे गड़बड़ी करते हुए यूपीए सरकार ने खुद को अपने प्रतिद्वंदी से ज्यादा राष्ट्रवादी सिद्ध करने के चक्कर मे एवं जनता मे राष्ट्रवादी भावनाओ को उबाल कर पुनः सत्ता मे लौटने के लिए फासी पर लटकाया था. कश्मीर के स्वनिर्णय का मुद्दा,वंहा की जनता की इच्छा,उनके अपने राष्ट्रवाद के मायने को दरकिनार कर पाकिस्तान जिंदाबाद या हिन्दुस्थान जिंदाबाद बुलंद करने से हम और आप राष्ट्रवादी जरूर हो सकते है लेकिन यह सब करने के लिए हमको या आपको दूसरो की राष्ट्रीयता की भावना का खून करने की इजाजत कैसे हो सकती है..?
राष्ट्रवादी भावनाओं को उछालकर दोनों देशो का सत्ताधारी वर्ग जनता के दमन की राजनीती करता रहा है. दोनों भी देश अपने यंहा की राष्ट्रीयताओ को दमन करने के मामले में कई भी कम नहीं है.खुद को राष्ट्रवादी कहलानेवाले राष्ट्रवादीयों को उनकी परिभाषा में मेहनतकश दलितो,बहूजनो,आदिवासी एवं महीलाओं का स्थान क्या है..? अलग-अलग भाषिक एवं वांशिक समूहों क्या अधिकार होंगे .? यह सवाल पूछा जाना चाहीए | साथ ही हम सबको मेहनतकश दलितो,बहूजनो,आदिवासी एवं महीलाओं की मूक्ती का रास्ता किस वैकल्पिक राष्ट्रवाद से होकर गूजरेगा इसकी चर्चा भी करनी चाहीए | राष्ट्रवाद सबंधी लढाई को सर्वहारा के इन्कलाब तक ले जाने की चूनौती को हमे स्वीकारना होगा तभी हम इस अघोषित आपातकाल का सामना कर पाएंगे |

मौजूदा सरकार द्वारा जेएनयू के छात्रो की अभिव्यक्ती को कूचलने के लिए उनपर राष्ट्रद्रोह का चार्ज लगाना निंदनिय है | रोहीत को भी सत्ताधारी वर्ग के द्वारा राष्ट्रविरोधी गतिविधीयों में सामील होने का ठप्पा लगाकर प्रताडीत कीया गया था | आत्महत्या के बाद राष्ट्रवाद की परिभाषा को चूनौती देने सें बचने वाली ताकतो के लिए जेएनयू की यह घटना एक बडी ताकीद है | लढाई सिर्फ सहीष्णूता या असहीष्णूता,दलित-गैरदलित के बीच की नही बल्की सत्ताधारी राष्ट्रवाद एवं जनता के राष्ट्रवाद के बीच की लढाई है |
– दयानंद कनकदंडे

       रोहीत वेमूल्लाकी आत्महत्या के मायने क्या है ..?

