युवा भारत का 5 वॉं राष्ट्रीय सम्मेलन रिपोर्ट
दि. 24, 25 व 26 सितंबर, 2010
बनारसीदास सतनालीवाला स्मृति भवन, देवघर, झारखंड
युवा भारत के 5वाँ राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर से आए 325 प्रतिनिधी कार्यकर्ताओं ने साम्राज्यवाद के खिलाफ के संघर्ष को अधिक मजबूत करने का संकल्प करते हुए संपन्न हुआ.
देवघर (झारखंड) के सतनालीवाला भवन में श्री. विश्वनाथ बॅनर्जी के रविन्द्र संगीत के सुमधूर स्वर के साथ युवा भारत के पंचम राष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुवात हुई. वरीष्ठ विचारक पाठक आर्य जी की अध्यक्षता में हुए उद्घाटन सत्र में प्रमुख अतिथी ह.भ.प. फडतरे महाराज, कॉ. विलास सोनवणे, डा. पी.ए
न.पी. वर्मा, गोपीनाथ राजहंस, प्रतिभा गुप्ता, निर्मला ठाकूर (दिदी) उपस्थित थे. दीप प्रज्वलन एवं पौधे को जलार्पण करके सम्मेलन का उद्घाटन किया गया. तीन दिवसीय सम्मेलन में गंभीर चर्चा के साथ वर्तमान संकट के संदर्भ में प्रस्ताव एवं कार्यक्रमों को लेकर निर्णय लिए गए. इस सम्मेलन में युवा भारत की नई राष्ट्रीय समिती का गठन हुआ और नए राष्ट्रीय संयोजकों की घोषणा की गई. ![]()
देशभर से आए युवा भारत के साथी एवं अतिथीगण का स्वागत करते हुए डा. पी.एन.पी. वर्मा जी ने कहा कि इस राष्ट्रीय सम्मेलन में पर्यावरण एवं विकास की अवधारणा पर होनेवाली गंभीर बहस से जो विचार निकलेंगे वह देश के कोने-कोने तक पहुंचेंगे और मानवता का कल्याण करेंगे.
युवा भारत की विचारधारा एवं विगत 10 वर्षो के युवा भारत के
प्रवास का संक्षिप्त परिचय देते हुए युवा भारत के राष्ट्रीय समन्वयक अशोक भारत ने कहा कि, ‘पिछले 10 सालों में युवा भारत का एक पडाव पुरा हो रहा हैं. पिछली सदी आशा और असफलता के बीच रहीं. बाजारवाद से उपजी पुंजीवादी व्यवस्था में समाजवाद के प्रयोग हुए. लेकिन बीसवी सदी में इन प्रयोगों से
मोहभंग हुआं. बाजारवाद की जीत के साथ ही विचारधारा के अंत की घोषणा की गई. ऐसी विपरीत परिस्थिती में युवा भारत की स्थापना हुई. साम्राज्यवाद के पुराने और नए आशय समझते हुए युवा भारत ने अपने कार्यक्रमों द्वारा साम्राज्यवाद का विरोध किया. गांधी की सर्वोदय की संकल्पना और मार्क्स की समाजवाद की संकल्पना ने दुनिया को बदलने का काम किया. वह काम अभी भी अधुरा हैं. उसे युवा भारत ने पुरा करने का प्रयास कर रहा हैं.’
युवा भारत के संस्थापक एवं सेज (SEZ) विरोधी आंदोलन के नेता कॉ. विलास सोनवणे उद्घाटन पर भाषण करते हुए कहा कि, ‘पर्यावरण का मतलब केवल प्रकृति की रक्षा तग सीमित नहीं हैं. वह प्रकति के साथ साथ मनुष्य से भी जूडा हुआ हैं. आज हम
ऐसी स्थिती में आ गए हैं जहां मानव को बचाना हैं तो प्रकृति को बचाना अनिवार्य हैं. पिछली सदी की तमाम विचारधाराए समाज में परिवर्तन करना चाहती थी. लेकिन उनकी विकास की अवधारणा में ज्यादा अंतर नहीं दिखाई देता हैं. पूंजीवाद ने प्रकृति का भयंकर शोषण किया. पुंजीवाद के विरोध में जहां समाजवाद उभरा वहां उत्पादन के साधन पर किसका कब्जा होगा यह बहस का मुद्दा बना. लेकिन मुलतः विकास की अवधारणा को लेकर कोई बदलाव नहीं था. इसलिए समाजवादी देशों में भी प्रकृति संतुलन बिगाडनेवाली विकास की नीति अपनाई गई.’
‘बीसवीं सदी में गांधीजी ने ‘‘हिंद स्वराज’’ के माध्यम से इस बात
को समझने और समाझाने का काम वैकल्पिक विकास नीति के रुप में सामने लाने की कोशिश की. गांधी इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्यों की उन्होनें पुंजीवाद और समाजवाद के बीच उत्पादन के साधन पर मालिकाना हक को लेकर संघर्ष था उससे अधिक कुछ बात कहने की कोशिश की. प्रकृति के साथ मानव का संबंध कैसे हों यह बुनियादी सवाल गांधीजी ने खडा करने की कोशिश की. परंतु गांधीजी के पर्यावरण और विकास के मुद्दे को गांधीवादीयों ने राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया. गांधी के नाम पर उथल पुथल कम नहीं हुई किंतु गांधी ने जो अहम मुद्दा उठाया उसे छुने की भी कोशिश गांधी के अनुयायीयों ने नहीं की.’’
