Yuva Bharat Constitution (Hindi)

Yuva Bharat Constitution Hindi

श्रम की लूट एवं भूमि की लूट के खिलाफ एकताबद्ध हो.। जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करो । 2 सितम्बर की देशव्यापी हड़ताल को युवा भारत का समर्थन ।

 श्रम की लूट एवं भूमि की लूट के खिलाफ एकताबद्ध हो.।

                            जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करो ।

                2 सितम्बर की देशव्यापी हड़ताल को युवा भारत का समर्थन ।

देशभर के सभी केंद्रीय संगठनों ने और कर्मचारियो की फेडरेशनों ने एकसाथ मिलकर 2 सितम्बर 2015 के दिन देशव्यापी आम हड़ताल का आवाहन किया है । ठेका मजदूरी प्रथा को बंद करने,दिहाड़ीकरण और आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने,रक्षा,रेलवे,खुदरा व्यापार, वित्तीय क्षेत्रो में एफडीआई निवेश पर रोक लगाने,श्रम कानूनों में सुधारो को रद्द करने और भूमि अधिग्रहण कानून वापस लेने आदी 12 मांगो को लेकर यह देशव्यापी आम हड़ताल हो रही है । युवा भारत संग़ठन, जो की साम्राज्यवाद विरोधी युवाओ का अखिल भारतीय संगठन है, इस हड़ताल को सफल बनाने का आव्हान करता है..।

देश की वर्तमान राजग सरकार द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ विकास मॉडल,जो इस देश के पूर्ववर्ती कथित विकास मॉडलों का अगला चरण है । इस मॉडल की प्रतिपूर्ति हेतु बहुराराष्ट्रीय पूंजी की सेवा के लिए भूमी और श्रम को सस्ते दामो पर उपलब्ध करा देने के अजेंडे को पूरा करने में पहले दिन से लगी हुयी है ।

सरकार के द्वारा प्रस्तावित ‘स्मॉल फॅक्टरीज अधिनियम 2014 के अनुसार 40 से कम मजदूरो वाली सभी छोटी फॅक्टरिओ को 14 श्रम कानूनों से मुक्त कर दिया जायेगा । इस कानून के लागू हो जाने से करीबन 80 प्रतिशत कारखाने और उसके मजदूर श्रम कानूनों से मिलने वाले अधिकारो से बाहर हो जाएंगे । इन फॅक्टरिओ में में देश के सबसे आधुनिक और रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत माने जानेवाले आई टी सेक्टर का समावेश है। आई टी सेक्टर में 40  से  कम मजदूरो वाली  बहुतेरी कंपनीया है । साथ ही बाल श्रम(निषेध और नियमन ) कानून में संशोधन करके पारंपरिक उद्यम और कौशल विकास के लुभावने नाम पर वैध तथा अवैतनिक बनाने और महिला श्रमिको को उनकी समुचित सुरक्षा के बगैर रात्र पालियो में काम की अनुमति प्रदान करने जैसे प्रावधान श्रमिक हित विरोधी है । युवा भारत ऐसे कानूनों के क्रियान्वयन का पुरजोर विरोध करता है ।

देश के 60 प्रतिशत लोग आज भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार और भरण-पोषण के लिए खेती पर निर्भर है ।  किसान,खेतिहर मजदूर,पशुपालक से लेकर जंगल के मूलनिवासी आदीवासी परिवारो को मिलाकर एक बड़ी आबादी बनती है ।कृषि पर उनका अधिकार उसके जीविका का अधिकार है ।पिछले 20 वर्षो में खेती के लिए उपयोग में लाये जानेवाली भूमि का क्षेत्र घटा है । यह कृषियोग्य भूमि घटने का एकमात्र कारन है .. विकास के नाम पर अंदाधुंद भूमि अधिग्रहण …। इसी विकास प्रकिया के नाम पर इस देश में सेज नीती का क्रियान्वयन शुरू किया गया था । इसके विरोध में उभरे जनसंघर्षों में युवा भारत  संग़ठन ने सकारात्मक हस्तक्षेप किया  |जनविरोधी सेझ कानून २००५ के खिलाफ युवा भारत ने महामुंबई शेतकरी (किसान) समिती बनाकर रायगढ (महाराष्ट्र) में निर्णायक लढाई खडी की.पोस्को(उडीसा) सिंगूर,नंदीग्राम की लढाई में सक्रीय सहभागिता ,उलुबेरिया (प.बंगाल) में जमीन हथियाने कि साम्राज्यवादी नितीयो के खिलाफ संघर्ष खडा किया | सेझ के माध्यम से जल,जंगल,जमीन हथियाने कि इस प्रक्रिया में इन संघर्शो के परिणामस्वरूप २०१३ में ब्रिटीश हुकमत के जमीन अधिग्रहण कानून १८९४ में व्यापक संशोधन कर जमीन अधिग्रहण के लिए आवश्यक सार्वजनिक हित के प्रावधान को हटा दिया गया | हर प्रकार के निजी एवं सार्वजनिक परीयोजनाओ के लिए जमीन हथियाने को मान्यता देकर केवल मुआवजे व पुनर्वास के दायरे में चर्चा को सिमटा कर रख दिया | २०१३ में बनाये गए इसी “उचित मुआवजा का अधिकार,पुनर्स्थापना,पुनर्वास एवं पारदर्शिता भूमी अधिग्रहण विधेयक  २०१३ “ में  हाल कि  सरकार ने और भी संशोधन एक अध्यादेश द्वारा किये है |