रोहीत वेमूल्लाकी आत्महत्या के मायने क्या है ..?
– दयानंद कनकदंडे

हैद्राबाद केंद्रिय विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहीत वेमूल्ला की
आत्महत्या के बाद देश के कोने-कोने से,चंद्रपूर से मूंबई, पूणे से चेन्नई, हैद्राबाद
से दिल्ली तक एक जनाक्रोश सडको पर उतरा है । नॉन नेट फेलोशिप एवं फंड
कट के विरोध में देशभर के जो कँम्पस आंदोलित दिखे वह सभी कँम्पस रोहीत की
आत्महत्या के मामले को लेकर मौजूदा सरकार के विरोध संगठित होकर
आंदोलनरत है । रोहीत के दलित होने की वजह से एवं मौजूदा सरकार जिस
पार्टी की है,उसका दलितविरोधी चरीत्र देखते हूए यह मूद्दा मोटे तौर दलित
उत्पीडन के तौर पर समाज में अपनी जगह ले रहा है ।
देशभर के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानो में नजदिकी समय में छात्रो
द्वारा आत्महत्यांओ की घटनाए सामने आ रही है । संस्थानो के भीतर के जातिवादी
माहौल,फीस में बढौत्तरी,शिक्षा के कर्ज को न चूका पाने से लेकर रोजगार के
क्षेत्र में निर्मित असूरक्षितताओं की वजह से आत्महत्या का रास्ता चूना है । रोहीत
की घटना के कूछ दिनों बाद ही तमिलनाडू के सलेम मेडीकल कॉलेज की छात्रा-
ओं की आत्महत्या का मामला भी सामने आ चूका है। साथ ही जातिवादी माहौल
से त्रस्त छात्रो की आत्महत्याओं के मामलो पर भी रोशनी पडने लगी है ।
रोहीत की आत्महत्या का कारण तणाव (Depression) होने की बात
भी इसी बीच कही जा रही है । जो लोग यह बात कह रहे है वह लोग तनाव को
निर्मित करनेवाले आर्थिक, सामाजिक, राजनीतीक कारणों के उपर से ध्यान हटाना
चाहते है । कोई भी व्यक्ती अपने जीवन में आत्यंतिक बेगानेपण (Alienation)
को महसूस करता है एवं असूरक्षितता को छेदने का रास्ता नही पाता है तो आत्म-
हत्या को आखरी रास्ते के रूप में पाता है । किसी उत्पीडीत आम द्वारा ऐसे
कीए जाने की घटना,बीते दशकभर लाखो किसांनो द्वारा कृषि संकट से नि-
र्मित जीवन के खालीपण को मरने की अर्थपूर्णता से भरने का प्रयास कोई विरोध
का हथियार नही है,बल्की हताशा का सामूहीकता में बदल जाना है । आजकल
बडी संख्या में हो रही छात्र आत्महत्याएं भी इसीकी कडी तो नही । हताशा का
आत्महत्याओं जैसी सामूहीक परिघटना में बदल जाना बेगानेपण,मानवी जीवन में
निर्मित खालीपन को जिम्मेवार व्यवस्था के विरोध में समग्रता लढाई खडी करने
की मॉंग करता है ।
शैक्षणिक संस्थानो में जातिवाद और द्वेष भावनाओं का पूरा वातावरण है,
जिसकी वजह से दलित, आदिवासी, ओबीसी आदी बहूजन तबकों के विद्यार्थीयों
का जीवन मूश्किलो से भर जाता है । इन मूश्किलो के विरोध में लडने के साथ- साथ
अपनी सांस्कृतिक विरासत को आजके भौतिक सवालों के साथ जोडकर उठाने
का चलन आजकल शिक्षा संस्थानो में बढ रहा है । आयआयटी चेन्नई से लेकर
हैद्राबाद की आंबेडकर स्टूडंटस असोसिएशन गतिविधीया इसके प्रमाण कहे
जा सकते है ।
रोहीत एवं उसका संगठन कँम्पस में हो रहे दलित छात्रो के उत्पीडन को
लेकर लगातार आवाजे उठाता रहा है । याकूब मेमन की  फासी को आजीवन कारावास
में बदलने की इस संगठन की मॉंग रही है । देशभर में उठ रहे गोमांस खाने या
न खाने की बहस के बीच यह समूह खाना चूनने की आजादी के पक्ष में रहा है ।
मूजफ्फरनगर दंगा पीडीतो के प्रति अपनी जाहीर संवेदना व्यक्त कर चूका है ।
१६ जनवरी २०१६ को रोहीत द्वारा आत्महत्या करने के १२-१३ दिन पूर्व
रोहीत सहीत ५ दलित छात्रो को यूनिव्हर्सिटी हॉस्टल से राष्ट्रविरोधी गतिविधीयों में
संलिप्त होने का कारण देकर निष्कासित कीया गया था । यह सभी छात्र उस दिन
सें आसमान के नीचे बसेरा करने को मजबूर थे । पिछले कूछ महीनो से रोहीत
आर्थिक तंगी का सामना कर रहे थे । उनको मिलनेवाली फेलोशिप को रोका गया था,जो
१.७५ लाख रूपये थी । इस बीच उन्हे अपनी जीवीका चलाने के लिए ४०,०००
रूपये का कर्जा भी दोस्त की तरफ से लेना पडा था । अपने एवं साथीयों
के उत्पीडन के विरोध में लडनेवाले एवं राष्ट्रविरोधी ठहराए जाने का दंश
झेल रहे रोहीत ने चारो तरफ से असूरक्षितता से घेरे जाने के बीच आत्महत्या
कर ली । अपने द्वारा लिखे गए सूसायडल नोट में जीवन मेें निर्मित रिक्तताओं से
उब जाने की ओर इशारा किया है ।  रोहीत द्वारा मौजूदा सरकार की नीतीयों
के खिलाफ बोलना भाजपा के लिए नागवार गूजरा एवं उसके छात्र संगठन के
नेता से लेकर मानव संसाधन विकास मंत्री द्वारा बिछाए गए जाल ने उसकी जान ली.।
रोहीतकी आत्महत्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष  दलित उत्पीडन  है और
यह व्यवस्था जो की दलितविरोधी है उसका मूखर विरोध किया जाना चाहीए |
रोहीत याकूब से लेकर मूजफ्फरनगर तक के विषयोपर अपनी राय रखने के
कारण जिस तरह से राष्ट्रविरोधी करार दिया गया है,उस व्यवस्था को उसकी
राष्ट्र की अवधारणा में विभिन्न धर्मीय दलितो,बहूजनो,आदिवासीयों का,किसान मजदूरो
की क्या हैसियत होगी..? यह सवाल भी पूछा जाना चाहीए | अखलाक की हत्या,किसानों
की आत्महत्याओं के लिए जिम्मेवार मौजूदा व्यवस्था दलितविरोधी, किसानविरोधी एवं
मजदूर विरोधी भी है,इसलिए मौजूदा सरकार को सिर्फ दलितविरोधी कहना
सरकार के अपराधोंको कम करने ऑंकने जैसा है |
आज की जो दलित राजनीती है वह मूख्यत: पहचान की राजनीती
तक सीमीत हो गयी है उसे सत्ताधारी जाती-वर्ग द्वारा समरसता की धारा में घोल
लिया गया है | भारत का जो वामपंथ है वह भी अपनी जातीसबंधी भूमिका
को लेकर अपनी अधिकारीक  लाइन में किसी भी तरह का परीवर्तन किए बिना
दलित पहचान की राजनीती करनें मे जूटा हूआ दिखता है,यह एक प्रकार की
वाम समरसता है |   रोहीत दलितों के बीच के नये वर्ग का प्रतिनिधी है | रोहीत की यात्रा अभाविप से एएसए व्हाया एसएफआय रही है| रोहीत की एएसएमार्का दलित राजनीती दक्षिणपंथी समरसता एवं वामपंथी समरसता इस सीमांओ को तोडने का प्रयास था | इसलिए वह याकूब से लेकर मूजफ्फरनगर पर कूछ कहने की कोशिश कर रहा था |
पूर्ववर्ती कॉंग्रेसी सरकार की जनविरोधी की नीतीयों के जवाब में जनता ने मौजूदा सरकार का चूनाव किया है | बीच के समय में सभी जातीयों  से उपजी नयी पीढी जिसे कूछ लोग नये वर्ग के उदय के रूप में चिन्हीत करते हूए नवसर्वहारा कहना
पसंद करते है; ने इसे सत्तासीन करने मे मूख्य भूमिका
निभायी थी | फेलोशिप बंद करने,अपात्र व्यक्तीयों की संस्थानो में नियूक्ती
करने,अभिव्यक्ती की आजादी कूचलने के निर्णय आने के बाद आयआयटी चेन्नई से लेकर हैद्राबाद तक फूटा इस वर्ग का असंतोष अगर मजदूरो, किसानो,महीलाओं,
दलितो की असूरक्षितताओं के साथ मिलकर संगठीत रूप में मौजूदा व्यवस्था
के विरोध में खडा नही होता है तो, यह असंतोष शासकवर्ग की इस या उस
पार्टी की सत्तास्थापना में सहाय्यकारी हो जाएगा |
देशभर में खडे हो रहे छात्र आंदोलन  के दरमियान रोहीत वेमूल्ला
की आत्महत्या ने हमको इन सब चीजों पर सोचने को मजबूर किया है | महाराष्ट्र में शाहीर विलास घोगरे ने १९९७ मे रमाबाई नगर गोलीबारी के बाद आहत होकर आत्महत्या की थी | रोहीत की आत्महत्या का नाता मै उससे जोडना चाहूंगा और यह आशा करना चाहूंगा की,
रोहीत के आत्महत्या के बाद अपने अंदर झॉंके | रोहीत की आत्महत्या से दू:खी होने के बावजूद हमें एकजूट होकर लढना चाहीए एवं आत्महत्या के प्रतिरोध के हथियार
के रूप में बदलने के खिलाफ हमें जूट जाना चाहीए | रोहीत एक कार्यकर्ता
था और मै मानता हूँ की, मैने जिन सवालो की चर्चा करने की कोशिश की है उससे
उसका सरोकार था |