‘‘माओ त्से तुंग ने चीन में इसी तरह के सवाल खडे किए. विकास नीति को मानव केन्द्रीत होना चाहिए इस बात का गांधी और माओं आग्रह करते हैं. चिनी क्रांती के बाद माओं ने गंभीर सवाल खडे किए – किस के लिए विकास? मनुष्य जाती के मनुष्यता के लिए या पुंजीवाद के लिए ? माओं ने विकास की अवधारणा को परिभाषित करने का प्रयास किया. लेकिन माओं के बाद माओवादीयों ने इस प्रयास को त्याग कर पुंजीवादी विकास को अपना लिया.’’ ![]()
‘‘भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेझ) के नाम पर जल, जंगल, जमीन, खनिज संपत्ती पर पुंजीपतियों का निर्णायक कब्जा जमाने का प्रयास किया जा रहा हैं. दख्खन के राज्यों में कृष्णा, गोदावरी, कावेरी यह नदियां सह्याद्री से निकलकर पुरब की ओर बहती हैं. दख्खन में जितने भी सेझ बन रहें हैं वह सह्याद्री से लेकर इन नदियों के किनारें बन रहें हैं. सेझ के नाम पर इन नदियों के पानी पर पुंजीपती कब्जा करना चाहते हैं. सामंती काल में पानी पर कुछ लोगों का अधिकार रहा उसी तरह पानी पर पुंजीपतियों का कब्जा होने से समाज का बड़ा हिस्सा अछुत बनाया जाएगा और उसकी संख्या तेजी से बढेगी. इसलिए पिछले कुछ वर्षों में युवा भारत ने जो भी लड़ाईयां लड़ी वह पर्यावरण को राजनीतिक मुद्दा बनाकर ही लड़ी हैं.’’ प्रकृति का मानव के साथ कैसे संबंध हों इस बात पर गांधीजी ने जो सवाल खड़े किए उस पर पुनर्विचार करने का आवाहन कॉ. विलास सोनवणे ने युवा भारत के साथियों से किया.
डाऊ केमिकल्स विरोधी
आंदोलन में वारकरी सम्प्रदाय की अहम भूमिका रहीं. वारकरी सम्प्रदाय के प्रतिनिधी सातारा (महाराष्ट्र) से आए ह.भ.प. फडतरे महाराज ने युवा साथीयों के उत्साह को सराहते हुए कहा कि जिस तरह से पर्यावरण में प्रदुषण को दूर करने के लिए हम संघर्ष कर रहें हैं, गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं उसी तरह से समाज में विषमता का प्रदुषण हैं और उसे दूर करने का कार्य युवाओं ने करना चाहिए. ह.भ.प. फडतरे महारज ने वारकरी परंपरा का उदाहरण देते हुए कहां की संत तुकाराम ने सामाजिक समता की स्थापना के लिए, पर्यावरण से एकरुपता के लिए 16वीं सदीं में पहलकी थी. तुकाराम महाराज की इस परंपरा के कारणही वारकरी सम्प्रदायने डाऊ केमिकल्स और अमरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष किया.
उद्घाटन सत्र में साथी कुलदिप महतो, झारखंड के दामोदर नदी के
सवालों पर निरंतर संघर्ष कर रहें साथी रामचंद्र रवानी, पटना, बिहार से आए वरीष्ठ साथी एवं युवा भारत के संस्थापक सुर्यदेवजी ने भी अपने विचार रखे. महेश देव के सुत्र संचालन में चल रहें इस सत्र के अध्यक्ष चन्द्रधर पाठक आर्य (पाठक बाबा) ने अपने आशिष वचन रखते हुए युवा भारत के साथीयों को शुभकामनाए दी.
सम्मेलन के औपचा
रीक उद्घाटन के बाद पर्यावरण और विकास की अवधारणा पर युवा भारत का लिखित प्रस्ताव युवा भारत के राष्ट्रीय संयोजक राजीव राय (भागलपुर) ने सदन में चर्चा के लिए प्रस्ताव का पठन किया. चर्चा को आगे बढाते हुए साथी कौशिक हलदर (बंगाल) ने वर्तमान विकास नीति को ‘‘कॅन्सर’’ की उपमा दी. यह विकास कॅन्सर की भॉंति हैं जो खुद बढने के साथ साथ पर्यावरण, समाज, मानव का विनाश करते जा रहा हैं. यह विकास की अवधारणा हमें मृत्यू की तरफ ले जा रहीं हैं. उसके खिलाफ संघर्ष करते हुए वैकल्पीक व्यवस्था को लेकर गंभीरता से विचार करने की जरुरत पर साथी कौशिक ने जोर दिया.
कश्मीर के सुलगतें सवाल
सम्मेलन का दुसरा दिन कश्मीर के सुलगतें सवाल पर गंभीर चर्चा के साथ हुआं. साथी इक्बाल गाज़ी (बंगाल) ने सत्र का सूत्र संचालन करते हुए साथीयों को कश्मीर के सवालों की ऐतिहासिकता और प्रासंगिकता से अवगत किया. कश्मीर से आई साथी इन्शाह मलिक ने कश्मीर की जनता का दर्द रखते हुए कश्मीर की जनता की आकांक्षा को स्पष्ट शब्दों में रखा. कश्मीर की जब भी बात आती हैं तो वह सिर्फ भारत – पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में होती हैं. लेकिन कश्मीरी अवा़म, उनके जीवन, उनकी मांग, उनकी अस्मीता, पहचान को लेकर बात नही हुई हैं. कश्मीर
अपनी कश्मीरी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा हैं. कश्मीर में बार बार एक ही नारा लोग लगा रहें हैं – आज़ादी. भारत में भी कुछ लोगों को आज़ादी मिली हैं क्या ऐसी स्थिती हैं. लेकिन कश्मीर में आज़ादी का मतलब बहुत अलग हैं. पिछले 20 साल से कश्मीर भारतीय सेना के प्रशासन में रहा हैं. वहां लोकतांत्रीक व्यवस्था को कभी भी पनपने नहीं दिया गया. आंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संगठनों के मुताबिक हिंदुस्तान की 60 प्रतिशत सेना कश्मीर में हैं. मिलीटरी राज में कश्मीरी जनता को बहुत कुछ सहना पड रहा हैं. आतंकवादी के नाम से झुठे मुठभेड में कश्मीरी बच्चों को बेरहमी से मारा जाता हैं. गांव-गांव में कश्मीरी महिलाओं पर सेना द्वारा बलात्कार किए जा रहे हैं. भयंकर दमन की इस स्थिती में बच्चें आर्मी कॅम्प पर पत्थर मारते हैं तो आर्मी इन बच्चों को गोलियों से मार रही हैं. कश्मीर में कर्फ्यू आम बात हैं. हमेशा कर्फ्यू का मतलब अपने ही घर में कैद होना हैं. जहां बोलने का अधिकार भी न हों वहां लोग क्या करे. लोग लढते हैं तो उन्हें आतंकवादी घोषित किया जाता हैं. फिर भी कश्मीरी अपनी आवाज उठा रहें हैं. कश्मीर तीन मुल्कों के बीच – भारत, पाकिस्तान, चीन एक आंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन गया हैं. कश्मीरी जनता अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहीं हैं और कश्मीरी जनता की पीड़ा, दर्द को महसूस करते हुए कश्मीरी जनता का साथ देने की अपील इन्शाह मलिक ने युवा भारत के साथीयों से की.