अध्यादेश में कहा गया है कि पांच उद्देशो-सुरक्षा,रक्षा,ग्रामीण आधारभूत सरंचना,औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी सामाजिक के निर्माण के लिए अनिवार्य सहमती कि उपधारा आवश्यक नहीं है । साथ ही सामाजिक प्रभाव का आंकलन,5 साल तक अधिग्रहित भूमि का इस्तेमाल न करने पर उसको वापस करना जैसे प्रावधानो को हटा दिया है।

सरकार का यह फैसला पुंजीपतीयो के पक्ष में और किसान एवं गरीबो के खिलाफ तथा अलोकतांत्रिक है |

जिस प्रकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया और जिस प्रकार से सारी प्रक्रियाओ को तक पर रखकर श्रम कानूनों में सुधारो को अंजाम दिया जा रहा है ,यह दोनों प्रकार जनवादी परंपरा के संकेत और नीतियो का विडंबन और उल्लंघन है | सरकार यह संदेश देना चाहती है की वह बाजारकेंद्रित आर्थिक सुधारो के लिए बहुत बैचैन है |यह हकीकत है की बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था आज पुरे विश्वभर में चरमरा रही है;अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मंदी,युरोजोन का संकट तथा चीन कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती  इसका प्रमाण है | हाल ही में आये ग्रीस संकट ने इसकी पुष्टि कर दी है ।भारत की सरकार फीर भी आर्थिक सुधारो के उन्ही मार्गो का अनुसरण कर रही है | इसलिए विकास के  इस पुरे मॉडेल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है |

कुछ महत्वपूर्ण बातो को भी इस सन्दर्भ में देखे जाने की जरुरत है । जिन ट्रेड यूनियनों की तरफ से इस आम हड़ताल का आवाहन किया है, उनमे से बहुतायत राजनीतिक पार्टीयो से सबंधित ट्रेड यूनियनें ही है । CITU सीपीएम से सम्बद्ध है,INTUC कांग्रेस पार्टी से,BMS भाजपा से सम्बद्ध है ।जब यह राजनीतिक दल सत्ता में रहते वक़्त जनविरोधी नीतियों को लागु करते है तब यह ट्रेड यूनियनें आश्चर्यजनक रूप से इसपर चुप्पी साध लेती है । श्रम कानूनों में सुधारों  का प्रस्ताव जब कांग्रेस नीत यूपीए द्वारा लाया गया था तब INTUC खामोश रही । जब प.बंगाल की वाम मोर्चा सरकार मजदुर विरोधी सेझ कानून बंगाल में लेकर आयी तब CITU द्वारा इसका थोडा भी विरोध नहीं हुआ । हमको इस हड़ताल का समर्थन करते वक़्त कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए की यह ट्रेड यूनियनें अप्रत्यक्ष रूप से मेहनतकश वर्ग हितो के विरुद्ध भूमिका लेती रही है । ट्रेड यूनियनों का कर्तव्य मजदूरो के हितो का रक्षण करना होना चाहिए, न की वे जिन राजनितीक दलो से सम्बद्ध है उनके हितो का पोषण करना । एक राजनितीक दल के बदले दूसरे राजनितीक दल को सत्ता में बिठाने भर से मेहनतकश वर्ग के हितो को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। मेहनतकश जनता के ऊपर हो रही ज्यादतीयो को रोकने के लिए एक देशव्यापी जनांदोलन छेड़े जाने की जरुरत है । इससे कम और कुछ भी नहीं चल सकता । जनांदोलन का कुछ भी शॉर्टकट नहीं है ।

उद्योग के विकास के नाम पर बडे एवं भारी उद्योगो की चर्चा क्यो होती है?उद्योगो के विकास का अर्थ ग्रामीण   उद्योग  का विकास क्यो नही लिया जाता ?जिस विकास मॉडेल में कंपनीयो,निगमो की मुनाफाखोरी के लिए मानव श्रम  का शोषण हो ,जमीन एवं प्राकृतिक संसाधनो का दोहन हो तथा इससे जुडे परंपरागत किसान,आदिवासी समुदाय को उजाडे,उस विकास के मॉडेल को कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?विकास का सही मॉडेल वही है जो मनुष्य समाज एवं  प्रकृती के साथ संगती बैठाते हुए सबका विकास सुनिश्चित करे |इसलिए भारत जैसे श्रमबाहुल्य देश में मास प्रोडक्शन की  बजाय प्रोडक्शन बाई मासेज फॉर द मासेज की नीती ही कारगर हो सकती है |जल,जंगल,जमीन,पहाड आदी प्राकृतिक   धरोहर है,लोगो के जीविका के साधन है,इन्हे बाजार की वस्तू बनाना गलत है |