(लेखक छात्र-यूवा संगठन यूवा भारत के अ.भा.समन्वयक है)

Occupy UGC ! Occupy Wallstreet ! Occupy All street !

ऑक्यूपाय युजीसी ! ऑक्यूपाय वालस्ट्रीट ! ऑक्यूपाय आल स्ट्रीट !

– दयानंद कनकदंडे
– Dayanandk77@gmail.com
नॉन-नेट स्कॉलरशिप के दुरुपयोग एवं अपारदर्शिता का कारण देकर युजीसी द्वारा स्कॉलरशिप को खत्म करने कि घोषणा के बाद ही दिल्ली के केंद्रीय विश्वविद्यालयो के छात्रो का गुस्सा इस निर्णय के विरोध मे फूट पडा .. फंड कट एवं नॉन नेट फेलोशिप खत्म करणे के निर्णय के विरोध में युजीसी दफ्तर का घेराव करते हुये occupy UGC आंदोलन शुरू हुआ और इस निर्णय को वापस लेने,फेलोशिप कि रक्कम बढाने एवं इस योजना का राज्य के विश्वविद्यालयो में विस्तार करणे कि मांगो के साथ यह आंदोलन पुलीस द्वारा बारबार पीटे जाने,पुलिस हिरासत में रखे जाने के बावजुद दिल्ली से निकलकर भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयो में फैलने लगा है ..
पिछले साल भर मे कलकत्ता,चेन्नई,पुणे और अब दिल्ली जैसे महानगरो मे रह्नेवालो छात्रो के गुस्सो का इजहार ऐसे अनेको मौको पर दिखायी पडा है लेकीन कोई भी असंतोष शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलावो को लेकर समग्रता के साथ अपनी बात रखणे में नाकामयाब सा दिखायी पडा है,लेकीन इस आंदोलन और आंदोलन के दरमियान इसकी देशभर हुयी पहुंच को देखते हुये इस सवाल को बहस के केंद्र मे लाने का अवसर जरूर प्राप्त हुआ है.
१६ मई २०१५ के दिन मोदी के सत्ता पर आने की परीघटना एक राजनीतिक परीघटना है जिसने आर्थिक सुधारो का अधिकृत दक्षिणपंथी मोड लिया है.. वर्तमान सरकार शिक्षा को पुरी तरह से बाजार कि वस्तू बना देने के लिए कदम उठा रही है ,इसके विरोध मे जरूर लढना चाहिये लेकीन यह भी नही भूलना चाहिए कि,यूपीए १ के दौरान जो आर्थिक सुधार हुए जिसमे जमीन हथियाने के लिए बदनाम सेज कानून भी है, उसके लिए वाम मोर्चा अपनी जिम्मेवारी से नही बच सकता. occupy UGC आंदोलन ने घोषणा कि है… Education not for sale .. शिक्षा बाजार कि वस्तू नही है .. यह ऐलान अपने आप मे बहुत ही सकारात्मक है लेकीन शिक्षा बाजार कि वस्तू नही है तो, फिर क्या है …? इस सवाल के जवाब को खोजे बिना हम आगे की राह को नही पकड सकते है .