इस सत्र में कश्मीर के संदर्भ में संगठन की भुमिका रखते हुए युवा भारत के राष्ट्रीय संयोजक शशिकान्त सोनवणे ने कहां की, कश्मीर में आज़ादी के नारे गुंज रहें हैं लेकिन देश की जनता वाकई आज़ाद हैं क्या यह सवाल हैं. विविधता में एकता का नारा देते हुए देश के विभिन्न इलाकों की
अपनी अलग पहचान को सत्ताधारी वर्ग ने दबा दिया. झारखंड की प्राकृतिक संसाधनों पर झारखंड के लोगों का अधिकार नहीं हैं. झारखंड हो या बंगाल या तामिलनाडू कोई भी आज़ाद नहीं हैं.
कश्मीर का सवाल ‘कश्मीरीयत’ के साथ जुडा हुआं हैं. इसे धर्म के साथ जोडकर नहीं देखना चाहिए. इसलिए कोई आश्चर्य नहीं हैं कि कश्मीर में कश्मीरी पंडित भी आज़ादी को लेकर अपनी जान दे रहें हैं. लेकिन भारत, पाकिस्तान और अमरिका के शासक वर्ग कभी नहीं चाहता की कश्मीर का सवाल हल हो. वे बच्चों को पत्थर उठाने पर मजबूर कर रहें हैं. शोषण, उत्पीडन मानव अधिकारों के हनन के खिलाफ संघर्ष करने की युवा भारत की भुमिका रहीं हैं. युवा भारत मानता हैं कि देश के विभिन्न जनसमुहों को अपनी पहचान, संस्कृति के अनुसार स्वयंनिर्णय का अधिकार हैं. इस लिए युवा भारत ने मणीपुरी जनता की आकांक्षाओं का आदर करते हुए उनका साथ देने की कोशिश की. कश्मीरी जनता जो जुल्म सह रहीं हैं वह भारत नहीं हैं वह भारत के सत्ताधारी वर्गो द्वारा किया जा रहा हैं. भारत की आम जनता भी शोषण, उत्पीडन से आज़ाद होने के लिए संघर्ष कर रहीं हैं. इसलिए कश्मीर की जनता का भारत के शोषित लोगों के साथ एक अलग रिश्ता हैं. भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर अपनी पहचान, अपनी अस्मीता, अपनी भाषा, अपनी संसकृति का आदर करते हुए हम सभी शोषित लोगों को एक साथ मिलकर साम्राज्यवाद के
खिलाफ संघर्ष करना होगा.
इस सत्र में कश्मीर के सवाल से राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद को लेकर कई सारे सवाल खडे हुए. इस पर अलग से वैचारीक शिवीर आयोजित करने की मांग सदन में आई.
साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में महिलाओं का सहभाग
कश्मीर में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का संदर्भ लेते हुए साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में महिलाओं का सहभाग इस विषय पर राष्ट्रीय समिती की सदस्य, तपोती चॅटर्जी (बंगाल) ने कहां कि जिस तरह से कश्मीर की महिलाओं को परेशानी उठानी पडती हैं, उसी तरह से
सेझ एवं अन्य साम्राज्यवादी नीतियों की किंमत महिलाओं को सब से ज्यादा देनी पडती हैं. हर प्रकार के दमन, उत्पीडन का शिकार स्त्री ही होती हैं. इस लिए साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में महिलाए बढचढकर हिस्सा लेती हुई नजर आती हैं. साम्राज्यवाद सेझ जैसे नए-नए हतखंडे अपनाकर लोगों के संसाधन, अधिकार छीन रहें हैं. ऐसी स्थिती में महिलाओं को अपने परिवार, समाज की रक्षा के लिए संगठीत होकर संघर्ष करना पड रहां हैं. महिलाओं के सहभाग के कारण ही सेझ विरोधी संघर्ष फिर वो चाहे सिंगूर में हो या नन्दीग्राम में, निर्णायक संघर्ष के रुप में उभरे. आनेवाले दिनों में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में महिलाओं की अहम भूमिका रहेगी.