युवा भारत संग़ठन इन अध्यादेशो,सुधारो का विरोध करता है । जनविरोधी नीतियों के विरोध में चल रहे संघर्ष को जनहितैषी समाज के निर्माण की और अग्रसर करने तथा समतामूलक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाने का कृतसंकल्प करता है ।

(दयानंद कनकदंडे,कौशिक भारत,कृष्णा महतो,कैलाश राजभर )

युवा भारत की अखिल भारतीय संयोजन समीती द्वारा जारी

30 अगस्त 2015

नयी दिल्ली

Please sign the petition to Demand Scrap the anti people land acquisition ordinance

Please sign the petition to Demand Scrap the anti people land acquisition ordinance

this is online petition addressed to Prime minister to India

to Demand Scrap the anti people land acquisition ordinance

 

http://www.change.org/p/prime-minister-of-india-an-appeal-to-scrap-anti-people-land-acquisiton-ordinance?recruiter=90787932&utm_source=share_petition&utm_medium=copylink

युवा भारत के ७ वे अखिल भारतीय संमेलन,प.बंगाल द्वारा पारित प्रस्ताव

 1) भूमी अधिग्रहण अध्यादेश पर प्रस्ताव

युवा भारत संघठन २००५ से जमीन हथियाने कि नीतियो के विरोध में लगातार संघर्ष करते आया है  |जनविरोधी सेझ कानून २००५ के खिलाफ युवा भारत ने महामुंबई शेतकरी (किसान) समिती बनाकर रायगढ (महाराष्ट्र) में निर्णायक लढाई खडी की.पोस्को(उडीसा)सिंगूर,नंदीग्राम,उलुबेरिया (प.बंगाल) में जमीन हथियाने कि साम्राज्यवादी नितीयो के खिलाफ संघर्ष खडा किया | सेझ के माध्यम से जल,जंगल,जमीन हथियाने कि इस प्रक्रिया में इन संघर्शो के परिणामस्वरूप २०१३ में ब्रिटीश हुकमत के जमीन अधिग्रहण कानून १८९४ में व्यापक संशोधन कर जमीन अधिग्रहण के लिए आवश्यक सार्वजनिक हित के प्रावधान को हटा दिया गया | हर प्रकार के निजी एवं सार्वजनिक परीयोजनाओ के लिए जमीन हथियाने को मान्यता देकर केवल मुआवजे व पुनर्वास के दायरे में चर्चा को सिमटा कर रख दिया | २०१३ में बनाये गए इसी उचित मुआवजा का अधिकार,पुनर्स्थापना,पुनर्वास एवं पारदर्शिता भूमी अधिग्रहण विधेयक  २०१३ में  हाल कि  सरकार ने और भी संशोधन एक अध्यादेश द्वारा किये है |

    अध्यादेश में कहा गया है कि पांच उद्देशो-सुरक्षा,रक्षा,ग्रामीण आधारभूत सरंचना,औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी सामाजिक के निर्माण के लिए अनिवार्य सहमती कि उपधारा और सामाजिक प्रभाव आकलन कि शर्त भूमी अधिग्रहण के लिए आवश्यक नही होगी | अध्यादेश के मुताबिक बहुफसली सिंचीत भूमी भी इन उद्देशो के अधिग्रहित कि जा सकती है |भूमी अधिग्रहण कानून २०१३ देश के अनेक जनसंघठनो द्वारा लढे गये संघर्ष और सर्वोच न्यायालय के कई फैसलो के दबाव कि तार्किक परिणीती था | इस तार्किक परिणीती को महज एक अध्यादेश द्वारा पलट दिया गया है | इस अध्यादेश के तीन आयाम है-एक तो यह की इसमे जमीन मालीको कि सहमती कि शर्त को काफी हद तक काम कर दिया है |दुसरा,ऐसी परियोजनाओ का दायरा काफी हद तक बाधा दिया है,जिसके लिए अधिग्रहण करणे के लिए सहमती कि आवश्यकता हि नही होगी | तीसरा अब बहुफसली जमीन का भी अधिग्रहण किया जा सकेगा| इस अध्यादेश से अत्याधिक अधिग्रहण और जबरन अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया है |

सरकार का यह फैसला पुंजीपतीयो के पक्ष में और किसान एवं गरीबो के खिलाफ तथा अलोकतांत्रिक है | सवाल यह उठता है की,जब संसद का शीतकालीन अधिवेशन कुछ ही दिनो में आरंभ होनेवाला था तब इतनी जल्दी में अध्यादेश लाने का औचित्य क्या है? संविधान में अध्यादेश का प्रावधान आपात उपाय के रूप में किया गया है |इसलिए इसका सहारा अपवादात्मक ही लेना चाहीए लेकीन सरकार ने एक के बाद एक अध्यादेशो कि झडी लगा दी गयी है | यह प्रकार जनवादी परंपरा के संकेत और नीतियो का विडंबन और उल्लंघन है | हडबडी में अध्द्यादेश लाकर सरकार यह संदेश देना चाहती है की वह बाजारकेंद्रित आर्थिक सुधारो के लिए बहुत बैचैन है |यह हकीकत है की बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था आज पुरे विश्वभर में चरमरा रही है;अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मंदी,युरोजोन का संकट तथा चीन कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती  इसका प्रमाण है | भारत की सरकार फीर भी आर्थिक सुधारो के उन्ही मार्गो का अनुसरण कर रही है | इसलिए विकास के  इस पुरे मॉडेल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है |