विश्व व्यापार संगठण के साथ भारत ने देश की कृषि से लेकर शिक्षा सबको बाजार कि वस्तू बना देने का अनुबंध किया है. भारत द्वारा GAAT समझौते पार हस्ताक्षर किए जाने के बाद से ही कृषि से लेकर शिक्षा तक सभी चीजो को बाजार के लिए खोल देने का दबाव है.विश्व स्तर पर जितने भी देशो ने इस अनुबंध पर हस्ताक्षर किए है उन सभी को शिक्षा के क्षेत्र को बाजार के लिए खोल देने का दबाव है.ज्ञान का मतलब विश्वविद्यालयो मे दि जानेवाली शिक्षा के साथ साथ उससे भी व्यापक अर्थो मे ज्ञान को बाजार कि वस्तू बना देने कि बात है.. ऐसे प्रावधान भारत मे नजदीकी समय में अंमल मे लाये जायेंगे तब छात्र ग्राहको के रूप मे तब्दील हो जायेंगे और विश्वविद्यालय मॉल मे. युजीसी द्वारा लिया गया फंड कट का निर्णय इसकी झलक भर है.
भारत के संदर्भ मे इसका दूरगामी असर दलित,बहुजन,आदिवासी एवं स्त्री शिक्षा पर होगा. आधुनिक काल मे महात्मा फुले,सावित्रीबाई फुले से लेकर डॉ.आंबेडकरजी के संघर्ष परिणामस्वरूप शिक्षा के क्षेत्र मे इन तबको का प्रवेश सुनिच्छित हो सका था. साथ ही विश्व स्तर पर रशियन क्रांती कि वजह से मिली मेहनतकश चुनौती कि वजह से पुंजीवाद को कल्याणकारी राज्य को चलाना आवश्यक हो गया था. उच्च शिक्षा,संशोधन आदी के क्षेत्र मे अभिजनो कि दादागिरी रही है. कल्याणकारी राज्य के वजूद में होने कि वजह से आरक्षण से लेकर फेलोशिप जैसे सकारात्मक प्रयासो कि वजह से दलित,बहुजन और महिलावर्ग कि दखल इस क्षेत्र में बढ रही थी, उसमे अब अवरोध खडे हो जायेंगे और उन्हे इस क्षेत्र से खदेडा जायेगा. पूंजी का स्वाभाविक चरित्र है लाभ का विस्तार. लाभ की रक्षा व बढोतरी के लिए एक संगठित शिक्षा-माफिया पनप रहा है. शिक्षा के सार्वजनिक ढांचे के अभाव में इसकी शक्ति की दाब-धौंस में नौनिहालों से लेकर विज्ञान-तकनीक, मेडिकल-इंजीनियरिंग व प्रबंधन की उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र-अभिभावक लाचार महसूस कर रहे है. स्वतंत्रता के बाद कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना के अन्तर्गत शिक्षा के सार्वजनिक ढांचे का जिस गति से विस्तार हुआ था, उसे वैश्वीकरण के दौर में राज्य ने अपनी कल्याणकारिता की केंचुली को उतार फेका है. इसलिये अब उसके सामाजिक शास्त्र के शोध में पुंजी व्यय करणा अनिवार्य सा नही रह गया है.. वैश्वीकरण के इस दौर मे जनता कि संघठीत चुनौती दृश्यमान नही होने से वह तेजगति से सबको कुचल रहा है.इसके विरोध मे अफ्रिका,अमरिका से लेकर भारत तक इसके विरोध मे संघर्ष खडे हो रहे है एवं Occupy Wallstreet से लेकर occupy UGC के नारो के तहत संघठीत हो रहे है ,इसे Occupy All Street तक ले जाने कि जरूरत है. यही संघर्ष सबको समान शिक्षा,भोजन,आजीविका दे सकनेवाले राज्य को लाने कि दिशा में जायेगा.

ऑक्यूपाय युजीसी @ सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय,पुणे.
ऑक्यूपाय युजीसी कॉ-ओर्डीनेशन कमिटी द्वारा ९ दिसंबर को २०१५ को ऑक्यूपाय युजीसी आंदोलन स्थल से संसद भवन तक अ.भा. मोर्चा निकाला गया. मोर्चे को संसद भवन से पहले ही रोकते हुये दिल्ली पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज किया गया. यह मोर्चा युजीसी द्वारा लिए गये नॉन नेट फेलोशिप रद्द करणे के निर्णय को वापस लेने, फेलोशिप कि रक्कम बढाने एवं इस योजना का राज्य के विश्वविद्यालयो में विस्तार करणे, विश्व व्यापार संगठन कि वार्ता से बाहर निकलने एवं १०प्रतिशत शिक्षा पार खर्च करणे कि मांग को लेकर निकाला गया था. इस मोर्चे में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालओ के छात्र-छात्राओ,विभिन्न छात्र संगठनो के साथ युवा भारत के कार्यकर्ताओ ने भाग लिया. मोर्चे पर हुये बर्बर लाठीचार्ज के विरोध एवं ऑक्यूपाय युजीसी के समर्थन मे सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के प्रवेशद्वार पर विभिन्न छात्र-युवा संगठनो कि तरफ से एकजुटता प्रदर्शन किया गया. इस प्रदर्शन मे नव समाजवादी पर्याय,युवा भारत, लोकायत, आईसा,एसएफआई,डाप्सा के साथी शारेक हुए. प्रदर्शन के बाद युजीसी के क्षेत्रीय कार्यालय,पुणे के माध्यम से मानव संसाधन विकास मंत्रालय को ज्ञापन प्रेषित किया गया.

आंतरजातीय प्रेमविवाह करणाऱ्या जोडप्याच्या कोल्हापूरात घडलेल्या हत्येच्या घटनेचा जाहीर निषेध : यूवा भारत(महाराष्ट्र)

 

आंतरजातीय प्रेमविवाह करणाऱ्या जोडप्याच्या कोल्हापूरात घडलेल्या हत्येच्या घटनेचा युवा भारत संघटना जाहिर तीव्र निषेध करत आहे .