इस विषय पर चर्चा को आगे बढाते हुए राष्ट्रीय समिती की सदस्य, जयश्री घाडी (महाराष्ट्र) ने पिछले 3-4 वर्षों के संघर्षो का अनुभव सदन में रखा. देश का सबसे बडा प्रस्तावित सेझ रायगड, महाराष्ट्र के खिलाफ वहां की आगरी – कोली जाती की महिलाओं ने निर्णायक भूमिका ली हैं. पुणे के पास डाऊ केमिकल्स जैसे अमरिकी कंपनी के खिलाफ भी महिलाओं ने न केवल आंदोलन में सहभाग रखा उसमें पहलकदमी भी की. मुंबई के पास उत्तन (भाईन्दर) में महिलाओं ने अन्यायकारक कचरा डम्पिं
ग ग्राऊंड के खिलाफ संघर्ष किया. इस संघर्ष में महिलाओं की पुलीस ने बुरी तरह से पिटाई की लेकिन फिर भी महिलाए अपनी भूमिका पर अटल रहीं. पारंपारीक रुप से महिलाओं को आज भी चार दिवारों के भीतर रखने की कोशिश की जा रहीं हैं. एक तरफ स्त्री आंदोलन स्त्री मुक्ती के बजाए स्त्री को अबला मानकर उनके सक्षमीकरण करने की बात कर रहीं हैं, महिला आंदोलन का एनजीओकरण होते हुए दिख रहां हैं तो दुसरी तरफ यह सब मेहनत करनेवाली आम महिला अस्तीत्व के लिए कड़ा संघर्ष करते नज़र आ रहीं हैं. इसे हमें ठीक से समझना होगा और मानव मुक्ती के संघर्ष को आगे ले जाना होगा.
इस सत्र का संचालन मुक्ता सोनवणे (पुणे, महाराष्ट्र) ने किया.
शिक्षा का मकड़जाल – चुनौति एवं समाधान
सुधांशु शेखर (भागलपूर – बिहार) के संचालन में चले इस सत्र में वक्ताओं ने वर्तमान शिक्षा नीति पर कठोर टिप्पणी करते हुए वैकल्पीक शिक्षा नीति को विकसीत करने पर जोर दिया. आचार्य रविन्द्रजी ने कहा कि, समाज में जो बदलाव होते रहें हैं उसका
प्रभाव शिक्षा पर भी पडा हैं. आज व्यवस्था में अधिक उत्पादन कर वह जबरदस्ती थोपने का काम शिक्षा के माध्यम से किया जा रहा हैं. भारत की राष्ट्रीयता को लेकर बात बढ़ाते हुए आचार्य रविन्द्रजी ने स्पष्ट किया कि भारत एक देश के रुप में कभी नहीं रहा हैं. वह सांस्कृतिक रुप से भिन्न रहां हैं. अंग्रेजों के आने के पश्चात राजनीतिक रुप से भारत एक हुआं.
युवा भारत के राष्ट्रीय संयोजक आचार्य विनोद जी ने शिक्षा के महत्व को अधोरेखित करते हुए कहां कि, जो शिक्षा रोजी रोटी तक ले जाती हैं उसे ही शिक्षा माना जाता हैं. सवाल हैं कि नरेन्द्र
को जो विवेकानंद बना दे वहीं असली शिक्षा हैं. जो विद्या हमें मुक्त करती हैं वही विद्या हैं. किंतु वर्तमान में जो विद्या हैं वह खुद मुक्त नहीं हैं वह किसे मुक्त कर सकेगी? बोलने की शिक्षा और बोलने से शिक्षा नहीं होती अगर होती तो समाज में बदलाव हो गया होता. जीने से ही शिक्षा होती हैं. हमारी शिक्षा वहीं होनी चाहिए जो मानव के साथ, प्रकृति के साथ जीना सिखाए. शिक्षा आचरण में लाने की बात करती हैं. शिक्षक को क्रांतिकारी होना चाहिए और वह क्रांतिकारी होगा तो शिक्षा में क्रांती होगी.
युवा भारत के एक संस्थापक और साहित्यकार, विचारक डा. योगेन्द्रजी (भागलपुर, बिहार) ने कश्मीर के सवाल को छेडते हुए कहां कि, आज़ादी बहुत अच्छा शब्द हैं लेकिन आज़ादी के साथ साथ अनुशासन होना चाहिए. हम बिहारी, महारष्ट्री या कश्मीरी होने के पुर्व अगर मनुष्य होने की नहीं सोचेंगे तो सब खत्म हो
जाएगा. कश्मीर की त्रासदी, पीड़ा को महसूस करते हुए हमें समझना होगा कि भारतीय सत्ता और भारतीय जनता अलग हैं. कश्मीर की तरह अन्य प्रांत भी इस व्यवस्था के शिकार हैं. हम विखण्डता में हिन्दु – मुसलमान, दलित – सवर्ण, प्रांतवादी होकर सोचेंगे या मानव बनकर सोचेंगे यह सवाल हैं. शिक्षा अगर हमें मानवीय और विवेकवान नही बनाती तो वह शिक्षा बेकार हैं. हम शत्रु से लड़ते लड़ते शत्रु के साथ शत्रुता भी सीख लेते हैं. और फिर हम मे से भी शत्रु पैदा होते हैं इसलिए हम मनुष्यता के बारे में सोचे तब सारे विश्व के प्रति हमारी जिम्मेदारी बन जाती हैं. 21 वी सदी ज्ञान की सदी हैं, विचार की सदी हैं, प्रश्न की सदी है फिर हम सवालों से डरे क्यों? श्क्षिा को लेकर कुछ सवालों को डा. योगेन्द्रजी ने अधोरेखीत करते हुए कहा कि, गुरुकूल शिक्षा में
छात्र कौन होता था? वह शिक्षा केवल कुछ तबकों की शिक्षा थी. वह पुरे समाज की शिक्षा नहीं थी. आज सबके लिए शिक्षा का द्वार खुला हैं. वर्तमान शिक्षा पर कठोर टिप्पणी करते हुए उन्होनें कहां कि हमें अमानवीय बनानेवाले शिक्षा से हमें लड़ना होगा, हमारे अज्ञान से हमें लड़ना होगा.