 उद्योग के विकास के नाम पर बडे एवं भारी उद्योगो की चर्चा क्यो होती है?उद्योगो के विकास का अर्थ ग्रामीण   उद्योग  का विकास क्यो नही लिया जाता ?जिस विकास मॉडेल में कंपनीयो,निगमो की मुनाफाखोरी के लिए मानव श्रम  का शोषण हो ,जमीन एवं प्राकृतिक संसाधनो का दोहन हो तथा इससे जुडे परंपरागत किसान,आदिवासी समुदाय को उजाडे,उस विकास के मॉडेल को कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?विकास का सही मॉडेल वही है जो मनुष्य समाज एवं  प्रकृती के साथ संगती बैठाते हुए सबका विकास सुनिश्चित करे |इसलिए भारत जैसे श्रमबाहुल्य देश में मास प्रोडक्शन की  बजाय प्रोडक्शन बाई मासेज फॉर द मासेज की नीती ही कारगर हो सकती है |जल,जंगल,जमीन,पहाड आदी प्राकृतिक   धरोहर है,लोगो के जीविका के साधन है,इन्हे बाजार की वस्तू बनाना गलत है |

 युवा भारत इस अध्यादेश का विरोध करता है | जमीन हथियाकर  मेहनतकश जनता को उसके रोजी रोटी के साधनो से,प्राकृतिक जड़ो से बेदखल करने की नीती का विरोध करता है और देशभर में चल रहे संघर्षो का समर्थन करते हुए उन्हे तेज़ करने का संकल्प घोषित करता है |

 2) भारत मे २०११ की जनगणना के अनुसार इस देश मे १६३५ भाषाए होने  की बात कही गयी है | युवा भारत का यह सम्मेलन सभी को ऊनकी मातृभाषा मे न्यूनतम प्रार्थमिक शिक्षा दिए जाने की मांग करता है|

3)भारतीय संविधान की ८ वी अनुसूची मे समावेशीत २२ भाषाओ मे प्रशासनिक एव न्यायालयीन कार्यवाही चलाने की मांग युवा भारत का सम्मेलन करता है |

4) भारत एक बहुभाषायी देश है | भारतीय संविधान  की ८वी अनुसूची मे  २२ भाषाओ को सामील किया गया है| युवा भारत के ६ वे अखिल भारतीय सम्मेलन वर्धा(महाराष्ट्र) ने महाराष्ट्र मे अमरावती जिला के रिधपुर मे मराठी भाषा का केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने की मांग की है ,यह सम्मेलन संविधान की ८ वी अनुसूची मे समावेशीत २२ भाषाओ के केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग करता है |इन सभी विश्वविद्यालयो मे साहित्य,कला,विज्ञान,सामाजिक विज्ञान का संशोधन एवं अध्ययन-अध्यापन हो तथा होणेवाले संशोधन एक दुसरी भाषा मे अनुदीत कर उपलब्ध कराने के लिए एक आंतरभारती अनुवाद केंद्र की स्थापना की जाए | 5) झारखंड पर प्रस्ताव

अ) झारखंड प्रदेश की भौगोलिक परिस्थिती को ४ राज्यो मे विभाजित किया गया है | वहा की वांशिक राष्ट्रीयता के विकास हेतु सही मायने मे झारखंडी लोगो के अस्तित्व एवं अस्मिता को दर्शानेवाले वृहद झारखंड के पुंनर्गाठण की मांग करता है |

ब) झारखंड की तरह भारत के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रो मे कई सारी आदिवासी जनजातीयो को आज   भी शेडुल मे नही रखा गया है | जिसके कारण आदिवासी होते हुए भी उनके मौलिक अधिकारो का हणण होता है |युवा भारत मांग करता है की ऐसी आदिवासी जनजातीयो को शेडुल मे समाविष्ठ किया जाए और उनके  जल,जंगल,जमीन के मौलिक अधिकारो की रक्षा की जाए |     6)फिलिस्तीन की राष्ट्रीयता का समर्थन

     साम्राज्यवादी नीतीयो के तहत फिलिस्तीनी जनता का फिलीस्तींनी राष्ट्र का हक १९४८ से नाकारा गया है | युवा भारत फिलिस्तीन की राष्ट्रीयता के चल रहे संघर्ष का समर्थन करता है |साथ ही साथ विश्व भर मे चल रहे विभिन्न राष्ट्रीयताओ के राष्ट्रमुक्ती संघर्षो का समर्थन करता है|

  7)देशभर मे भगाना(हरियाणा)खरडा(महाराष्ट्र) आदि इलाको मे तथा अन्य इलाको मे दलित,आदिवासी,घुमंतू जनजातीयो के स्त्री-पुरुष और तृतीयपंथीयो तथा अलग-अलग धार्मिक पहचान और मान्यता अपनाने वालो के पर अत्याचारो की घटनाये बढ रही है |