इंद्रजित कुलकर्णी आणि मेघा पाटील या आंतरजातीय प्रेमविवाह करणाऱ्या नवदांम्पत्याचा खून मुलीच्या भावांनी केला. त्या दोघा भावंडांनी सांगितले की बहीणीने बाहेरच्या जातीत लग्न केल्यामुळे शेजारीपाजारी आणि नातेवाईक डिवचत होते , हिनवत होते म्हणून आम्ही खून केला.
तुमच्या घरातील स्त्रीला तुम्हाला नियंत्रणात ठेवता आले पाहिजे, स्त्रियांनी स्वतंत्र विचार करू नये , समाजाची संस्कृती ( जातीची ) व आई वडीलांच्या अपेक्षांचे उल्लंघन करू नये अशी शिकवण देणाऱ्या पुरूषसत्ताक व्यवस्थेचे गोडवे गाणाऱ्यांना वर्तमानातील समाजात महत्व प्राप्त होत आहे . अशा समाजात बुरसटलेल्या मागास विचारांना झिडकारून प्रेम करणे व स्वतःचा जीवन साथीदार निवडून व्यक्ती स्वातंत्र्याचा आनंद घेणे हे येथील समाज व्यवस्थेला रूचणारच नाही .
आपल्याकडे स्री हि शुद्रातिशुद्र मानली जाते त्यामूळे तिच्याकडे व्यक्ती म्हणून न बघता विद्यमान सत्तासबंध अबाधित ठेवण्याकरीताचे एक साधन म्हणून तिच्याकडे पाहीले जाते. तसेच ती पुरुषत्व सिद्ध करण्याच एक साधन असते. स्री ही घरातील पुरुषांच्या किती नियंत्रणात (धाकात) आहे यावरून समाजात त्या घरातील पुरुषांचे पुरुषत्व ठरत असते. सर्व बाजूंनी पुरुषाची बंदिस्त असणे (बोलणे, बसणे, नेसणे, हसणे, खाणे, पिणे, फिरणे, प्रेम करणे, जोडीदार निवडणे- नाकारणे) ही स्री शूद्र असण्याची लक्षणे आहेत. ती पुरूषसत्ताक मूल्ये मानत असेल तर पूजनीय ठरते व स्वनिर्णयाचा अधिकार मागत असेल तर खलनायक. या अपराधाची शिक्षा कधी बलात्कार तर कधी खून असू शकतो.
एकीकडे जातीचे भौतिक आधार गळून पडत असताना जात संपत जाते आहे असे वाटते तर विद्यमान व्यवस्थेत माणसाचे जगणे अस्थिर व असुरक्षित झाल्यामुळे माणसाला आभासी असणाऱ्या जात या संकल्पनेवर उभ्या राहिलेल्या जातीच्या संघटनेचा आसरा हवाहवासा वाटू लागला आहे. दुसऱ्या बाजूला प्रत्येक जातीच्या संघटना बनविण्याच्या प्रयत्नाला आलेला वेग आणि वाढत जाणारी जातीची अस्मिता याचा विचार करणे आवश्यक आहे. जातीत टिकून राहयचे असेल तर व्यक्तीगत व कौटुंबिक पातळीवर लैंगिक सामाजिक व्यवहारात विषमता पाळावी लागेल ह्या पुर्वअटीचे पालन करावे लागते .
इंद्रजित कुलकर्णी आणि मेघा पाटील यांच्या हत्येतून उपस्थित होणारा प्रश्न म्हणजे आजपर्यंत अनुलोम प्रकारच्या विवाहात मुलाकडचे लोक विरोध करताना दिसत परंतु याप्रकरणात मुलीच्या भावांनी दोघांचा खून केला. जातीची मानसिकता कायम ठेवून पुर्वी आंतरजातीय विवाह करताना किमान उच्च जातीच्या जवळ जाण्यासाठी खालच्या जातवर्गाने केलेला प्रयत्न असे समजून विवाह स्वीकाहार्य ठरत होते. याप्रकरणातून उच्च जातीयसुध्दा नातेसबंध नको असे दिसून येते. समाजातील वाढलेल्या जातीय अस्मितेचे कर्मठ व हिंसक स्वरूप तर पुढे येत आहे काय? असा विचार होणे गरजेचा ठरतोय. या खूनासाठी फक्त जातीय अस्मिता कारणीभूत नसून शेजाऱ्यांच्या सततच्या डिवचण्यातून त्या भावांच्या मर्दानगीवर उठणाऱ्या प्रश्नांना व सहन कराव्या लागणाऱ्या भावनिक आणि सामाजिक कुचंबणा यामुळे दिलेली हिंसक प्रतिक्रिया आहे.

या दोघांच्या हत्येला मेघाच्या भावांइतकाच इथला समाज जो जातीय व पुरूषीव्यवस्था टिकवण्याचा प्रयत्न करतोय असे सर्वजण जबाबदार आहेत. यासर्वांचा आपल्याला निषेध करावा लागेल …

हे पत्र युवा भारत ( महाराष्ट्र ) यांचे कडून राज्य संयोजक विनोद भुजबळ व डॉ. सुरेश सोमकुंवर यांनी जारी केले आहे .

असहिष्णुता से आगे…….!