वर्तमान विकास की अवधारणा और चुनौतियां
इस सत्र में विकास की अवधारणा और उसके विकल्प को लेकर गंभीर बहस हुई. यु.भा के राष्ट्रीय समिती सदस्य डा. ए.के. अरुण ने चर्चा को आगे बढाते हुए कहां कि 20 वीं सदी में हुए विज्ञान और तकनीकि विकास से धरती से भुख और बेकारी दूर कर सके ऐसी क्षमता विकसीत हुई. लेकिन अफसोस ऐसा हुआं नहीं.
संयुक्त राष्ट्र के UNDP के 1990 के आकड़ो के अनुसार दुनिया की कुल 530 करोड़ आबादी में से 70 प्रतिशत आबादी के पास केवल 15 प्रतिशत संसाधन उपलब्ध थे. 150 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य और स्वच्छ पानी की सुविधा उपलब्ध नहीं हैं. अर्थशास्त्री बाजार के Trade Cycle के कारणों को लेकर विवाद करते हैं लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के अभाव से औद्योगिक विकास को सीमित कर सकता हैं इस बात की चर्चा नहीं करते. उत्पादन और प्रबन्धन की प्रक्रिया जटील होते जा रहीं हैं. इस प्रक्रिया में श्रमिकों का एक बडा हिस्सा अप्रासंगिक और फालतू होते जा रहा हैं. अमरिका जैसे संपन्न देश में भी जहां गरीबों की संख्या 10-15% थी वह अब 15-22% हो गई हैं. मानवी श्रम का अर्थव्यवस्था में तिरसकार किया जा रहां हैं वही मशीन और तकनीकी विकास में बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया जाने के कारण संपन्नता के कुछ द्वीप बन रहें हैं. और बाकी भू-भागों में औपनिवेशिक शोषण हो रहां हैं. इसके चलते आत्मनिर्भर गांव भी तबाह हो रहे हैं. वर्तमान विकास का रास्ता विनाश की तरफ ले जा रहां हैं. प्राकृतिक परिवेश के संरक्षण और पर्यावरण के संतुलन की बात कर रहें हैं विचार नए युग के आगमन का सूचक हो सकता हैं.
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए युवा भारत के संस्थापक, वरिष्ठ चिंतक एवं पत्रकार कॉ. विजय चावला जी ने पर्यावरण और विकास की
अवधारणा इस विषय पर यह सम्मेलन आयोजित करने पर संयोजकों का अभिनंदन करते हुए कहां कि, पर्यावरण के संदर्भ में संक्षेप में कहां जाए तो वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साईड और उसके परिवार के वायु की मात्र बढ जाने के कारण इस पृथ्वी पर जीवन का रहना कठीण होते जा रहा हैं. हाल ही में पाकिस्तान में आई भयंकर बाढ़ या न्युजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया में लगातर लगी हुई जंगल में आग हो यह सब पर्यावरण के संकट के उदाहरण हैं. गांधी, माओं त्से तुंग या कार्ल मार्क्स जैसे महापुरुषों ने अपने-अपने समय में समाज की बहुत सारी बातों को देखा और समाज को मार्गदर्शन किया. व्यवहार में वे कभी भी ऐसा काम नहीं करते जिससे अपने वर्गो हित के विरोध में जाए. लेकिन उनके जो अनुयायी होते हैं उनकी ऐसी समज नहीं होने के कारण वे उन विचारो के मात्र एजंट बन जाते हैं. महात्मा गांधी बडे सिद्धांतकार थे यहां के पुंजीपती उनके विचारों के वाहक थे और उन्होने महात्मा गांधीजी के विचारों को उस हद तक उस सीमा तक ही लागू किये जिस हद तक पुंजीपती वर्ग चाहता था. कोई भी विचार भौतिक शक्ती का आधार होता हैं. पुंजी का यह चरित्र हैं कि वह अधिकतम मुनाफे के लिएही निवेश नहीं होती. पुंजी का निरंतर मुनाफा उसके कमाने का जरिया हैं. पुंजीवाद का मुनाफा तभी कम होता हैं जब आर्थिक मंदी आ जाए या सोविएत युनियन के विघटन जैसी बडी घटना घटे. पुंजीवाद अपना चरित्र बदलता नहीं हैं. पर्यावरण को क्षती पहुंचाने के बाद भी पुंजीवाद को अपने मुनाफे में कटौती उसके लिए स्वीकार नहीं होता. इस लिए प्रदुषण को बचाना हैं तो पुंजीवाद को उखाड फेकना होगा. इसके अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं हैं.
युवा भारत के संस्थापक एवं वरिष्ठ साथी सुर्यदेव जी ने स्पष्ट किया कि, पुंजीवादी व्यवस्था में पूरा का पूरा मानव समुदाय को
बदलना हैं तो इस व्यवस्था को बदलना जरुरी हैं. चंद प्रतिशत लोग पुरी दुनिया में प्रदुषण फैला रहें हैं. जब की हिंदुस्तान में 20 रुपये खर्च करने की भी क्षमता नहीं रखनेवाले वर्ग की बडी संख्या हैं. पुंजीवाद के विरोध में व्यापक संवाद, संबंध और व्यापक पहल, परस्पर सहयोग करने की आवश्यकता हैं.
गांधी शांती प्रतिष्ठान, भागलपुर के अध्यक्ष रामशरणजी ने विकास की अवधारणा पर टिप्पणी करते हुए कहां कि देश का सर्वशक्तीशाली माना जा रहां हैं लेकिन दलितों, शोषितों का विकास हुआं हैं क्या यह सवाल हैं. विकास दो तरिके से होता हैं. एक
उत्पादन के तरिके से या छिननें से. आज हमारा विकास छिन कर हो रहां हैं. दुसरों का शोषण करके या प्रकृति से छिनकर किया गया विकास अंततः हमाराही विनाश करता हैं. विकास के नाम पर उपभोक्तावाद बढ़ रहां हैं. विद्यमान बहुराष्ट्रीय कंपनीयों ने देश को, देश की नीतियों को खरीद लिया हैं. जनता की संसद अब करोडपतीयों की संसद बन गई हैं. पर्यावरण को बचाना होगा तो इन शक्तीयों के खिलाफ संघर्ष करना होगा और ऐसी विकास की अवधारणा बने जिससे मानव की क्षमताओं का विकास हों और उनकीं जरुरतें पुरी कर सके.