 युवा भारत ऐसी अमानवीय घटनाओ की निंदा करता है और ऐसी घटनाओ को रोकने के लिए समाज जोडो अभियान तेज करणे का संकल्प करता है |

 

भूमी अधिग्रहण अध्यादेश पर प्रस्ताव

युवा भारत संघठन २००५ से जमीन हथियाने कि नीतियो के विरोध में लगातार संघर्ष करते आया है  |जनविरोधी सेझ कानून २००५ के खिलाफ युवा भारत ने महामुंबई शेतकरी (किसान) समिती बनाकर रायगढ (महाराष्ट्र) में निर्णायक लढाई खडी की|पोस्को(उडीसा)सिंगूर,नंदीग्राम,उलुबेरिया (प.बंगाल) में जमीन हथियाने कि साम्राज्यवादी नितीयो के खिलाफ संघर्ष खडा किया | सेझ के माध्यम से जल,जंगल,जमीन हथियाने कि इस प्रक्रिया में इन संघर्शो के परिणामस्वरूप २०१३ में ब्रिटीश हुकमत के जमीन अधिग्रहण कानून १८९४ में व्यापक संशोधन कर जमीन अधिग्रहण के लिए आवश्यक सार्वजनिक हित के प्रावधान को हटा दिया गया | हर प्रकार के निजी एवं सार्वजनिक परीयोजनाओ के लिए जमीन हथियाने को मान्यता देकर केवल मुआवजे व पुनर्वास के दायरे में चर्चा को सिमटा कर रख दिया | २०१३ में बनाये गए इसी उचित मुआवजा का अधिकार,पुनर्स्थापना,पुनर्वास एवं पारदर्शिता भूमी अधिग्रहण विधेयक  २०१३ में  हाल कि  सरकार ने और भी संशोधन एक अध्यादेश द्वारा किये है |

                 अध्यादेश में कहा गया है कि पांच उद्देशो-सुरक्षा,रक्षा,ग्रामीण आधारभूत सरंचना,औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी सामाजिक के निर्माण के लिए अनिवार्य सहमती कि उपधारा और सामाजिक प्रभाव आकलन कि शर्त भूमी अधिग्रहण के लिए आवश्यक नही होगी | अध्यादेश के मुताबिक बहुफसली सिंचीत भूमी भी इन उद्देशो के अधिग्रहित कि जा सकती है |भूमी अधिग्रहण कानून २०१३ देश के अनेक जनसंघठनो द्वारा लढे गये संघर्ष और सर्वोच न्यायालय के कई फैसलो के दबाव कि तार्किक परिणीती था | इस तार्किक परिणीती को महज एक अध्यादेश द्वारा पलट दिया गया है | इस अध्यादेश के तीन आयाम है-एक तो यह की इसमे जमीन मालीको कि सहमती कि शर्त को काफी हद तक काम कर दिया है |दुसरा,ऐसी परियोजनाओ का दायरा काफी हद तक बाधा दिया है,जिसके लिए अधिग्रहण करणे के लिए सहमती कि आवश्यकता हि नही होगी | तीसरा अब बहुफसली जमीन का भी अधिग्रहण किया जा सकेगा| इस अध्यादेश से अत्याधिक अधिग्रहण और जबरन अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया है |

                    सरकार का यह फैसला पुंजीपतीयो के पक्ष में और किसान एवं गरीबो के खिलाफ तथा अलोकतांत्रिक है | सवाल यह उठता है की,जब संसद का शीतकालीन अधिवेशन कुछ ही दिनो में आरंभ होनेवाला था तब इतनी जल्दी में अध्यादेश लाने का औचित्य क्या है? संविधान में अध्यादेश का प्रावधान आपात उपाय के रूप में किया गया है |इसलिए इसका सहारा अपवादात्मक ही लेना चाहीए लेकीन सरकार ने एक के बाद एक अध्यादेशो कि झडी लगा दी गयी है | यह प्रकार जनवादी परंपरा के संकेत और नीतियो का विडंबन और उल्लंघन है | हडबडी में अध्द्यादेश लाकर सरकार यह संदेश देना चाहती है की वह बाजारकेंद्रित आर्थिक सुधारो के लिए बहुत बैचैन है |यह हकीकत है की बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था आज पुरे विश्वभर में चरमरा रही है;अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मंदी,युरोजोन का संकट तथा चीन कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती इसका प्रमाण है | भारत की सरकार फीर भी आर्थिक सुधारो के उन्ही मार्गो का अनुसरण कर रही है | इसलिए विकास के इस पुरे मॉडेल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है |