 

२०१४ में कांग्रेसविरोधी त्सुनामी पर सवार होकर अच्छे दिनों के सब्जबाग दिखाते हुए सत्तासीन हुयी सरकार इस मोर्चे पर कुछ भी नहीं कर पायी है .. हालाँकि कॉर्पोरेट हितो को सर्वोपरी रखते हुए उसने पिछले डेढ़ साल में जिस तरह से नीतीयो को बदला है वह काबिले तारीफ है.. इससे न मध्यवर्ग से उच्चमध्यवर्ग में जाने को आतुर लोग खुश है न झुग्गी से निकलकर फ्लैट में जाने को आतुर गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोग..उल्टा जीवनावश्यक चीजो के दाम जिस तरह बढे है उसने लोगो को “लौटा तो वह बुरे दिन” कहने को मजबूर किया है… कुछ दिन पहले आये गुजरात पंचायत चुनावों के नतीजे कहने को भाजपा के पक्ष में है लेकिन कांग्रेस की वापसी भी उसकी नीद बिघाडनेवाली है..प्रधानमंत्री के गृह जिल्हे मेहसाना में भी भाजपा को पराभव का सामना करना पड़ा है..पाटीदार आरक्षण आन्दोलन भी इसी  जगह से शुरू हुआ था.. हो सकता है,पाटीदार आन्दोलन ने कांग्रेस की वापसी में भूमिका निभायी हो लेकिन ही वाइब्रेंट गुजरात के गुब्बारे को जरूर फोड़ा है.. मोदी दुनियाभर में सस्ते संसाधनों एवं सस्ते श्रम के उपलब्धी की गारंटी देते हुए घूम रहे है लेकिन आज की तारिख तक दुनिया २००८ के आर्थिक संकट से उभरी नहीं है..अमरीका,यूरोप,चायना सभी गर्त में फसे हुए है.. ज्यादा से ज्यादा निवेश को आकर्षित करने के लिए जितनी बेरहमी  से मोदी ने अपना बुलडोजर चलाना प्रारंभ किया है उसके असंतोष की अभिव्यक्ती के रूप में भी इन चीजो को देखा जाना चाहिए..

मई २०१४ में मीली करारी जीत के बाद पिछले सालभर में हुए विधानसभा चुनावों में दिल्ली एवं बिहार में उतनी ही करारी हार का सामना भाजपा को करना पड़ा है.. लोकसभा चुनावों के परीणामो ने इस बात पर मुहर लगा दि थी की,मंडलवाद की राजनीती के सहारे ही मोदी सता के शीर्ष पर पहुंचे थे.. दरमियान के वर्षोँ में समता की राजनीती को समरसता में बदलकर संघ ने ओबीसी चेहरे को आगे बढाया था.. वही समता की राजनीती से आगे आये मंडलवादी लालू नीतीश साम्प्रदायिकता की राह पर चल पड़े थे .. मेरी पीढी के मतदाताओ को  मोदी की विकास की गुहार अपने विकास की गुहार लगी थी इसलिए उन्होंने इतिहास की परवाह किए बगैर वर्तमान के प्रचार के पक्ष में मत दिया… साल-डेढ़ साल के सरकार के वर्तन एवं उससे देशभर में उपजी असहिष्णुता के मद्देनजर बिहार में मंडल पार्ट-२ की स्क्रिप्ट लिखने का काम किया.. इस स्क्रिप्ट को आवाज देने में लालू कामयाब हुए तो चेहरा देने में नीतीश..पुरे चुनाव की बहस में कमंडल विरोधी मंडल की बहस जोरोसे थी विकास की बहस कही भी नहीं.. बीसवी सदी पूंजीवाद के विकास की सदी के साथ साथ समाजवाद निर्माण की ओर अग्रसर मेहनतकश जनता के प्रयासों की भी रही है.. रशियन क्रांति एवं चीनी क्रांति के दबाव स्वरुप पूंजीवाद ने जो कल्याणकारी चेहरा ओढा था उसे उसने पीछले 20 सालो में मेहनतकश जनता की चुनौती के कमजोर पड़ने के फलस्वरूप फाड़ फेंका है.. ..इंदिराप्रणीत घोषित आपातकाल से लेकर आज के मोदीप्रणित अघोषित आपातकाल तक का काल इसका साक्ष्य है.इस दरमियान मेहनतकश जनता के अधिकारों का भारी संकुंचन हुआ है तथा जल जंगल जमीन की लूट बेतहाशा बढी है..

नीतीश की विकास की जो भाषा है, वह सभी जातियों में दरमियान के समय उपजे मध्यवर्ग के आकांक्षाओ की प्रतिनीधी भाषा है ..मनमोहन,मोदी,नीतीश इन सबके विकास की परिभाषा एक ही है.. सब उसी पूंजीवादी माडल की मोडलिंग करनेवाले अच्छे अभिनेता है लेकिन सामान्य मतदाता ने उन्हें कल्याणकारी राज्य की वापसी के भ्रम में अपनी हताशा से उबरने के लिए चुना है इसे भी याद रखना चाहिए..

कल्याणकारी राज्य के वापसी के भ्रम में केजरी या नीतीश को चुनने से हमें वर्तमान असहिष्णुता से थोड़ी राहत और बेरहमी से लुटे जाने में ढिलाई तो मिल सकती है लेकिन मुक्ती नहीं.. संसद के शीत सत्र में भाजपा का रवैया बिहार की हार के बाद सहिष्णु सा हो गया है.जीएसटी,रक्षा एवं अन्य क्षेत्रो में एफडीआई को लेकर कानून पास करवाने के लिए यह सहिष्णु रवैया अपनाया जा रहा है इसका सीधा अर्थ यह है की जमीन,पानी,प्राकृतिक संसाधन आजीविका का हक  छीनने की गती में ज्यादा परिवर्तन नहीं आनेवाला है.इसलिए चाहिए की हमें जल्द से जल्द राहत मिल जाने के भ्रम एवं लालू नीतीश के द्वारा हमारी लढाई लढे जाने के  भ्रम से निकलकर जमीन पर आने की जरूरत है..