रायपुर (छत्तीसगढ़) से आए विचारक रोशनलालजी ने चर्चा को आगे बढाते हुए कहां कि आज पैदा होनेवाले हर व्यक्ती के ऊपर रु.8000 का कर्ज हैं. उसका यहा के साधनो पर, इन साधनों से
उत्पादीत मशीन और उत्पादन पर उसको समान अधिकार नहीं हैं. उस पर केवल मुठ्ठीभर लोगों का अधिकार हैं. सवाल यहां हैं. इसलिए उत्पादन पर, प्राकृतिक संसाधन पर समाज का नियंत्रण होना ही चाहिए.
युवा भारत के समनवयक अशोक भारत ने इस सत्र में चली बहस को समेटते हुए कहां कि, पुंजीवाद भोगवाद पर ही टिकता हैं. ज्यादा उत्पादन होगा तो ज्यादा भोग के लिए प्रकृति का शोषण करना होगा. यह जो विकास की दृष्टी हैं वह प्रकृति के समन्वय को नकारती हैं. गांधी ने हिंद स्वराज में इस शैतानी सभ्यता के लोभ और भोग को नकारकर मनुष्य की जरुरतों को पुरा करनेवाली मनुष्य केंद्रीत विकास की अवधारणा पर जोर दिया. इस लिए हमें जीवन मुल्यों और जीवन शैली के बारे में गंभीरता से सोचना होगा. युवा भारत जिन सवालों पर संघर्ष कर रहां हैं वह विकास की इस अवधारणा को नकारकर समाजवादी समतावादी समाज की दिशा की ओर जाते हुए दिखते हैं. आज की साम्राज्यवादी व्यवस्था को उखाडें बिना हम समतावादी व्यवस्था का निर्माण नहीं कर सकते.
इस सत्र में युवा भारत के सभी साथीयों ने अपनी राय, समझ और सुझाव रखें. इस सत्र का संचालन साथी उद्धव धुमाले ने किया.
संगठनात्मक सत्र
सम्मेलन के तीसरे दिन संगठनात्मक सत्र में देशभर में चल रहीं युवा भारत की गतिविधीयों और आंदोलनों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट रखी गई. जिस में साथी किशोर मोरे ने महाराष्ट्र में चल रहे महामुंबई (रायगड) सेझ विरोधी आंदोलन, डाऊ केमिकल्स
(पुणे) के खिलाफ सफल संघर्ष के बारे में विस्तृत रिपोर्ट रखी. साथ ही साथ उत्तन (भाईन्दर, मुंबई) में चल रहे डम्पिंग ग्राऊंड विरोधी आंदोलन और मुंबई एयरपोर्ट विस्तारीकरण के खिलाफ चल रहे आंदोलनों की वर्तमान स्थिती से साथीयों को अवगत किया.
साथी प्रसुन ने बंगाल में चल रहीं गतिविधीयों की जानकारी दी. देश विरोधी सेझ कानून के खिलाफ युवा भारत की तरफ सेझ प्रतिरोध दिवस के नाम पर जनजागृति करनेवाले अनेक कार्यक्रम किए जा रहें हैं. कोलकाता में झुग्गी-झोपडीयों को हटाने का प्रयास प्रशासन की ओर से किया जा रहां इसके खिलाफ युवा
भारत आंदोलन कर रहां हैं. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जन्मदिवस अवसर पर पुरे सप्ताह युवा भारत की ओर से पर्यावरण की रक्षा के लिए जनजागृति के कार्यक्रम किए गए. शांतीपूर में प्रदुषण के कारण वहां की आम की बाग उजड़ रहीं थी वहां युवा भारत ने आम की रक्षा के लिए संघर्ष किया. युवा भारत के साथीयों वैचारीक समज विकसीत करने के लिए राजापूर में (जहां खुदीराम बोस शहीद हुए थे) साम्राज्यवाद की समज को लेकर वैचारीक शिवीर का आयोजन किया था. साथ ही साथ विकास और पर्यावरण इस विषय पर शांतीपूर में शिवीर का आयोजन किया.
साथी कृष्णा जी ने बिहार की रिपोर्ट रखी. 2007 में बिहार के सोनपूर इलाके में बिजली नहीं मिलती थी. उसके खिलाफ युवा भारत ने तीव्र आन्दोलन खडा किया. साथीयों को अनशन पर बैठना पडा. बहुत संघर्ष के बाद युवा भारत के प्रयासों के कारण सोनपूर में बीजली उपलब्द करवाई. जून 2008 में आई दण्डक
नदीं में बाढ़ में युवा भारत के साथीयों ने 8 गावों को बहने से बचाने का कार्य किया. बाढ़ में मछुआरे भाईयों के हुए नुकसान को लेकर प्रशासन से मछुआरों को उचित मुआवजा दिलाने के लिए युवा भारत ने संघर्ष किया और प्रशासन को मुआवजा देने के लिए बाध्य किया. संघर्ष के साथ ही साथ साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ सोनपुर, भागलपूर के इलाकों में युवा भारत निरंतर जनजागृति के कार्यक्रम करते आया हैं.
झारखंड के साथी रामचन्द्र रमाणी जी ने दामोदर नदीं के प्रदुषण और वहां के लोगों के विस्थापन के विरोध में चल रहे लंबे संघर्ष का विस्तृत रिपोर्ट रखा. दामोदर नदीं के ऊपर बडा प्रकल्प आने के कारण 1952 से इस नदीं पर मछलीं और उस पर निर्भर मछुआरों की रोजी रोटी पर विपरीत परिणाम हुआ.