                       उद्योग के विकास के नाम पर बडे एवं भारी उद्योगो की चर्चा क्यो होती है?उद्योगो के विकास का अर्थ ग्रामीण उद्योग का विकास क्यो नही लिया जाता ?जिस विकास मॉडेल में कंपनीयो,निगमो की मुनाफाखोरी के लिए मानव श्रम का शोषण हो ,जमीन एवं प्राकृतिक संसाधनो का दोहन हो तथा इससे जुडे परंपरागत किसान,आदिवासी समुदाय को उजाडे,उस विकास के मॉडेल को कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?विकास का सही मॉडेल वही है जो मनुष्य समाज एवं प्रकृती के साथ संगती बैठाते हुए सबका विकास सुनिश्चित करे |इसलिए भारत जैसे श्रमबाहुल्य देश में मास प्रोडक्शन की बजाय प्रोडक्शन बाई मासेज फॉर द मासेज की नीती ही कारगर हो सकती है |जल,जंगल,जमीन,पहाड आदी प्राकृतिक धरोहर है,लोगो के जीविका के साधन है,इन्हे बाजार की वस्तू बनाना गलत है | युवा भारत इस अध्यादेश का विरोध करता है | जमीन हथियाकर  मेहनतकश जनता को उसके रोजी रोटी के साधनो से,प्राकृतिक जड़ो से बेदखल करने की नीती का विरोध करता है और देशभर में चल रहे संघर्षो का समर्थन करते हुए उन्हे तेज़ करने का संकल्प घोषित करता है |

                        ( युवा भारत  संघठन के  ७ वे  अखिल भारतीय सम्मेलन  प.बंगाल द्वारा  भूमी                               अधिग्रहण अध्यादेश पर पारित प्रस्ताव)

                                                                                                                  दि.१० मार्च २०१५

                                                                                                                      फुलेश्वर,हावडा

 

युवा भारत के ७ वे अखिल भारतीय संमेलन द्वारा पारित कार्यक्रम प्रस्ताव 

                                             

               १.आज देशभर में धर्म के नाम पर,संप्रदाय के नाम पर जनता के अंदर विरोध पैदा करने की और उनके अंदर एक दुसरे के खिलाफ नफरत फैलाने कि राजनीती तेजी से बढ रही है / इस विभाजन कि राजनीती के विरोध में युवा भारत लगातार प्रचार आंदोलन चलायेगी /

२. भारत के अंदर विभिन्न राष्ट्रीयताए और वांशिक जनजातीया अपना परिचय खो कर अस्तित्वहीन होती जा रही है / इस के खिलाफ इन राष्ट्रीयताओ और जनजातीयो कि तरफसे लढाईया भी खडी हो रही है / युवा भारत राष्ट्रीयताओ और आदिवासीओ के सवाल पर खडी लढाईओ के साथ खडा होगा /

३. युवा भारत लिंग विषमता के खिलाफ लगातार लढाई कर रहा है / जो संघटनाये इस मुद्दे को लेकर लढ रही है, खासकर मेहनतकश महिलाओ को संघटीत करने का काम कर रही है,उनके साथ युवा भारत मोर्चाबंदी खडी करेगा /

४. युवा भारत के ५ वे संमेलन(देवघर) में विकास और पर्यावरण इस विषय पर चर्चा कि गयी थी और पर्यावरण के रक्षण सबंधी आंदोलन खडी करने कि जरुरत व्यक्त कि गयी थी / इसकी धारावाहीकता बनाये रखते हूए युवा भारत पर्यावरण बचाव संघर्ष खडा करने का काम करेगा /

५. युवाओ को एकजूट करने का काम कर रहे है और युवा भारत जैसी मिलीजुली सोच रखनेवाले युवा संघटनाओ के साथ मिलकर काम करने के लिए युवा भारत प्रयासशील रहेगा /

६. शिक्षा आज भगवाकरन और व्यापारीकरण का शिकार हो गयी है /लोकतांत्रिक,वैज्ञानिक,सार्वजनिक और समाजोन्मुखी शिक्षा व्यवस्था कि मांग को लेकर युवा भारत लगातार संघर्ष करेगा

७. युवा पिढी आज  बेरोजगारी  और छदम मजदूर युनियनो  के शिकंजे में है / काम के घंटे बढते जा रहे है और मजदूरी घटती जा रही है / मजदुरो के लिए काम करने योग्य स्तीथिया और सामाजिक रूप से सुरक्षित वातावरण बुरे तरीके से खत्म किया जा रहा है / इसी तरह  नौकरी दिलाने के नाम पर भ्रष्टाचार तेजी से बढ रहा है / मजदूर आंदोलन  के क्षेत्र में चल रहे  सारे मुद्दो को लेकर  युवा भारत आंदोलन खडा करने का काम करेगी/

८.बहु विकल्पिक समाजोन्मुखी संस्कृती के प्रसार के लिये युवा भारत प्रयासशील रहेगा /

९.समाज में व्यक्तिवाद का विरोध और सामुहीकता के माध्यम से सोचने कि मानसिकता पैदा करणे के लिये युवा भारत काम करेगा/

 

महात्मा गांधी ते कॉम्रेड पानसरे: भारतातील ब्राम्हणी फॅसिझमचा नवा अध्याय

भारत देशातील समस्त मित्र आणि मैत्रीणिंनो ही वेळ बोलण्याची नाही तर लढण्याची आहे.