_  दयानंद कनकदंडे

यूवा भारत,महाराष्ट्र चे ४ थे राज्य अधिवेशन संपन्न ..

संदिप कांबळे (अ.भा.समिती सदस्य,यूवा भारत) यांचा रिपोर्ट

युवा भारत संघटनेचे चौथे महाराष्ट्र राज्य अधिवेशन बोपोडी, पुणे येथे दि. २८ व २९ नोव्हेंबर २०१५ रोजी एकविसाव्या शतकातील तरूणाईची गोची या विषयावर पार पडले. अधिवेशनाचा उदघाटन कार्यक्रम मा. घनश्यामजी ( NHCPM राजस्थान ), मा. ज्योतीताई टिळेकर ( पिं. चिं. शहराध्यक्ष, सम्यक युवा मंच महिला आघाडी ) मा. विलास सोनवणे ( जेष्ठ राजकीय कार्यकर्ते व विचारवंत, संस्थापक सदस्य युवा भारत ) सुनील चौधरी ( जेष्ठ कार्यकर्ते युवा भारत, नागपूर ) यांच्या उपस्थितीत व दयानंद कनकदंडे ( अखिल भारत समन्वयक ) यांच्या अध्यक्षतेखाली संपन्न झाला . अधिवेशनाच्या सुरूवातीला प्रास्तविकपर भाषण वनराज शिंदे ( राज्य संयोजक महाराष्ट्र ) यांनी केले.
दोन दिवशीय अधिवेशनामध्ये एकूण चार सत्रात प्रमुख वक्त्यांनी विषयावर मांडणी करुन खुली चर्चा करण्यात आली.
१. शिक्षण व रोजगार – या विषयावर अॅड. भूषण पवार व डॉ. सुरेश सोमकुंवर
२. आमचे नातेसंबंध व रिलेशनशिप मधील गोची – किशोर मोरे व शशी सोनवणे
३. भाषेचा झालेला लोच्या व दुनिया भरचे न्यूनगंड – देवकुमार अहिरे व डॉ. दिपक पवार
४. चित्रपट, समाज व संस्कृती – मुक्ता सोनवणे, प्रशांत कांबळे, डॉ. बशारत अहमद
या सर्व वक्त्यांनी विषयावर मांडणी करून चर्चेत सहभाग घेतला.

अधिवेशनामध्ये खालील ठराव पारित करण्यात आले.

१) महाराष्ट्रातील दूष्काळी परिस्थितीवर पर्यायी उपाययोजना करण्याची मागणी करत आहे.
२) मराठी भाषेच्या विकासामध्ये महानूभाव आणि वारकरी संप्रदायाचे अमूल्य असे योगदान राहीले आहे. महानूभाव पंथ प्रवर्तक श्रीचक्रधर स्वामींनी १२ मार्च १२३४ रोजी आपले मराठी भाषेतील पहीले धर्म वचन ‘ येथ आलीया काही मरण असे’ उद्गारले तो दिवस मराठी भाषा गौरव दिवस म्हणून साजरा करण्याची घोषणा करीत आहे .
३) मराठी भाषा गौरव दिनी १२ मार्च २०१६ रोजी श्रीक्षेत्र रिद्धपूर अमरावती येथे दूसरे सकल साहीत्य सम्मेलन सर्वधर्मिय सर्वपंथीय सामाजिक परिषद व अ.भा.महानूभाव चिंतन परिषद व यूवा भारत संघटना यांचे वतीने घेण्याची घोषणा करीत आहे.
४) शासन प्रशासनाच्या क्षेत्रात मराठी वापराचे धोरण राबविण्याची, किमान प्राथमिक शिक्षण मातृभाषेेतून शिक्षण देण्याची व रिद्धपूर अमरावती येथे मराठी भाषा विद्यापीठ स्थापन करण्याची मागणी करीत आहे
५) हरियाना राज्यातील दलित हत्याकांडाचा व देशभर वाढत चाललेल्या अल्पसंख्यांक व दलितांवरील हल्ल्यांचा निषेध करत आहे.
६) पॅरिस येथील दहशतवादी हल्यात मारल्या गेलेल्या सर्वांशी हे अधिवेशन आपल्या संवेदना व्यक्त करते. दहशतवादविरोधी यूद्धाच्या नावाखाली जगभर साम्राज्यवादी शक्तीनी जे यूद्ध चालविले आहे त्याविरोधात आणि जल,जंगल जमीन व भाषा यावरील अधिकारासाठीच्या कूर्दिश जनतेच्या लढ्यास आपला पाठींबा व्यक्त करते.
७) खाण्याच्या अधिकारावर नियंत्रण आणणाऱ्या धोरणाचा निषेध करत आहे.
इत्यादी ठराव यूवा भारतच्या २८,२९ नोव्हेबर २०१५ रोजी पुण्यात संपन्न झालेल्या युवा भारतच्या चौथ्या राज्यस्तरीय अधिवेशनात पारीत करण्यात आले.