विकास की गलत नीति के कारण यहां का जंगल नष्ट हो गया. पुरे दामोदर घाटी के लोगों का परंपरागत रोजगार छीना गया. इस के खिलाफ बहुत लंबी लडाई चली हैं और आज भी वह लडाई चल रहीं हैं. प्रदुषण और विस्थापन के खिलाफ इस लडाई में युवा भारत का सक्रीय सहयोग रहा हैं.
प्रस्ताव और कार्यक्रम
युवा भारत के इस पाचवे राष्ट्रीय सम्मेलन में संगठन की ओर से साथीयों के सुझाव के आधार पर राजनीतिक प्रस्ताव रखे गए जिन्हे सदन ने सहमतीसे पारीत किए.
1. युवा भारत विषमता बढानेवाली प्रकृति – पर्यावरण विरोधी वर्तमान विकास नीति का विरोध करता हैं. हमारी समझ हैं कि मौजूदा व्यवस्था और विकास नीति न्यायपूर्ण समाज निर्माण में अवरोधक हैं. इसलिए जम इस व्यवस्था एवं नीति के खिलाफ संघर्ष को तेज
करते हुए समाज केद्रीत वैकल्पिक विकास नीति के लिए प्रयासरत हैं. उत्पादन के साधनों पर समाज का नियंत्रण करते हुए पर्यावरण संरक्षक उत्पादन पद्धती विकसीत करने के प्रयासों का युवा भारत समर्थन करता हैं. हम प्रकृति एवं मनुष्य एवं मनुष्य के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों पर अधारीत विकास नीति एवं जीवन शैली को आगे बढाने का संकल्प लेते हैं.
2. युवा भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देश के प्राकृतिक संसाधनों तथा जल, जंगल, जमीन आदि पर कब्जे के खिलाफ हैं. हमारी समझ हैं कि ये कंपनियां केवल अपने मुनाफे के लिए काम करती हैं और ये जनविरोधी एवं राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलग्न हैं. इसलिए हम किसी भी कींमत पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इस देश की जमीन एवं अन्य प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराने की नीति के खिलाफ हैं. युवा भारत मुआवजा, नौकरी आदि देकर किसानों एवं आदिवासिायों की जमीन अधिग्रहीत करने की
सरकारी नीति के खिलाफ हैं. जमीन अधिग्रहण का सवाल मात्र आर्थिक सवाल नहीं हैं. उसके साथ सामाजिक, सांस्कृतिक जीवनशैली का प्रश्न भी जुडा हैं. इसलिए हम देश की आम जनता को गोलबंद कर साम्राज्यवाद विरोधी जनसंघर्ष को तेज करने का संकल्प लेते हैं.
3. युवा भारत भोपाल त्रासदी जैसी घटनाओं की निंदा करता हैं और इस कोशिश में हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ती नहीं हो. हमारी समझ हैं कि भोपाल त्रासदी में देर से फैसला आना और पीडितों को समुचित मुआवजा नहीं मिलना दुर्भाग्यपूर्ण हैं. साथ ही सरकार ने जिस तरीके से इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार पुंजीपतीयों एवं नेताओं को बचाने की कोशिश की हैं वह भी लोकतंत्र का मजाक हैं. हमने भोपाल जैसी त्रासदी के लिए जिम्मेवार, रासायनिक हथियार बनानेवाली दुनिया की सबसे खतरनाक कंपनी डाऊ केमिकल्स के प्रस्तावित देहु (पुणे, महाराष्ट्र) के प्रकल्प के खिलाफ वारकरी संप्रदाय के सहयोग से निर्णायक संघर्ष किया हैं. हमारा संघर्ष जारी रहेगा और हम किसी भी कीमत पर अपने देश की जनता के जान-माल से समझौता नहीं करेंगे.
4. युवा भारत नक्सली हिंसा के बहाने राजसत्ता द्वारा ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसे अमानवीय, अलोकतांत्रिक सैन्य अभियानों के संचालन का विरोध करता हैं. हमारी यह समझ हैं कि इन अभियानों के जरिए सरकार शोषण उत्पीडन एवं अन्याय के खिलाफ जारी जनसंघर्षों को दबाने में लगी हैं इससे लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहां हैं. इसलिए हम आम जनता एवं खासकर युवाओं से अपील करते हैं कि वे अन्याय एवं उत्पीडन के खिलाफ संघर्षों को तेज करें.
5. युवा भारत पुरे देश में राजसत्ता द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न दमनकारी कार्रवाइयों का विरोध करता हैं. इसलिए हम अफ्सपा (Armed Forces Special Powers Act, AFSPA) जैसे जनविरोधी कानूनों को वापस लेने की मांग करता हैं. हमारी यह समझ हैं कि कश्मीर एवं पुर्वोत्तर आदि राज्यों में अफ्सपा जैसे जनविरोधी कानूनों के कारण आम जनता के मानवअधिकारों का हनन हो रहां हैं. हम कश्मीर में भारतीय सेना की उत्पीडनकारी कर्रवाइयों को तुरंत बंद करने की मांग करते हैं. साथ ही साथ जनता के स्वयंनिर्णय के अधिकार का आदर करते हुए कश्मीर की पहचान, कश्मीरी जनता के लोकतांत्रीक हक-अधिकार एवं मान-सम्मान की बहाली की मांग करते हैं.
6. युवा भारत वैश्विक स्तर पर साम्राज्यवाद एवं सांप्रदायिकता के बीच के गठजोड का विरोध करते आया हैं. हमारी समझ हैं कि सांप्रदायिकता इस देश के सत्ताधारी वर्ग का एक अभिन्न रुप हैं. हमारे देश में राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद विवाद भी इन्हीं शक्तियों की साजिश का परिणाम हैं. इसलिए हम आम लागों को लडाने एवं लूटनेवाली, घृणा फैलानेवाली कुटील सांप्रदायिक राजनीति का विरोध करते हैं. हम संकल्प लेते हैं कि हम आम जनता की एकता, शांति-सद्भाव बनाने और देश की साझी विरासत को समृद्ध् करने में योगदान देंगे.