आज देशात आणीबाणीची परिस्थिती आहे. ‘गुजरात पॅटर्न’ मध्ये पास झालेल्या ‘चलाख’ विद्यार्थ्याने देशाच्या राजकारणाची सूत्रे हाती घेतल्यानंतर आणि महाराष्ट्रात ‘गुजरात पॅटर्न’च्या परीक्षेसाठी बसवलेल्या विद्यार्थ्याने प्राथमिक धडे गिरवायला सुरुवात केल्यानंतर देश व महाराष्ट्राच्या परिवर्तनवादी चळवळीतील कार्यकर्त्यांची आहुती या भांडवली व साम्राज्यवादी विकास धोरणात जाने हे सुनिश्चित झाले आहे. समतेवर आधारीत समाज निर्मितीसाठी मूलभूत भौतिक परिवर्तनाचा ठोस मुद्दा घेऊन वाटचाल करणार्‍या कोणत्याही कार्यकर्त्याला या पुढच्या काळात भारत देशात व विशेषत: ‘पुरोगामी’पणाचे बिरुद मिरवणार्‍या महाराष्ट्रात नैसर्गिक मृत्यू प्राप्त होईल अशी परिस्थिती सध्या दिसत नाही. तेव्हा आज महात्मा गांधींपासून – कॉम्रेड पानसरेंपर्यंत सर्व परिवर्तनवादी शक्तींना व व्यक्तींना आपल्या ‘रडार’ वर घेणार्‍या या ब्राम्हणी  फॅसिझमचा मुकाबला करण्यासाठी एकत्र येणे ही काळाची गरज आहे.

नव्वदच्या नव-उदारमतवादी धोरणांच्या परिणामांनंतर उध्वस्त झालेले देशभरातील भूमिहीन, आदिवासी व शेतकरी संघर्षाचा ठोस पर्याय न मिळाल्यामुळे आत्महत्या करीत आहेत. गेल्या दशकभरात भांडवली विकासाच्या धोरणांनी लादलेल्या आत्महत्यांच्या या सत्रात संघटित व असंघटित क्षेत्रातील बेरोजगार कामगार व सुशिक्षित बेरोजगारांची देखील भर पडली आहे. मात्र या लादलेल्या आत्महत्येचा पर्याय नाकारून आपल्या जाणिवा जागृत व जीवंत ठेवत आणि येणार्‍या प्रत्येक निराशेला बाजूला सारत समतामूलक समाजासाठी संघर्ष करणार्‍या परिवर्तनवादी चळवळीतील कार्यकर्ता हा आजच्या भांडवली विकासापुढील सर्वात मोठा अडथळा ठरत आहे. आत्महत्येचा पर्याय न स्वीकारणार्‍या अशा  कार्यकार्यकर्त्यांची हत्या करण्यासाठी इथल्या ब्रम्हणी व भांडवली सत्ताधार्‍यांनी विडा उचलला आहे. म्हणजे एकतर “तुम्ही स्वत:च गळफास लावून घ्या नाहीतर आम्ही ते काम करतो!” ही त्यांची भूमिका आहे. राजकीय, सामाजिक व माध्यमांच्या दुनियेतील सत्ता – संपत्तीने माजलेले सर्व ‘कुबेर’ आज या भूमिकेचे समर्थन करीत आहेत.

प्रश्नांचे आभाळ डोक्यावर घेऊन फिरणारा विविध पक्ष – संघटनांमधील कृतीशील कार्यकर्ताच इथून पुढच्या आंदोलंनांची दिशा ठरवणार आहे!

२०१३ साली दाभोळकरांच्या हत्येच्यावेळी तथाकथित ‘पुरोगामी’ व ‘धर्मनिरपेक्ष’ आघाडीचे सरकार महाराष्ट्रात व केंद्रात होते तर आज २०१५ साली धर्मांध व  फॅसिस्ट प्रवृत्तीच्या युतीचे सरकार आहे. गुजरात मधील विकासाचा ‘गोध्रा पॅटर्न’ हा ‘बारामतीच्या खोर्‍यातून’ जातो हे महाराष्ट्राची जनता उघड्या डोळ्यांनी बघत आहे. तेव्हा परिवर्तनाची मशाल आपल्या हातात घेतलेल्या आजच्या नव्या पिढीने ती मशाल आपल्याच तेलाने व आपल्याच खांद्यावर तेवत राहील याची काळजी घेतली पाहिजे. बाकी आजच्या सुजाण पिढीला अधिक काही सांगण्याची गरज नाही!!!

ऑगस्ट २०१३ साली पुण्यात झालेल्या दाभोळकरांच्या हत्येनंतर महाराष्ट्रातील विविध संघटनांनी भरवलेल्या ‘निर्धार’ सभा दीर्घकालीन कृतीकार्यक्रमात परावर्तीत होऊ शकलेल्या नाहीत. या सभांमध्ये उपस्थित असलेल्या विविध व्यक्ति व संघटनांचा ढळत जाणारा ‘निर्धार’ महाराष्ट्राने बघितला आहे. कॉम्रेड गोविंद पानसरेंवरील हल्यानंतर पुन्हा त्याच-त्या चुका करून तरुणांच्या ऊर्जेचा असा अपव्यय करणे परिवर्तनवादी चळवळीच्या भवितव्याला परवडणारे नाही. प्रश्नांचे आभाळ डोक्यावर घेऊन फिरणारा विविध पक्ष – संघटनांमधील कृतीशील कार्यकर्ताच इथून पुढच्या आंदोलंनांची दिशा ठरवणार आहे