FTI व occupy UGC या विद्यार्थ्यांच्या आंदोलनाला पाठींबा व्यक्त करण्यात आला. देशभरात वाढत चाललेल्या एकूणच राजकीय आणि सामाजिक असहीष्णूतेच्या बाबत गंभीर चिंता व्यक्त करण्यात आली. समाजाच्या पातळीवर जी अभिव्यक्तीची कोंडी निर्मान झाली आहे. त्याविरोधात लढण्याचा निर्धार या अधिवेशनात व्यक्त करण्यात आला. मराठी भाषा गौरव दिनी १२ मार्च २०१६ रोजी श्रीक्षेत्र रिद्धपूर अमरावती येथे दूसरे सकल साहित्य सम्मेलन सर्वधर्मिय सर्वपंथीय सामाजिक परिषद व अ.भा.महानूभाव चिंतन परिषद व युवा भारत संघटना यांचे वतीने घेण्याची घोषणा ही यावेळी करण्यात आली.
सन २०१५ -२०१७ दोन वर्षाच्या कालावधीकरिता राज्य समिती गठीत करण्यात आली. राज्य समिती सदस्य म्हणून देवकुमार अहिरे, अॅड. भूषण पवार, प्रमोद घनवट, अमोल कांबळे, दिपक वाघाडे, अमोल गवळी यांची सर्वानुमते निवड करण्यात आली तर विनोद भूजबळ आणि डॉ. सूरेश सोमकूंवर यांची राज्य संयोजक म्हणून निवड करण्यात आली. नवनियुक्त राज्य संयोजकांचे स्वागत व अभिनंदन वनराज शिंदे व दिपक वाघाडे यांनी केले.
अधिवेशनाचा समारोप कार्यक्रम मा. शोभा करांडे ( सगुणा महिला संघटना ) जयश्री घाडी ( संस्थापक सदस्य युवा भारत ) विलास सोनवणे ( संस्थापक सदस्य युवा भारत ) इक्बाल गाझी ( अखिल भारतीय समिती सदस्य, कोलकाता ) दयानंद कनकदंडे ( अखिल भारतीय समन्वयक ) यांच्या उपस्थितीत व नवनियुक्त राज्य संयोजक विनोद भुजबळ यांच्या अध्यक्षतेखाली संपन्न झाला.

दादरी कांड: जरूरत सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के विमर्श से आगे जाने की …..

दिल्ली,जो की भारत की राजधानी है,वहॉंसे कूछ दूर बिसहाडा गॉंव(दादरी इलाका,उ.प्र) में गोमांस घर में रखे होने की बात से खफा गॉंव के लोगों ने महम्मद ईखलाक की हत्या कर दि । जहॉं यह घटना हूयी है उसे हम सब नोएडा के नाम सें जानते है , यह दिल्ली का चमक दमक वाला ईलाका है । यह चमक दमक जिन लोगों को उजाडकर हूयी है उन उजाडे गए लोगोंके बीच के असंतोष को दरकिनार कर लोग ईस घटना का विश्लेषण करने में जूटे है,उससे हम सब लोगों को बचने की जरूरत है । सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के आईने में ईस घटना को देखने से ईसकी समझ हमें प्राप्त नही हो सकती । हमने हमारे पहले वाक्य में गोमांस रखे होने की अफवाह जानबूझकर नही कहॉं क्योंकी देश के धर्मनिरपेक्ष कहलाये जानेवाले लोग भी यह मानकर चलते की,मूसलमानही गोमांस भक्षक होता है या ज्यादातर गोमांस भक्षक मूसलमान ही होते है ।  महाराष्ट्र में जब पाबंदी लगायी गयी है उसको उठाने की मॉंग करनेवाले बीफ ईटर लोग नॉन मूस्लिम है ।ईस देश में प्राणीहत्या खासकर गाय और बैलो की हत्या के ऊपर पाबंदी की मांग जैन,बूद्ध से लेकर आधूनिक काल में महात्मा फूले तक ने की है । बूद्ध का काल इलापूर्व ५०० है, जबकी इस्लाम ७ वी सदी में आया है ।खेती की संपूर्ण व्यवस्था जो बडी जनसंख्या का भरणपोषण करती है  उससे जूडे ईन मवेशीओं को अपने भोग के लिए स्वाहा करने के खिलाफ ऊनकी लडाई रही । म.फूले ने भी गोहत्याबंदी कानून की मॉंग ईसी परीप्रेक्ष्य में रखी थी । गांधीजी द्वारा स्थापित एक संघ का नाम है कृषि-गोसेवा संघ । आज कृषि भारी संकट से जूझ रही है । खेती के कॉर्पोरेटायझेशन ने गाय बैलो को बडी संख्या में बाहर कर दिया है । कृषि का संकट ईतना गहरा है की पिछले बीस वर्षो    में  ३ लाख किसानों ने खूदकूशी कर ली है । स्थिती यह है की, खेती से किसान भी बाहर और गायबैल भी ।  सरकारे कृषि को संकट में डालकर गाय बचाने के नाम पर किसानों को धर्म के नाम पर आपस में भीडा रही है ।मूजफ्फरनगर में हिंदू जाट मूसलमान जाट सें भीडा था । जाट उत्तर भारत की किसान जाति है । आज जाट,पटेल,मराठा आरक्षण माॉंग रहे है ,क्यों ..??  वह आरक्षण नीती को खत्म करने की मंशा रखते ईसलिए नही तो कृषि संकट जिसे हमारी पूंजीवादी व्यवस्था नें निर्मान किया है उसके वजह बेदखल लोगों की इससे उभरने की छटपटाहट भर है । आज गाय बचाने की लडाई हो या आरक्षण बचाने की लडाईया समस्या सूलझानें की भासमान लडाईया है क्योंकी खेती और सामाजिक न्याय की गारंटी की व्यवस्था दोनों खतरे मे है ।  कृषि व्यवस्था को मानव और समाज हितैषी आधार पर खडा करने की लडाई लढे बगैर न सामाजिक न्याय की स्थापना हो सकती है न सांप्रदायिकता के खिलाफ लढाई ।
–  दयानंद कनकदंडे