7. युवा भारत शिक्षा के निजीकरण एवं व्यापारीकरण का विरोधी हैं. हमारी समझ हैं कि मौजूदा केन्द्र सरकार की शिक्षा नीति भी जनविरोधी हैं. सरकार के शिक्षा अधिकार कानून में भी भारत की जमीनी हकीकतों एवं आम लोगों की जरुरतो का कोई ख्याल नहीं रखा गया हैं. उलटे सरकार पूंजीपतियों एवं विदेशी विश्व विद्यालयों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा स्पेस बनाने में लगी हैं. इसलिए हम सबको सांप्रदायिकता से मुक्त, समान एवं गुण्वत्तापूर्ण शिक्षा एवं सम्मानजनक रोजगार के अधिकार के लिए संघर्ष तेज करने का संकल्प लेते हैं.
कार्यक्रम -
प्रस्तावों के अधार पर युवा भारत के कार्यक्रमों की घोषणा युवा भारत के संयोजक प्रदिप रॉय ने की.
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कश्मीरी जनता के उत्पीडन के खिलाफ युवा भारत देश भर में जनजागृति के कार्यक्रम करेगा और कश्मीरी जनता और खास तौर पर युवाओं से संवाद करने के लिए युवा भारत की एक टीम शीघ्र ही कश्मीर का दौरा करेगी.
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शिक्षा के व्यापारीकरण के खिलाफ व्यापक मुहिम चलाई जाएगी. विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक (Foreign Universities Bill) के खिलाफ पुरे देश भर में मुहीम चलाकर छात्र-छात्राओं युवाओं को गोलबंद करने का प्रयास किया जाएगा.
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सेझ एवं जमीन हथियाने जैसी साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ चल रहे संघर्षो को अधिक मजबूत करने के लिए जनजागरण मुहीम चलाएगा.
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बिहार में आनेवाले विधानसभा चुनाव में बिहार की आम जनता के सवालों को लेकर युवा भारत ‘जनता का मांगपत्र’ (People’s Manifesto) जारी करेगा और उसपर चुनाव के दौरान प्रचार प्रसार के कार्यक्रम करेगा.
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साम्राज्यवाद विरोधी लडाई के सिपाही, डा. द्वारकादास कोटनीस की जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर युवा भारत की तरफ से साम्राज्यवाद विरोधी गोष्टी, कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा.
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बाबरी मस्जिद विवाद के संदर्भ में अलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय के मद्देनजर युवा भारत समाज में शांति और सौहार्दपूर्ण माहोल बनाए रखने के लिए सांप्रदायिकता विरोधी कार्यक्रमों का आयोजन करेगा.
युवा भारत पारीत प्रस्ताव एवं कार्यक्रमों
के संदर्भ में युवा भारत की संगठनात्मक भुमिका यु.भा. के राष्ट्रीय संयोजक साथी शशी सोनवणे ने रखी. युवा भारत के ऐतिहासिक दायित्व को समझते हुए उसे पुरी ताकत के साथ निभाने की अपील शशिकान्त सोनवणे ने की.
युवा भारत के समन्वयक साथी अशोक भारत ने युवा भारत की नवनिर्वाचित राष्ट्रीय समिती की घोषणा की जिसे जोरदार तालियों के साथ सदन में उपस्थित सभी साथीयों ने समर्थन दिया. नवनिर्वाचित राष्ट्रीय समिती की बैठक सम्मेलन स्थल पर हुई और इस बैठक में राष्ट्रीय समिती ने राष्ट्रीय संयोजको का
चयन किया. युवा भारत के राष्ट्रीय समिती के साथ संगठन को समय समय पर सलाह देने के लिए सलाहकार समिती स्थापित करने की राय सदन में सभी साथीयों की राय बनी. इसे स्वीकार करते हुए युवा भारत के सलाहकार समिती की घोषणा की गई. इस सलाहकार समिती का औपचारिक गठन युवा भारत की राष्ट्रीय समिती की बैठक में किया जाएगा.
राष्ट्रीय समिती सदस्य -
विनोद भाई, महेश देव, विरेन्द्र, राजीव रॉय, हरेन्द्र, भानू उदयन, अरविन्द कुमार, कृष्णा जी, प्रदीप रॉय, कौशिक भारत, सुशांत घोष, तपोती चॅटर्जी, मनोज दास, शंतनू, अल्पना बेरा, डा. ए.के. अरुण, शशिकान्त सोनवणे, किशोर मोरे, उद्धव धुमाले, सुनील चौधरी, मुक्ता सोनवणे, वनराज शिंदे.
राष्ट्रीय संयोजक – प्रदीप रॉय, विनोद भाई, राजीव राय, कौशिक भारत, हरेन्द्र और शशिकान्त सोनवणे.
संगठन के समन्वयक की जिम्मेदारी साथी शशिकान्त सोनवणे को सौंप दी गई. ![]()
सभी नवनिर्वाचित राष्ट्रीय समिती के सदस्यों को अशोक भारत ने बधाई दी और समापन सत्र में डा. योगेन्द्रजी ने राष्ट्रीय समिती के सदस्यों को युवा भारत की आगे की चुनौतियों से अवगत किया और शुभकामनाए दी. महाराष्ट्र से आए वारकरी संप्रदाय के ह.भ.प. फडतरे महाराज ने तुकाराम महाराज के अभंग से सम्मेलन का समापन किया.
यह रिपोर्ट साथी सागर कछुआ के संकलन के आधार पर बनाया गया हैं.
विनोद भाई, प्रदीप रॉय, कौशिक भारत, राजीव राय, हरेन्द्र, शशिकान्त सोनवणे
राष्ट्रीय संयाजन समिती एवं राष्ट्रीय समिती
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