संपूर्ण देशभर खांदेपालट चालू असताना परिवर्तनवादी चळवळ देखील त्याला अपवाद ठरू शकणार नाही. कॉम्रेड पानसरेंच्या हल्ल्याच्या निषेधात रस्त्यावर आलेल्या नव्या पिढीतिल कार्यकर्त्यांनी एक व्यापक आघाडी उभा करण्याच्या दिशेने गेले पाहिजे.  आपापसातील संवाद व हस्तक्षेपाच्या नव्या जागा शोधत संघर्षरत राहणार्‍या सर्व कार्यकर्त्यांनी भविष्यातील जन आंदोलनांचे नेतृत्व करण्यासाठी तयार राहिले पाहिजे.

भाषणबाजीच्या पलीकडे जाऊन आपला निषेध व्यक्त करण्यासाठी रस्त्यावर उतरलेल्या राज्य व देशातील सर्व कार्यकर्त्यांना व जनसमूहांना ‘युवा भारत’ संघटना आपला पाठिंबा जाहीर करीत आहे.   

युवा भारत – महाराष्ट्                                                                                                                bharatyuva@gmail.com

दयानंद कनकदंडे (नांदेड) ९६३७३०१२०४                                                                                                 संयोजक,अ.भा.समिती

वनराज शिंदे (पुणे) ९९२१४९४६९६, दिपक वाघाडे(नागपूर) ८८०६६७२२७७                                                                     राज्य संयोजक

युवा भारत का 7 वॉं अखिल भारतीय सम्‍मेलन, कोलकाता

युवा भारत का 7 वॉं अखिल भारतीय सम्‍मेलन

       विषय ः”भारत बनने की प्रक्रिया में भाषाई राष्‍ट्रीयता एवं वांशिकता का भविष्‍य’

कार्यक्रम

१.आज देशभर में धर्म के नाम पर,संप्रदाय के नाम पर जनता के अंदर विरोध पैदा करने की और उनके अंदर एक दुसरे के खिलाफ नफरत फैलाने कि राजनीती तेजी से बढ रही है / इस विभाजन कि राजनीती के विरोध में युवा भारत लगातार प्रचार आंदोलन चलायेगी /

२. भारत के अंदर विभिन्न राष्ट्रीयताए और वांशिक जनजातीया अपना परिचय खो कर अस्तित्वहीन होती जा रही है / इस के खिलाफ इन राष्ट्रीयताओ और जनजातीयो कि तरफसे लढाईया भी खडी हो रही है / युवा भारत राष्ट्रीयताओ और आदिवासीओ के सवाल पर खडी लढाईओ के साथ खडा होगा /

३. युवा भारत लिंग विषमता के खिलाफ लगातार लढाई कर रहा है / जो संघटनाये इस मुद्दे को लेकर लढ रही है, खासकर मेहनतकश महिलाओ को संघटीत करने का काम कर रही है,उनके साथ युवा भारत मोर्चाबंदी खडी करेगा /

४. युवा भारत के ५ वे संमेलन(देवघर) में विकास और पर्यावरण इस विषय पर चर्चा कि गयी थी और पर्यावरण के रक्षण सबंधी आंदोलन खडी करने कि जरुरत व्यक्त कि गयी थी / इसकी धारावाहीकता बनाये रखते हूए युवा भारत पर्यावरण बचाव संघर्ष खडा करने का काम करेगा /

५. युवाओ को एकजूट करने का काम कर रहे है और युवा भारत जैसी मिलीजुली सोच रखनेवाले युवा संघटनाओ के साथ मिलकर काम करने के लिए युवा भारत प्रयासशील रहेगा /

६. शिक्षा आज भगवाकरन और व्यापारीकरण का शिकार हो गयी है /लोकतांत्रिक,वैज्ञानिक,सार्वजनिक और समाजोन्मुखी शिक्षा व्यवस्था कि मांग को लेकर युवा भारत लगातार संघर्ष करेगा

७. युवा पिढी आज  बेरोजगारी  और छदम मजदूर युनियनो  के शिकंजे में है / काम के घंटे बढते जा रहे है और मजदूरी घटती जा रही है / मजदुरो के लिए काम करने योग्य स्तीथिया और सामाजिक रूप से सुरक्षित वातावरण बुरे तरीके से खत्म किया जा रहा है / इसी तरह  नौकरी दिलाने के नाम पर भ्रष्टाचार तेजी से बढ रहा है / मजदूर आंदोलन  के क्षेत्र में चल रहे  सारे मुद्दो को लेकर  युवा भारत आंदोलन खडा करने का काम करेगी/

 ८.बहु विकल्पिक समाजोन्मुखी संस्कृती के प्रसार के लिये युवा भारत प्रयासशील रहेगा /

  ९.समाज में व्यक्तिवाद का विरोध और सामुहीकता के माध्यम से सोचने कि मानसिकता पैदा करणे के लिये युवा भारत काम करेगा/

 

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